निर्मल गंगा

यह निराशाजनक है कि उत्तर प्रदेश में गंगा की साफ-सफाई के लिए एक नई योजना विचाराधीन तो बताई जा रही है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं कि वह किस तरह कार्य करेगी? आपरेशन निर्मल गंगा नामक इस योजना को अमल में लाने के राज्य सरकार के इरादे को देखते हुए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि पहले से चल रही गंगा कार्य योजना का क्या होगा? आखिर यह क्यों न मान लिया जाए कि अरबों रुपये खर्च करने के बावजूद गंगा कार्य योजना असफल सिद्ध हो चुकी है? सच्चाई जो भी हो, केवल नाम बदलने भर से किसी योजना की सफलता के प्रति सुनिश्चित नहीं हुआ जा सकता। यदि राज्य सरकार वास्तव में आपरेशन निर्मल गंगा योजना को अमल में लाने जा रही है तो उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इसे उन खामियों से मुक्त रखा जाए जिनके चलते गंगा कार्य योजना असफल साबित हुई। विगत दिवस विधानसभा में नगर विकास मंत्री गंगा कार्य योजना और विचाराधीन आपरेशन निर्मल गंगा को लेकर जिस तरह विपक्ष का निशाना बने उससे तो यही लगता है कि गंगा की साफ-सफाई राज्य सरकार के एजेंडे में ही नहीं है। ऐसा संकेत तब मिल रहा है जब पिछले कुछ समय से गंगा नदी अपने प्रदूषण के कारण लगातार चर्चा में है।
बात केवल गंगा नदी की ही नहीं है, यमुना का प्रदूषण भी कम घातक नहीं। सच तो यह है कि गंगा और यमुना के साथ-साथ अन्य नदियां भी बुरी तरह प्रदूषित हैं। उदाहरण के लिए चंबल, गोमती और हिंडन जैसी नदियों में प्रदूषण का स्तर इस कदर बढ़ गया है वे गंदे नाले में तब्दील होती जा रही हैं। बेहतर हो कि राज्य सरकार नदियों की सफाई के लिए नई योजना के फेर में पड़ने के स्थान पर उस राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करे जो नदियों को साफ-सुथरा रखने के लिए जरूरी है। गंगा समेत दूसरी नदियों के प्रदूषण के कारण किसी से छिपे नहीं, लेकिन विडंबना यह है कि उन्हें दूर करने के नाम पर खानापूरी ही अधिक की जा रही है। क्या कारण है कि नदियों के जल को विषाक्त बनाने वाले उद्योगों पर प्रभावशाली तरीके से अंकुश नहीं लगाया जा पा रहा? जब तक इस दिशा में कोई पहल नहीं होती तब तक नदियों को साफ-सुथरा बनाने की योजनाओं की सफलता संदिग्ध ही रहेगी।
[स्थानीय संपादकीय: उत्तर प्रदेश]

जलवायु परिवर्तन के कारण चीन में तेजी से पिघल रहे हैं हिमनद

लांझोउ (चीन), 15 दिसम्बर (आईएएनएस)। जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप पिछले पांच वर्षों में पश्चिमी चीन के क्षेत्रों में हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक इस दौरान पश्चिमी चीन में सात से 18 फीसदी हिमनद पिघल चुके हैं।
इस वर्ष मई में चीन के विज्ञान और तकनीकी मंत्रालय और चीनी एकेडमी ऑफ साइंसेज (सीएएस)की ओर से शुरू किए गए इस सर्वेक्षण में देश के एक तिहाई क्षेत्रफल को शामिल किया गया था। करीब 20 हजार वर्ग किलोमीटर के दायरे में किए गए इस सर्वेक्षण से पता चला है कि देश के इस इलाके में हिमनदों में से औसतन 7.4 फीसदी हिमनद पिघल चुके हैं। सर्वेक्षण को पूरा होने में पांच वर्षों का समय लगेगा।
सर्वेक्षण से पता चला है कि जुंग्गर बेसिन, उत्तरी ज् िानिजियांग के इली नदी के इलाके में और तिब्बत में यारलुंग जैंगबो नदी के समीप हिमनद सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। इन क्षेत्रों में 18 फीसदी से भी अधिक हिमनद पिघल चुके हैं।
सीएएस के शोध फेलो डिंग योंगजियान ने कहा, ''हिमनदों का पिघलना जलवायु परिवर्तन का परिणाम है।'' जलवायु परिवर्तन की वजह से पिछले कुछ दशकों में पश्चिमी चीन में तापमान में बढ़ोतरी हुई है। इस वजह से हिमनद पिघल रहे हैं।
गौरतलब है कि चीन में करीब 46 हजार हिमनद हैं जो 60 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं। पृथ्वी पर मध्य और निम् अंक्षाशों में पाए जाने वाले हिमनदों का 50 फीसदी चीन में ही पाया जाता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

नैनो तकनीक से मिलेगा स्वच्छ पानी!

न्यूयार्क, 21 फरवरी (आईएएनएस)। आधुनिक जीवन की सुविधाओं को बेहतर और सरल बनाने वाली 'नैनोटेक्नोलोजी' अब बेहद कम कीमत पर साफ और स्वच्छ पानी भी उपलब्ध करवाएगी। यह संभव होगा नैनो तकनीक पर आधारित फिल्टर के द्वारा।

विकास के क्षेत्र में काम करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था 'युनेस्को' की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रतिदिन 6000 से ज्यादा लोग पानी से होने वाली हैजे जैसी बीमारियों के कारण मौत का शिकार हो जाते हैं। विकासशील देशों में पीने का पानी एक सामाजिक-आर्थिक समस्या बन गया है।

इस स्थिति के मद्देनजर दक्षिण आस्ट्रेलिया के 'वार्क अनुसंधान संस्थान' के अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार 'नैनो तकनीक' इस मायने में सरल, किफायती और बेहतर विकल्प उपलब्ध करवा सकती है।

'इंटरनेशनल जर्नल आफ नैनोटेक्नोलोजी' में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार स्वच्छता के लिए काम आने वाले सिलिका धातु के छोटे कणों को इस तकनीक से लैस कर बेहतर ढंग से हानिकारक कीटाणुओं को हटाया जा सकता है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

पानी का निजीकरण और सरकारी रवैया

संदीप पांडे
आलेख. जल जैसे प्राकृतिक संसाधन, जो पूरे समाज के उपयोग के लिए उपलब्ध हैं तथा जिन पर समाज का सामूहिक स्वामित्व है, के प्रति सरकारों के नजरिए में परिवर्तन आ गया है। अब इसको एक ऐसे संसाधन के रूप में देखा जाने लगा है जिसका व्यावसायिक मुनाफे के लिए दोहन किया जा सकता है। यह अलग बात है कि इस प्रक्रिया में क्षेत्रीय भू-गर्भ जल स्तर में न सिर्फ गिरावट आ रही है, बल्कि उसके जहरीले होने के मामले भी सामने आ रहे हैं।
पिछले वर्ष अक्टूबर माह में उत्तरप्रदेश के बलिया जिले में स्थित कोकाकोला बॉटलिंग संयंत्र के बाहर स्थानीय ग्रामीणों ने धरना दिया हुआ था। वे जानना चाहते थे कि यह कारखाना अपने खतरनाक कचरे का निपटारा कैसे करता है?
ज्ञात हो कि 2005 में केरल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पलक्कड़ जिले में स्थित प्लाचीमाडा गांव के कोकाकोला बॉटलिंग संयंत्र को बंद करने का आदेश दिया था क्योंकि इस कारखाने से निकलने वाले कचरे में कैडमियम, क्रोमियम व लैड जैसे तत्व पाए गए थे जिनसे भू गर्भ जल के जहरीले होने का खतरा था।
ऐसे में बलिया के किसानों के लिए यह जानना जरूरी था कि उनके गांव में स्थित कोकाकोला संयंत्र कहीं रासायनिक कचरा भूगर्भ में तो नहीं दफना रही है? वहां ग्रामीणों को पुलिस अधीक्षक के स्तर पर निरीक्षण की अनुमति तो दी गई, लेकिन ऊपरी दबाव के आगे फिर रद्द कर दी गई।
कोकाकोला व पेप्सी कंपनियों के भारत में 90 के ऊपर बॉटलिंग संयंत्र हैं, जो प्रत्येक जगह से रोजाना 15 से 20 लाख लीटर पानी का दोहन करते हैं। इन कंपनियों द्वारा एक लीटर शीतल पेय बनाने के लिए छह से दस लीटर पानी का इस्तेमाल किया जाता है।
लगातार इतने पानी के दोहन की वजह से उन इलाकों में जहां ये बॉटलिंग संयंत्र स्थित हैं, भूगर्भ जल स्तर में तेजी से गिरावट आई है। प्लाचीमाडा में तो संयंत्र के आसपास के गांवों में कोकाकोला टैंकरों से पीने के पानी की आपूर्ति करती है। भूगर्भ जल पीने, नहाने, खाना बनाने अथवा कपड़े धोने लायक भी नहीं रह गया है।
मेहदीगंज, वाराणसी स्थित कोकाकोला बॉटलिंग संयंत्र से तीन किमी के दायरे में स्थित प्रत्येक जलस्रोत का सर्वेक्षण करने पर यह मालूम हुआ कि 1996-2006 के दौरान भूगर्भ जलस्तर में 18 फीट की गिरावट आई है जबकि 1986-96 के दौरान यह गिरावट मात्र 1.6 फीट थी। कुओं व तालाबों के सूख जाने पर बड़ी संख्या में हैंडपंप लगाए गए हैं।
1996 में यहां सिर्फ 45 हैंडपंप थे, जबकि 2006 में इनकी संख्या बढ़कर 220 तक पहुंच गई। स्पष्ट है कि जल की उपलब्धता का संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है। दर्जन भर गांवों में राजकीय व निजी नलकूपों से पानी निकलना बंद हो चुका है तथा एक चौथाई हैंडपंप भी जवाब दे चुके हैं।
ऐसा प्रस्ताव था कि बिना अनुमति के इस इलाके में हैंडपंप या नलकूप लगाने पर रोक लगाई जाए। कृषि या पेयजल की जरूरत को पूरा करने के लिए तो ऐसी अनुमति देने पर विचार किया जा सकता है, किंतु कोकाकोला कंपनी द्वारा व्यावसायिक उद्देश्य से जल दोहन पर तुरंत रोक लगनी चाहिए।
यही नहीं पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट, देहरादून द्वारा मेहदीगंज, वाराणसी स्थित कोकाकोला बॉटलिंग संयंत्र के आसपास के भूगर्भ जल, सतही जल व मिट्टी के नमूनों की जांच करने पर यह पाया गया कि जल के ज्यादातर नमूनों में कैडमियम व क्रोमियम आपत्तिजनक मात्रा में विद्यमान हैं।
ऐसी आशंका है कि कोकाकोला अपना विषैला कचरा भूगर्भ जल में ही दफना रहा है जिसकी वजह से आसपास के ग्रामीणों के लिए पेयजल के विषाक्त होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। मिट्टी में भी लैड, कैडमियम व क्रोमियम पाए गए।
जल के निजीकरण का सबसे हास्यास्पद किंतु गंभीर मामला रायपुर से है जहां मध्यप्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम लिमिटेड ने एक स्थानीय निजी कंपनी रेडियस वॉटर लिमिटेड को 20 वर्षो की अवधि के लिए व्यावसायिक मुनाफा कमाने के उद्देश्य से राज्य का एक प्रमुख जलस्रोत व नैसर्गिक साधन शिवनाथ नदी पूर्णरूपेण हस्तांतरित कर दिया।
राज्य शासन की अनुमति के बिना रुपए 500 लाख से अधिक की जल प्रदाय योजना की परिसंपत्तियां निजी कंपनी को लीज पर मात्र एक रुपए के प्रतीकात्मक मूल्य पर सौंप दी गई थीं यानी प्रकृति से निशुल्क जल प्राप्त कर उसे बोतल में बंद कर बेच देना अब एक वैध व्यावसायिक गतिविधि है।
कोकाकोला व पेप्सी खुद किनले व एक्वीफिना नाम से बोतलबंद पानी का व्यापार करती हैं। इसलिए इनके कारखानों के खिलाफ तमाम शिकायतें होते हुए भी इन कंपनियों के खिलाफ कोई कार्रवाई करवाना बहुत मुश्किल हो गया है।
इन देशी-विदेशी निजी कंपनियों ने हमारी शासन-प्रशासन व्यवस्था में जबदस्त घुसपैठ की है तथा हमारे राजनेताओं व अधिकारियों की सोच बदली है, यह प्रक्रिया अत्यंत खतरनाक है। एक प्राकृतिक संसाधन व आम जनता का उस पर पारंपरिक अधिकार कुछ मुनाफा कमाने की सोच से प्रेरित निहित स्वार्थ वाला वर्ग छीनना चाहता है। यदि जनता जागरूक न रही तो उसके जीवन का एक प्रमुख आधार देखते ही देखते उसके हाथों से निकल जाएगा।
लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
साभार - भाष्कर

नया राज्य और नदी के नए जागीरदार - नदिया बिक गई पानी के मोल-३

आलोक प्रकाश पुतुल जी का “नदिया बिक गई पानी के मोल” आलेख श्रृंखला पानी के अर्थशास्त्र और राजनीति पर एक गंभीर प्रकाश डालता है। आलोक जी को बहुत-बहुत धन्यवाद.- मीनाक्षी
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आलोक प्रकाश पुतुल
तीसरी किस्त । पहले की दो किस्तें यहाँ पढ़ें
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अब शिवनाथ पर एनिकट बनाने और पानी आपूर्ति का जिम्मा रेडियस वाटर लिमिटेड पर था. इस पूरी प्रक्रिया के संपन्न होने तक शिवनाथ नदी मध्य प्रदेश के बजाय नए राज्य छत्तीसगढ़ का हिस्सा बन चुकी थी और अब शिवनाथ पर रेडियस वाटर लिमिटेड का कब्जा था. औद्योगिक केंद्र विकास निगम, रायपुर अब छत्तीसगढ़ स्टेट इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट कारपोरेशन (सीएसआईडीसी) में तब्दील हो चुका था.
रेडियस ने देखते ही देखते शिवनाथ नदी के 22.7 किलोमीटर हिस्से पर घेराबंदी शुरु कर दी. नदी किनारे की 176 एकड़ जमीन के अलावा हजारो वर्गफीट जमीन पर रेडियस वाटर लिमिटेड ने अपना साम्राज्य जमा लिया था.
औद्योगिक केंद्र विकास निगम, रायपुर के बोरई स्थित सारे संसाधनों पर एक रुपए में कब्जा जमा कर उसी संसाधन से रेडियस वाटर लिमिटेड ने पहले महीने से ही औद्योगिक केंद्र विकास निगम, रायपुर यानी
छत्तीसगढ़ स्टेट इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट कारपोरेशन (सीएसआईडीसी) से 4 एमएलडी पानी की कीमत 15 लाख 12 हजार रुपए वसुलना शुरु किया. यानी बिना एक रुपए की पूंजी लगाए रेडियस ने राज्य सरकार से पहले ही साल एक करोड़ 81 लाख 44 हजार रुपए का भुगतान प्राप्त कर लिया.
बाद के सालों में जब अनुबंध के अनुसार रेडियस ने प्रति हजार लिटर पानी के लिए 15.02 रुपए छत्तीसगढ़ स्टेट इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट कारपोरेशन (सीएसआईडीसी) से वसुलना शुरु किया तो इस अनुबंध के भ्रष्टाचार खुल कर सामने आने लगे. बोरई में केवल दो उद्योग थे और उन्हें 2.4 एमएलडी से अधिक पानी की आवश्यकता कभी होनी ही नहीं थी, जबकि छत्तीसगढ़ स्टेट इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट कारपोरेशन को 4 एमएलडी पानी का भुगतान अनिवार्य था. इसके अलावा छत्तीसगढ़ स्टेट इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट कारपोरेशन जिन उद्योगों को पानी की आपूर्ति कर रहा था, उनसे प्रति हजार लिटर पानी के लिए केवल 12 रुपए ही लेने का अनुबंध था. यानी रेडियस से पानी लेने और उद्योगों को पानी देने में प्रति हजार लीटर पानी में 3.02 रुपए का घाटा छत्तीसगढ़ स्टेट इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट कारपोरेशन को भुगतना अनिवार्य था.
शिवनाथ के आसपास बसे अधिकांश गांवों के लिए पानी का मुख्य स्रोत नदी ही रही है. लेकिन इस नदी पर रेडियस वाटर लिमिटेड के कब्जे के बाद शिवनाथ के किनारे बसे गांवों को नदी के इस्तेमाल के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया. जिस नदी का अब तक कोई भी निःशुल्क इस्तेमाल कर सकता था, उसमें नहाने या उसके पानी से सिंचाई करने पर रोक लगा दी गई. कई पीढ़ियों से इस नदी में मछली मारने वाले सैकड़ों मछुवारों को इस इलाके से भगा दिया गया. पालतु पशुओं के लिए पानी का संकट पैदा हो गया. यहां तक कि नदी किनारे की चारागाह के रुप में इस्तेमाल होने वाली जमीन भी एनिकट के लिए पानी रोके जाने के कारण डूब क्षेत्र में आ गई. गांव के लोगों को रेत भी दूसरे इलाकों से मंगाने की नौबत आ गई. नदी किनारे बोर्ड लगा दिया गया- “ नदी में नहाना और मछली पकड़ना सख्त मना है. इससे जान को खतरा हो सकता है.”
गांव के हजारों किसान हतप्रभ रह गए. कल तक जो नदी सबकी थी, अब उस पर एक निजी कंपनी के अधिकार ने चौंका दिया. नदी किनारे बसे मोहलाई के सरपंच बठवांराम टंडन आक्रोश के साथ कहते हैं-“ यह कैसा पंचायती राज्य है, जहां गांव वालों से पूछे बिना नदियां तक बेच दी गईं. कल को ये सरकारें सूरज की रोशनी और हवा भी बेच देंगी तो हमें अचरज नहीं होगा.”
नदी और पानी को बेचने की इस साजिश के खिलाफ इस इलाके में लगातार सक्रिय नदी घाटी मोर्चा के संयोजक गौतम बंदोपाध्याय कहते हैं- “ रेडियस ने गांवों में हैंडपंप का इस्तेमाल करने और नए कुएं खोदे जाने पर भी पाबंदी लगा दी. कंपनी के कारिंदे गांव में घुम-घुम कर गांव वालों को डराने लगे. सिंचाई करने वाले किसानों के पंप रेडियस ने जप्त कर लिए.”
मोहलाई, खपरी, रसमरा, सिलोदा, महमरा जैसे गांवों का एक जैसा हाल हुआ. लेकिन इससे भी बुरा हाल उन गांवों का था, जो बोरई एनिकट के नीचे वाले हिस्से में बसे थे. चिरबली, नगपुरा, मालूद, झेरनी, पीपरछेड़ी, बेलोदी के किसानों का संकट ये था कि बांध के कारण सारा पानी ऊपर ही रुक जा रहा था और शिवनाथ के नीचे का पूरा हिस्सा सूख गया.
गरमी के दिनों में जब हाहाकार मचा तो गांव के लोग संगठित होने लगे. नदी घाटी मोर्चा ने दुर्ग से रायपुर और दिल्ली तक आंदोलन शुरु किया. धरना, जुलूस, सड़क जाम, प्रदर्शन और घेराव की रणनीति बनाई गई।
जारी

वर्तमान में जल संरक्षण आवश्यक : डीएम

गाजियाबाद, जिलाधिकारी अजय कुमार शुक्ला ने कहा कि मानव जाति के बने रहने के लिए जल आवश्यक है। उन्होंने कहा कि एक तरफ तेजी से बढ़ रहे औद्योगिकीकरण से जल प्रदूषित हो रहा है वहीं दूसरी तरफ वातावरण गर्म होने के कारण बरसात भी कम हो रही है। यदि आज ही शहर से लेकर गांव तक जल संरक्षण अभियान नहीं चलाया गया तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है। श्री शुक्ला भूगर्भ जल दिवस पर आयोजित गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने कहा कि गाजियाबाद जिला गंगा-जमुना के मध्य में होने, नहरों के बावजूद जमीरी पानी का स्तर लगातार गिर रहा है। इससे स्थिति गंभीर हो रही है। जिले की सामान्य वर्षा 648.65 मिमी तथा बगैर मानसून की वर्षा 105.20 मिमी वार्षिक है। जिले में कुल 98154.45 हे.मी भूगर्भ जल उपलब्ध है जिसमें से 71903.36 हे.मी. भूजल का सिंचाई के लिए दोहन होता है। जिलाधिकारी ने कहा कि घरेलू और औद्योगिक उपयोग के लिए 25 वर्ष बाद 50128.68 हे.मी. भूजल की आवश्यकता होगी जबकि वर्तमान आवश्यकता 30808.29 हे.मी. है। 25 वर्ष बाद कुल 26251.09 हे.मी. जल सिंचाई के लिए मिल पाएगा। उन्होंने बताया कि जिले के आठ ब्लाकों में से लोनी व हापुड़ अभी सेमीक्रिटिकल स्थिति में हैं, जबकि शेष छह सुरक्षित स्थिति में हैं। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लोनी व रजापुर में प्रति वर्ष 10 से 20 सेमी भूजल में गिरावट आ रही है। अजय कुमार शुक्ला ने कहा कि जिले में सभी हैंडपंपों के सोख्ते बनाए जाएं, नहरों के आसपास के तालाबों को भरा जाए, सरकारी और गैर सरकारी 200 वर्ग मीटर वाले भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाये जाएं। इसका उल्लंघन करने वालों को दंडित किया जाए। उन्होंने जीडीए व नगर निगम को इस संबंध में अपने दायित्वों का निर्वहन करने को कहा। जिला विकास अधिकारी वाई.एन. उपाध्याय ने कहा कि जिले के सभी 1428 तालाबों का संरक्षण व पुनरुद्धार किया जा रहा है। जिला पंचायत राज अधिकारी वी.बी. सिंह ने बताया कि प्रधानों की तीन दिवसीय गोष्ठी में जल संरक्षण का प्रशिक्षण दिया जाएगा। गोष्ठी में क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी के साथ ही जल निगम, लोनिवि, विद्युत विभाग के अधिकारी भी उपस्थित थे।
साभार - http://a2zghaziabad.blogspot.com/

हरियाणा के 45 खण्डों में भूजल स्तर तेजी से घट रहा है

करनाल, केन्द्रीय भूजल बोर्ड की उतरी पश्चिमी क्षेत्र के क्षेत्रीय निदेशक सुशील गुप्ता ने आज कहा कि हरियाणा के 45 खण्डों में भूजल स्तर तेजी से घट रहा है ओर केन्द्र ने इन खण्डों को अतिशोषित क्षेत्र घोषित किया है। इनमें करनाल जिले के सभी छ: विकास खण्ड भी शामिल हैं। भविष्य में इन क्षेत्रों में पानी की भारी किल्लत हो सकती है। श्री गुप्ता आज यहां लघु सचिवालय में भूजल सूचना पुस्तिका के विमोचन अवसर पर अधिकारियों को सम्बोधित कर रहे थे। केन्द्रीय भूजल बोर्ड द्वारा प्रकाशित इस पुस्तिका का विमोचन जिलाधीश बी.एस.मलिक ने किया। पुस्तिका में करनाल जिले में भूजल स्तर की स्थिति और इसके नीचे जाने के खतरे से निपटने के उपायों पर चर्चा की गई। घटते भूजल स्तर पर चिन्ता व्यक्त करते हुए क्षेत्रीय निदेशक श्री गुप्ता ने कहा कि करनाल खण्ड को 2003 में भूजल के मामले में पहले ही डार्क एरिया अधिसूचित किया जा चुका है तथा शीघ्र ही 5 अन्य खण्डों को भी डार्क एरिया अधिसूचित कर दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि ऐसे क्षेत्रों में केन्द्रीय सरकारी एथारिटी की आज्ञा के बिना नए टयूववैल नही लगाए जा सकते। उन्होंने जिला प्रशासन को सुझाव दिया कि जिले में लगे सभी टयूववैलों का सर्वे करवाकर उन्हे रजिस्टर किया जाना चाहिए ताकि भूजल के प्रयोग की पूरी जानकारी बोर्ड को मिल सके। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि करनाल जिला यमुना नदी के किनारे है, इसलिए यहां यमुना के वर्षो के दिनों में आए अतिरिक्त पानी का प्रयोग किया जाना चाहिए और इस पानी को संरक्षित भी किया जा सकता है। जिलाधीश बी.एस.मलिक ने पानी की बचत पर बल देते हुए कहा कि भूजल के रीचार्ज के लिए जिले में हर सम्भव उपाय किए जायेगे। उन्होंने कहा कि सभी सरकारी भवनो, व्यवसायिक परिसरों में पानी के रीचार्ज के लिए प्लांट लगाए जायेंगे तथा 500 गज या इससे अधिक प्लाट धारकों को भी घर में रीचार्ज प्लांट लगाने को आवश्यक बनाया जाएगा। गांवों में भूजल को रीचार्ज करने के लिए जोहडों को गहरा किया जाएगा। उन्होंने पंचायत अधिकारियों को निर्देश दिए कि जोहडों को साफ करवाया जाए और उनमें पडा पोलिथीन निकलवाया जाए, क्योकिं पोलिथीन की वजह से पानी जमीन में नही समा सकता। उन्होंने जिले के किसानों से भी कहा कि वे फसल विविधिकरण को अपनाएं क्योंकि इनमें पानी का कम खर्च होता है। उन्होंने किसानों से कहा कि साठी धान ना लगाए ,इसमें पानी का खर्च बहुत अधिक होता है। श्री मलिक ने लोगों को आगाह किया कि भूजलस्तर इतना घट चुका है कि यह समस्या गम्भीर रूप धारण कर चुकी है। उन्होंने कृषि विभाग के उप निदेशक को जिले के टयूववैलों का सर्वे करने को कहा और इस कार्य के लिए उन्हे नोडल अधिकारी बनाया। उन्होंने राजस्व विभाग, पंचायत विभाग ,सिंचाई विभाग तथा नगरपालिका के अधिकारियों को निर्देश दिए कि इस कार्य में कृषि विभाग का सहयोग करें। उन्होंने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिए कि वे अपने स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों में गिरते भूजल स्तर के प्रति लोगों को सचेत करें और इससे निपटने के तरीके बनाएं। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को इस कार्य में योगदान देना होगा ताकि आने वाली पीढियां पानी से वचिंत न रहे।

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