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आज भी पानीदार है – छत्तीसगढ़ : भाग-1

राकेश दीवान

छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख शहर है राजनांदगांव, जो देश की शुरुआती कपड़ा मिलों में से एक 'बंगाल-नागपुर काटन मिल्स' (बीएनसी मिल्स) और उसी जमाने के संघर्षशील मजदूर यूनियन के कारण जाना जाता है। लेकिन वहां के चिमटा बजाकर भजन गाने वाले बैरागी राजाओं द्वारा बनवाया गया विशाल रानीसागर तालाब और शिवनाथ नदी से भाप के इंजन लगाकर लाए गए पानी और उसके वितरण के लिए बना इलाके का पहला 'वाटर वर्क्स' उतने प्रसिद्ध नहीं हैं।

इसी राजनांदगांव में वर्षों पहले बनी इलाके की पहली नगर पालिका ने ऐसे तीन फैसले लिए थे जिनका संबंध पानी या पानी के स्त्रोतों से था। 22 दिसंबर 1889 को हुई पहली, 2 फरवरी 1890 को हुई दूसरी और 2 जुलाई 1892 को हुई अपनी तीसरी बैठक के दौरान बनी एक समिति ने एक तो गंज के कुएं पर 153 रुपए आठ आने, अस्पताल के कुएं पर 405 रुपए और बाजार के कुएं पर 293 रुपए छह आने यानी कुल 851 रुपए 14 आने खर्च की रकम मंजूर की थी। दूसरे फैसले में गंज के तालाब में नहाने धोने की पाबंदी को हटा दिया गया था ताकि लोगों को इससे होने वाली परेशानियों से बचाया जाए। तीसरे फैसले में पुलिस महकमें को हर घर के सामने पानी से भरे दो घड़े रखवाने का आदेश दिया गया था ताकि आग लगने पर बुझाया जा सके। उन दिनों फायर ब्रिगेड जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी।

स्थानीय निकाय की इस जनहित की कार्यवाही के 64 साल बाद समाज ने भी पानी के प्रति ऐसा ही एक और सरोकार दिखाया था। 1954-55 में शहर के प्रतिष्ठित व्यवसायी बजरंग महाराज ने भरकापारा के तालाब की गंदगी से दुखी होकर आमरण अनशन की घोषणा की थी। सरकार या किसी स्थानीय निकाय की बजाय समाज को चेताने के लिए किया गया यह अनशन कुल तीन दिन चला था कि समाज ने तालाब की सफञई का काम उठा लिया।

पत्रकार और तब के युवा रमेश याज्ञिक बताते हैं कि पूरे शहर के गरीब-अमीर, जातियों के बंधन तोड़कर दो-दो घंटे तालाब पर स्वेच्छा से काम करते थे। कुछ ही दिनों में आज के बस स्टैंड के पास मौजूद भरकापारा तालाब अपने निर्माण के सौ सवा सौ साल बाद साफ कर दिया गया। पानी या प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सरोकार के ऐसे उदाहरणा दरअसल संपन्न समाजों के लक्षण हैं और संपन्नता सिर्फ पैसे धेले से नहीं नापी जाती।

इतिहास पर धूल को जरा सा झाड़कर देखें तो छत्तीसगढ़ में 'पर्वतदान' सरीखी परंपराएं आसानी से देखी जा सकती हैं। पर्वतदान यानी अच्छी फसल पकने पर धान के बड़े-बड़े पहाड़नुमा ढेर बनाकर उसके बीच सोना, चांदी पैसा आदि गुप्त रूप से रखकर दान करने की परंपराएं अभी कुछ साल पहले तक कई गांवों में आम बात थी। गतौरी, रतनपुरा, खैरा-
डगनिया, मुंगेली, ब्रम्हदा, मल्हार आदि कई गांवों में 'पर्वतदान' होते थे।

रतनपुर में तो अभी 1950-51 के साल तक 'पर्वतदान' किए गए थे। आज के कृपण मन को यह जानकारी चौंका सकता है। पर्वतदान करने वाले गांव आज भी विपन्न तो नहीं कहे जा सकते।

छत्तीस गढ़ों वाले छत्तीसगढ़ की इस संपन्नता का कारण जाहिर है घने, हरे भरे जंगल और धान पैदा कर पाने के लिए उत्तम जलवायु वाली धरती। असल में छत्तीसगढ़ भौगोलिक रूप से एक कटोरे के आकार का इलाका है। आसपास के पहाड़ों से घिरी और बीच में मैदान की तलहटी एक कटोरे का आकार बनाती है। छत्तीसगढ़ को, उत्तर में सतपुड़ा की ऊंची-नीची जमीनों के बीच में महानदी और उसकी सहायक नदियों का 80 से 100 मील लंबा मैदान और दक्षिण में बस्तर का पठार, इन तीनों भागों में बांटा जा सकता है। मैकल, रायगढ़ और सिहावा पहाडियों से घिरे तथा महानदी और उसकी सहायक शिवनाथ, मांड़, खारून, जोंक, हसदो आदि नदियों से सिंचित इस इलाके में औसतन साठ इंच वर्षा होती है। लगभग 51888 वर्गमील में फैला और दो करोड़ से अधिक आबादी वाला छत्तीसगढ़, रायगढ़, कोरबा, कवर्धा, जांजगीर, जशपुर, कोरिया, बिलासपुर, सरगुजा, रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, धमतरी, महासमुंद, कांकेर, दंतेवाड़ा और बस्तर जिले में समाया है। पानी की व्यवस्था भी भूगोल की इसी बनावट के आधार पर हुई है।

पहाड़ों और उनके घने जंगलों के कारण बारहमासी नदियां-सोते भरे पड़े हैं। वहीं मैदानी क्षेत्रों में असंख्य तालाबों, डबरों का ताना-बाना रचा गया है। पहाड़ी इलाकों में हर कहीं पानी की इफरात है और लोग भी कम रहते हैं इसलिए आमतौर पर कोई पक्का ढांचा बनाकर उसे साल भर रखने का पुख्ता इंतजाम नहीं किया गया है। लेकिन मैदानी क्षेत्रों को बरसात का पानी पूरे साल वापरना होता है और कभी-कभी मौसम की नाराजगी से ना गिरने वाले पानी की भरपाई भी करनी होती है। इसलिए यहां छोटे-बड़े कई तरह के तालाबों, डबरियों, बंधिया-बंधानों आदि की कारगर व्यवस्था की गई है।

क्रमश:
साभार- http://www.cgnet.in/W/Rakesh/rakeshdiwan1

आज भी पानीदार है – छत्तीसगढ़ : भाग-2

राकेश दीवान
जँगल, पहाड़ों के इलाके में नई-पुरानी हर बसाहट छोटी-छोटी नदियों, नालों के आसपास हुई है। इनके बारे में साल के कुछ महीने पानी होने की प्रचलित आम समझ के उलट घने जंगलों के कारण इनमें बारहों महीने पानी बना रहता है। रोज के निस्तार और थोड़ी बहुत सिंचाई के लिए तो इनसे सीधे ही पानी ले लिया जाता है, लेकिन पीने के पानी में थोड़ी सावधानी बरती जाती है। नदी, नालों के किनारे की रेत को थोड़ा-सा खोदकर बनाए गए गङ्ढे से मिलने वाला छना हुआ साफ पानी पीने के काम आता है। पानी इनमें धीरे-धीरे झिरकर इकट्ठा होता है इसलिए इनहें झिरिया या झरिया कहा जाता है। कभी-कभी इनहें 2-3 हाथ खोदकर गहरा कर देते हैं और तब इनहें नाम दिया जाता है- 'झिरिया कुआं।' कुछ बस्तियां पहाड़ों से निकले सोते के पानी को पीने के काम में लाती हैं। इन स्रोतो को 'तुर्रा' कहा जाता है। पहाड़ों की तलहटी में बसे कई गांवों को जंगलों के कारण रुका हुआ पानी धीरे-धीरे
मिलता है। बीच खेत में 3 से 4 हाथ तक खोदकर पानी लेने के तरीके को 'ओगरा' कहते हैं। दरअसल पानी से जुड़ी पध्दतियां सिर्फ संज्ञा ही नहीं क्रियाएं और प्रक्रियाएं भी होती हैं। मसलन झिरिया सिर्फ पहाड़ों में ही नहीं बल्कि कहीं भी इस तरह से मिलने वाले पानी की प्रक्रिया को कहते हैं। ये झिरियाएं छोटी-मोटी नदी का स्रोत होती हैं। रायपुर के पास से बहने वाली खारुन नदी पर 20-22 कि.मी. पीछे जाएं तो ऐसी 8- 10 झिरियाएं नदी में पानी डालती देखी जा सकती हैं। एक अनुमान के अनुसार महानदी के इलाके में करीब सौ जगहों पर ऐसी सततवाही झिरियाएं मिल सकती हैं। इसी तरह 'ओगरा' आगोर यानी 'जलग्रहण क्षेत्र से मिले पानी के कारण निर्मित स्रोत को कहा जाता है। छत्तीसगढ़ के पहाड़ी क्षेत्रो में पेयजल का एक बारहमासी स्रोत होता है जिसे रायगढ़, सरगुजा के इलाके में ढोढ़ी, डाढ़ी या तूसा कहते हैं और बस्तर, सिहावा के इलाके में तूम। उरांव भाषा में पेड़ों के खोखले तने को ढोढ़ कहते हैं और शयद मारिया भाषा में तूम का भी यही अर्थ होता है। यह पहाड़ों की तराई में खेतों के बीच आपरूप फूटा पानी का सोता होता है। 3-4 हाथ गहरे इन स्रोतों को पानी में सदियों टिकी रह पाने वाली जामुन या सरई की लकड़ी के खोखले तने से पाट दिया जाता है। कभी-कभी ये स्रोत चौड़े हो जाते हैं और तब इन्हे जामुन या सरई की लकड़ी की ही चौकोन पाटी बनाकर पाटा जाता है। जामुन, सरई, सागौन और सिघँदर जिसे उरांव भाषा में खोखड़ो कहते हैं पानी में टिकी रह सकने वाली लकड़ी होती है। एक कहावत है कि सरई
के पेड़ 'सौ साल खड़े, सौ साल अड़े सौ साल पड़े तभो ले नइ सरे (सड़े)'। 'तूम' या 'ढोढ़ी' में पानी की आवक एक तो जंगल के पेड़ों में रुके पानी के धीरे-धीरे झिरने से होती है और दूसरे पूरे खेत के आगोर से भी इन्हे पानी मिलता है। बाजारों में मिनरल वाटर के नाम पर बिकने वाले पानी से कई गुना साफ और निर्मल पानी देने वाली ढोढ़ियां या तूम छतीसगढ़ के लगभग हर पहाड़ी गांव को पानी पिलाती हैं। रायगढ़ जिले के कस्बे पथलगांव के सूखे कठिन
समय में पानी देने का काम करने वाली प्रेमनगर और ढोढ़ीटिकरा मोहल्ले की दो ढोढ़ियां अब भी लोगों की याद में बसी हैं। जशपुर नगर में हर कभी नगरपालिका का टेंकर तालाब के किनारे बनी पक्की डाढ़ी से पानी लेकर शहर में बांटता देखा जा सकता है। लोगों का कहना है कि महीने में बीस-बाइस दिन तो बिजली फेल हो जाने, पंप बिगड़ जाने या पाइप लाइन फट जाने से लावा नदी से लाई जाने वाली नगरपालिका की जलवितरण व्यवस्था ठप पड़ी रहती है। ऐसे में सदियों पहले बनी और सन 35-36 में पक्की की गई यह पक्की डाढ़ी पूरे कस्बे की पेयजल की जरूरतें पूरी करती है। पहाड़ी इलाकों के निचाई के कई खेतों को पझरा खेत इसलिए कहा जाता है क्योँकि इनमें आसपास से पानी पझरता या रिसता रहता है। इन खेतों में 6-7 हाथ के गङ्ढे बनाकर ऊपर लकड़ी रखकर पानी निकाला जाता है। इस तरह उथले कुंओं, ढोढ़ियों और नदी-नालों से पानी निकालने के लिए टेढ़ा उपयोग किया जाता है। टेढ़ा यानी एक लंबी मजबूत लकड़ी के पीछे पत्थर का वजन और आगे के सिरे पर रस्सी से एक बर्तन बांधकर बीच के खूंटे पर टिकाया जाता है। बच्चो के खेल की तरह की इस पध्दति में पानी उलीचने के अलावा कमर-पीठ की कसरत भी होती है और लोगों का कहना है कि टेढ़ा से पानी निकालने के कारण वे पीठ दर्द, कमर दर्द आदि की झंझटों से मुक्त रहते हैं।
टेढ़ा से निकले पानी को बांस या फिर सरई की लकड़ी के पाइप यानी 'डोंगा' के जरिए बाड़ी में पहुंचाया जाता है। असल में टेढ़ा का पानी आमतौर पर घर के पिछवाड़े साग-भाजी के लिए रखी गई बाड़ी में ही पहुंचाया जाता है। पझरा खेतों में कहीं-कहीं छोटे-मोटे तालाब भी बन जाते हैं और इन्हे तरई, डबरी, खुदरी, खुदरा या खोदरा भी कहा जाता है। बस्तर के अबूझमाड़ इलाके में भी पानी तो झिरिया, नदी, नालों से ही लेते हैं लेकिन इनके किनारे बनाए जाने वाले 'चुहरा' या 'तूम' को बांस की चटाई से पाट दिया जाता है। कहीं-कहीं नए लोगों ने पीपा के टीन को भी पाटने के काम में लगाया है। बरसों से सरकारी अनुमति लेकर ही प्रवेश कर पाने वाले इस इलाके में पानी के लिए पहाड़ों से बारहमासी सोते होते हैं, छोटी-छोटी नदियां नाले हैं और जगह-जगह तूम हैं। पहाड़ों से गिरने वाले पानी से बांस का पाइप लगाकर यहां भी नल का मजा ले लिया जाता है। आमतौर पर तरई करीब एक एकड़ की छोटी तलैया होती है और तलैया करीब आधा एकड़ की। ये तरई, तलैया पानी के आसपास के पहाड़ों से रिसने या झिरपने के कारणा बन जाती है और इनका पानी पीने लायक भी होता है। इन तरई, तलैयों में कई तरह की वनस्पति, फूल पैदा किए जाते हैं जिनसे पानी साफ बना रहता है। इनमें बोडेंदा फूल ऐसी वनस्पति है जिससे पानी तो साफ रहता ही है लेकिन गर्भवती महिलाओं को खिलाने से भी फायदा होता है। शयद इस फूल में लोहत्तव की मात्रा रहती है। इसी तरह जलकनी, कस्सा घाँस आदि भी पानी की सफाई के उपयोग में लाई जाती है। तूम या ढोढ़ी के अलावा पेयजल, निस्तार और सिंचाई का एक और सर्वव्यापी साधन कुंआ या चुंआ होता है। जंगलों, पहाड़ों से रिसने वाले पानी और व्यापक रूप से तालाबों की मौजूदगी में छत्तीसगढ़ में कुंओं को खोदना आसान होता है। भूजल स्तर काफी उथला होता है और इनमें लगातार पानी की आवक भी होती रहती है। कुंआ खोदने का काम तो हालांकि गांव समाज के सामान्य ज्ञान के आधार पर कोई भी कर लेता है लेकिन इनकी ठीक जगह
जहां से निर्बाध पानी मिलता रहे, बताने वाले विशेषज्ञ कुछ ही होते हैं।
ये विशेषज्ञ अपनी-अपनी तरकीबों से पानी की उपलब्धता मात्रा , चट्टानें गहराई आदि का ठीक-ठाक हिसाब लगाकर बता देते हैं। आधुनिक जल विशेषज्ञो के पास इस ज्ञान का अब तक कोई तर्क या विज्ञान नहीं बन पाया है लेकिन कमाल है कि ग्रामीण विशेषज्ञो की बताई जगहों पर कुआं खोदने पर इक्का दुक्का अनुभवों को छोड़ दें तो सौ टंच सही पानी मिल ही जाता है। (जारी)

आज भी पानीदार है – छत्तीसगढ़ : भाग-3

राकेश दीवान

बिलासपुर जिले के डभरा गांव के पास एक जोसी है जिनके बारे में कहते हैं कि उन्हे जमीन में पानी की आवाज सुनाई देती है। वे सिर्फ धरती माता पर कान लगाकर बता देते हैं कि कितने हाथ पर कैसा कितना पानी और बीच में कितने हाथ पर रेत और पत्थर मिलेंगे। ये जोसी सबरिया जाति के
हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि ये चूंकि आंध्रप्रदेश से बरसों पहले सब्बल लेकन मिट्टी का काम करने के लिए यहां आए थे इसलिए उन्हे सब्बलिया या सबरिया कहा जाता है। एक नाता रामायणा की प्रसिध्द शबरी से भी बैठाया जाता है। जिसने साक्षात भगवान को ही जूठे बेर इसलिए खिलाए थे ताकि उन्हे खट्टे या जहरीले फल न मिलें। सबरिया इसी शबरी भील के वंशज बताए जाते हैं। इसी तरह बस्तर के कोंडागांव में पूर्व कृषि अधिकारी श्री उइके हैं जो कमर में जामुन की डगान बांध कर कुआं खोदने के प्रस्तावित क्षेत्र में घुम जाते हैं। यह करते हुए उनकी जामुन की मामूली डगान उन्हे बता देती हैं कि कहां पर कुआं खोदना सबसे उपयुक्त होगा । श्री उइके का कहना है कि आज तक सिर्फ दो जगहों पर वे कुछ कारणो से फेल हुए हैं हालांकि उन्हे दूर दराज के इलाकों से बुलाकर कुआं खोदने की जगहों की पहचान करवाई जाती है। ऐसे ही एक गुनिया हैं जो बैठे बैठे जमीन की गरमी ठंडाई का अंदाजा लगाकर पानी होने न होने की बात बता देते हैं। वे मानते हैं कि जहां जमीन ठंडी होगी वहां जरूर पानी होगा। चांपा के पास एक बाबा थे जिन्हे रसातल की आवाज सुनाई देती थी। वे इसे सुनकर पानी की पक्की जानकारी दे देते थे। एक और तरीका नदी नाले सरीखे जलस्रोत से एक पत्थर लाकर उसे धागे में बांधकर जमीन पर फिराने का है। जहां यह पत्थर घुमना शुरू कर दे वहां पानी माना जाता है और यह जितनी बार .घुमे उतने हाथ पानी होगा। इस तरीके से चट्टानों और उनकी मोटाई का पता भी चल जाता है। हालांकि यह बहुत कम लोगों के बस की बात है। लेकिन इस तरह बने कई कुंज आज भी मौजूद हैं। छत्तीसगढ़ और देश के दूसरे इलाकों में थोड़ी विनम्रता से देखें तो कई ऐसे विशेषज्ञ मिल जाएंगे जो निन्यानबे प्रतिशत तक सही साबित होते हैं। इतनी ग्यारंटी तो हमारे बाकायदा पढ़े लिखे विशेषज्ञ भी नहीं दे पाते।

सही जगह मिल जाने पर कुआं खोदने का काम होता है। पूस, मास या अधिक से अधिक चैत तक कुआं खोदने का काम शुरू हो जाता है। ताकि बैशाख-जेठ तक काम पूरा हो जाए। भर गर्मी के इन महीनों में पानी निकलने का मतलब होता है बारहों महीने पानी की आपूर्ति।

खुदाई के साथ साथ कुओं की चिनाई का काम भी चलता है। बांस तरी होने के कारणा पहचाने जाने वाले बस्तर में बांस की चटाई से कुएं पाटे जाते हैं। कई जगहों पर सरई या जामुन की लकड़ी के चाक बनाकर उन्हे कुओं में उतारा जाता है। ये चाक लकड़ी के चौकोन या वर्गाकार फ्रेम होते हैं जो कुएं में एक एक करके खुदाई के साथ ही उतारे जाते हैं। आज के उपयुक्त तकनीक के हल्ले में नई ईजाद कहकर बनाए जाने वाले मिट्टी के सस्ते रिंग और इसके लिए खड़ी की जाने वाली धनी संस्थाओं के बहुत पहले से इन आदिवासी कहे जाने वाले इलाकों में ये रिंग कुएं पाटने की जिम्मेदारी निभाते आ रहे हैं।भाठा जमीनों में जहां कुएं और तालाब नहीं खोदे जाते, को छोड़कर छतीसगढ़ के मैदानी क्षेत्रो में भी कुएं खूब हैं। रायपुर के पास के आरंग शहर में करीब 40 कुएं हैं और पूरे ब्लाक में कुओं की संख्या 3057 बताई गई है। दुर्ग में यूं तो पानी आम तौर पर खारा है लेकिन पूरे शहर को पेयजल देने वाले दो कुएं आज भी प्रसिध्द हैं जिनमें छीतरमल धर्मशाला का कुआं एक है। बस्तर के गांव फुक्का गिरोला में बना कुआं लकड़ी के रिंग या चौखट से पाटा गया है। इसमें इतना पानी है कि ऊपर से बहता रहता है।
इसके अलावा सिर्फ पत्थर से पाटकर बनाए गए चार कुएं भी इसी गांव में हैं जिनमें खूब पानी रहता है। (जारी)

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आज भी पानीदार है – छत्तीसगढ़ : भाग-4

राकेश दीवान
छत्तीसगढ़ के पहाड़ी क्षेत्रो में आबादी का घनत्व कम रहा है और उसकी पेट पूजा के लिए जंगल तैनात रहे हैं। नतीजे में अन्न की पैदावार को मैदानों की तरह का महत्व नहीं दिया गया। जंगल में पैदा होने वाली कई प्रकार की वनस्पतियां, फल, कंद, मूल भोजन का मुख्य आधार रहे हैं। अबूझमाड़ में आज भी नरम, कोमल बांस बांस्ता का पेय 'जावा' या माड़ियां पेज बहुत स्वाद से पिया जाता है और उसकी साग भी खाई जाती है। जंगल की सौगातों के अलावा पेंदा यानि झूम खेती करके उड़द, कोस्ता (कुटकी), बाजरा, माड़िया, झुणगा (बरबटी) और ककड़ी की फसलों से लोग मजे में जीते हैं। पानी के इंतजाम का तानाबाना भी खेती की इस पध्दति के अनुसार ही बनाया गया है।
करीब सौ-डेढ़ सौ सालों में सरकारी कायदे-कानूनों की आड़ लेकर लगातार जंगलों के छिनते जाने और नए जमाने के साथ एक जगह टिककर बस जाने के उत्साह में खेती पर भी जोर दिया जाने लगा और नतीजे में पानी के बड़े और स्थाई भँडार बनाने की जरूरत भी पैदा हुई। रायपुर-जगदलपुर मार्ग पर स्थित राज्य की पुरानी राजधानी बस्तर गांव में कहा जाता है कि 'सात आगर सात कोरी' यानि 147 तालाब होते थे। कोरी कम मतलब है बीस और इसके सात अतिरिक्त। गौंड सरदार जगतू के इलाके जगतमुडा को जब राजा दलपतदेव ने सन् 1772 के आसपास अपनी राजधानी बनाकर जगदलपुर नाम दिया तो वहां पहले से मौजूद झारतरई, गोंडन तरई और शिवना तरई को मिलाकर दलपतसागर तालाब भी बनाया। यह तालाब चार मील यानि करीब सवा तीन सौ एकड़ में फैला था और इसे समुंद यानि समुद्र कहा जाता था। इसके पहले नागवंशी राजाओं की राजधानी बारसूर में 1070 ई. से 1111 ई. के बीच चंद्रादित्य समुंद्र नामक तालाब बनाया गया था और इसके बीच में चंद्रदित्येश्वर मंदिर का निर्माण भी करवाया गया था। कहा जाता है कि राजा चंद्रादित्य बस्तर के नागवंशी राजा सोमेश्वर देव के ससुर थे और मंदिर तथा तालाब निर्माण करने के लिए उन्होने अपने
दामाद से पूरा गांव ही खरीद लिया था। छतीसगढ़ के पहाड़ी क्षेत्रो के कई कस्बों, शहरों और राजधानियों में तालाब बनाए जाते रहे हैं। कहते हैं कि आज का तीन चौथाई रायगढ़ शहर तालाबों पर बसा है। शहर की सब्जी मंडी, कॉलेज, बाजार, बस स्टै.ड कई तरह के रहवासी और दुकानों के काम्पलेक्स और समाज भवन इन्ही पुराने तालाबों पर बने हैं या बनाए जा रहे हैं। स्टेडियम के लिए तालाब पर निर्माण करने का तो शहर में जमकर विरोध किया गया था। इसी तरह जशपुर, अंबिकापुर, प.थलगांव, कोंडागांव, दंतेवाड़ा, नारायणपुर आदि कस्बों-शहरों में तालाबों का तानाबाना बनाया गया था। ये तालाब मुख्यत: पेयजल, निस्तार और कहीं-कहीं सिंचाई के काम के होते थे।
रायगढ़ के आसपास लोगों ने सिंचाई से ज्यादा अहमियत जमीनों को खेती योग्य बनाने को दी। इसके लिए अपेक्षाकृत नई पद्धति विकसित की गई जिसमें ऊंचाई से आने वाले नालों को बंधान या मूड़ा बांधकर रोका जाता है। इस तरह से मिट्टी का कटाव-बहाव रूकता है और कुछ दिनों में पूरा बंधान भर जाता है। इस नए खेत के बाजू से एक नहर, जिसे पैड़ी या पाइन कहते हैं, के जरिए पानी निकाला जाता है। धीरे-धीरे सीढ़ीनुमा खेत और उन्हे पानी देने के लिए बाजू से निकलने वाली एक छोटी नहर तैयार हो जाती है। इस तरह से बनी जमीनों को 'गड्डी खल' यानि गाद से बनी जमीनें कहा जाता है। गाद भर जाने को उराव भाषा में 'पट्टी केरा' कहते हैं। इस तरह बनी पाइन आगे के खेतों को भी पानी पहुंचाती है। रायगढ़ के ग्रामीण इलाकों में इस तरह से बनाए गए कई खेत दिखाई देते हैं। अभी कुछ साल पहले 'छतीसगढ़ मुक्ति मोर्चा' के कुछ लोग 'नर्मदा बचाओ आँदोलन' के निमाड़-मालवा के संपन्न क्षेत्रो में गये थे और वहां तालाबों की कमी को पानी की गरीबी मानकर भौचक्के थे। वे यह सोच भी नहीं सकते थे कि कोई गांव बिना तालाब के भी रह सकता है। छतीसगढ़ और खासकर वहां के मैदानी क्षेत्रो के लगभग हरेक गांव कभी-कभी एक, दो और अक्सर कई तालाबों से भरे-पूरे रहते हैं। कई गांवों में कहा जाता है कि 'छै आगर, छैर कोरी' यानि की 126 तालाब होते हैं।
भूगोल के हिसाब से देखें तो इसकी वजह यहां की गिट्टी की बनावट दिखाई देती है। मोटे-तौर पर छतीसगढ़ की मिट्टी को चार प्रकारों में बांटा जा सकता है। पहला होता है-भाठा। यह कड़ी और थोड़ी ऊंचाई पर होती है इसलिए इसमें बसाहट तो हो सकती है लेकिन उत्पादन नहीं होता। कई-कई किलोमीटर में फैली ऐसी भाठा के कारण तालाब भी बन जाते हैं। लेकिन इनमें पानी नहीं ठहरता। अलबत्ता ऐसी अनुत्पादक मिट्टी में भी आम और सागौन के विशाल बगीचे मिल जाते हैं। भाठा के बाद की दूसरी मिट्टी को मटासी कहा जाता है। इस मिट्टी में तालाब और कुएं बनाए जाते हैं क्योँकि इसमें जलस्तर करीब 25 फुट पर रहता है। मटासी के बाद तीसरी तरह की मिट्टी दुरसा या ढोर्सा कही जाती है। इसमें भी कुएं और तालाब बनाए जाते हैं, जिनमें बारहों महीने पानी रहता है। चौथी मिट्टी को कन्हार या कछार कहा जाता है। यह सबसे नीचे और नदी, नालों की सतह के बराबर होती है। सबसे बेहतरीन मानी जाने वाली इस मिट्टी में रेत भी रहती है। इसमें छोटे-कुएं या झिरिया तो बनाई जाती है लेकिन तालाब नहीं बनते। इसमें पानी का स्तर आमतौर पर 15 फुट के आसपास रहता है। कहा जाता है कि मानव बसाहट और संस्कृतियां जल-स्रोतों, नदियों, समुद्रों के किनारे बनी फली, फूली है लेकिन छ्त्तीसगढ़ में मानव बसाहट के साथ-साथ जल-स्रोत या तालाबों का निर्माण भी किया जाता रहा है। जमीनों की पहचान करके गांव बसाए जाते रहे हैं और उसी के साथ-साथ तालाबों की खुदाई भी होती रही है। आज के समाज में तो तालाब या कुंआ खोदना सभी को आता है लेकिन शुरूआत में संभवत: आंध्रप्रदेश और उड़ीसा से आने वाले मिट्टी खोदने के विशेषज्ञ यह किया करते होंगे। छ्त्तीसगढ़ में सबरिया जाति इसीलिए सब्बलिया या सबरिया कहलाने लगी है क्योँकि वे सब्बल से मिट्टी खोदने का काम कहते थे। उड़ीसा की प्रसिध्द जसमत ओढ़िन का किस्सा छ्त्तीसगढ़ ही नहीं पूर्वी भारत के उड़ीसा से लेकर मालवा-निमाड़ होता हुआ पश्चिम के गुजरात, राजस्थान तक फैला है। दुर्ग में एक लोकगीत है-
“ पहिले के रहिगे धार नगर , अबके दुरूग कहाय
धार नगर के च्म्पक भाँठा, डेरा बने नौ लाख”
आज के दुर्ग शहर में इंदिरा मार्केट से स्टेशन के रास्ते पर बना हरिनाबांधा चम्पक भाठा में नौलाख डेरे बनाकर रहने वाले इन्ही उड़िया लोगों ने राजा महानदेव के कहने पर खोदा था
“ नौ लाख ओढ़्निन , नौ लाख ओढ़िया,
नौ लाख परत हे कुदाल “
कहा जाता है कि तालाब खोदने का काम पुरूष करते थे और मिट्टी फेंकने का काम औरतें। इन औरतों के टोकनी झाड़ने से शिवनाथ नदी के पास 'टोकनी झिरनी' नाम की पहाड़िया बन गई थी।

साभार- http://www.cgnet.in/W/Rakesh/rakeshdiwan4

आज भी पानीदार है – छत्तीसगढ़ : भाग-5

छत्तीसगढ़ में ही एक ही जाति है-रमरमिहा। कहा जाता है कि मिट्टी के काम में ये लोग भी विशेष हुआ करते थे। हालांकि आज वे इसे नहीं मानते। उनका कहना है कि वे उसी तरह तालाब या कुआं खोदते हैं जैसे समाज के बाकी लोग। रमरमिहा दरअसल सतनामी जाति का ही एक अंग है। कहते हैं कि सन् 1776 में चारपारा गांव के एक मालगुजार परशुराम जी की नींद में किसी ने हाथ और माथे पर राम नाम गोद दिया और तबसे शुरू हुआ रमरमिहा संप्रदाय। परशुराम जी पहले गुरु हुए और महानदी के किनारे के पीरदा गांव में सन् 1911 में रमरमिहा संप्रदाय का पहला सम्मेलन या समुंद हुआ। चारपार गांव में पांच-छह एकड़ का मूड़ाबांधा तालाब, रामडबरी आदि इन्हीँ लोगों ने बनाए थे।

छत्तीसगढ़ के कई तालाबों को बंजारों ने भी बनाया था। ये बंजारे पालतू जानवर, नमक, रन, कपड़ा और मसाले का व्यापार करने के लिए गुजरात, राजस्थान से उड़ीसा तक आते थे और छत्तीसगढ़ उनके रास्ते में पड़ता था। बार-बार आने-जाने के कारण उन्होँने कई जगहों पर अपने अड्डे ही बना लिए थे और अपने जानवरों और खुद की जरूरत के पानी का स्थायी प्रबंध यानी तालाब, कुएं खोद लिए थे। आज के बालौद, बलौदा, बलौदा बाजार, बलदाकछार आदि जगहों पर एक जमाने में बैलों- का बाजार भरता था। तुलसी-बाराडेरा भी जानवरों का बाजार हुआ करता था। यहां आज भी एक बंजारा आम के पेड़ों की नीलामी के लिए आता है। मोतीपुर गांव में हीरा-मोती का व्यापार होता था। इसी तरह बंजारिन माता और बंजारी घाट भी कई जगह मिलते हैं। इन बंजारों ने मराठा और मुसलमान आक्रामकों को रसद पहुंचाने का काम भी किया था और इसीलिए मराठों ने उन्हे 'नायक' की पदवी दी थी। इन जगहों पर और बंजारों के नाम से दर्जनों तालाब, उनके किनारे छायादार पेड़ या अमराई और मंदिर मिलते हैं। इनके अलावा छत्तीसगढ़ की ही एक देवार जाति भी तालाबों को खोदने की विशेषज्ञ मानी जाती है। अघरिया जाति के लोग खेती
के लिए प्रसिध्द है और बहुत मेहनती होते हैं। किसी अघारिया की 20-25 एकड़ जमीन भी हो तो एक एकड़ में तालाब जरूर बनवाते हैं। ये तालाब जिन्हे डबरी कहा जाता है नहाने-धोने और जानवरों को पानी पिलाने के अलावा खेत में नमी बनाए रखने का काम करते हैं।


छत्तीसगढ़ के मैदानी भागों में खासकर बिलासपुर जिले के डभरा, मालखरौदा, किरारी जैसे गांव में ऐसी कई डबरियां देखी जा सकती हैं। शुरुआत में तालाबों के ये विशेषज्ञ यहीं बसते गए और धीरे-धीरे पूरे समाज ने इनके कौशल से सीखा। इस तरह आज भी भाषा में कहें तो 'ट्रांसफर ऑफ टेक्नालाँजी' यानी 'तकनीक का हस्तांतरण होता गया। जो काम एक जमाने में विशेषज्ञाता के दर्जे का था वह आजकल 'फुड फॉर वर्क' या 'काम के बदले अनाज' सरीखी सरकारी योजनाओं के चलते मामूली मजदूरी का काम हो गया है।

तालाबों को बांधने में सबसे पहले 'ओगरा', 'आगोर' या जिसे आजकल 'जलग्रहण क्षेत्र कहा जाता है देखा जाता है। आगोर अगोरना से बना है जिसका मतलब होता है समेटना। पानी की इस आमद को जानने के लिए किसी महंगे इंजीनियर या यंत्र की बजाए बरसों का अभ्यास और अनुभव ही काम आता है। आगोर से सिमटकर पानी तालाब की मुंही यानी मुंह के रास्ते पैठू में जाता है। पैठू एक तरह का छोटा तालाब या कुंड होता है जिसमें रुकने से पानी का कूड़ा-करकट, रेत और मिट्टी तलहटी में बैठ जाती है। अब यह साफ और निथरा पानी मुख्य तालाब में जाता है। लबालब भर जाने के बाद पानी तालाब के 'छलका' से पुलिया या पुल के रास्ते निकलकर अगले तालाब के पैठू या खेत में या फिर किसी नदी, नाले से मिलकर आगे बढ़ जाता है। 'छलका' तालाब के छलकने पर पानी की निकासी के लिए बनाया गया अंग होता है।

तालाबों का आकार चम्मच की तरह पैठू की तरफ उथला और छलका की तरफ गहरा होता है। बरसात में लबालब भर जाने के बाद उपयोग करने और भाप बनकर उड़ जाने के कारण पानी धीरे-धीरे कम होता जाता है। यह प्रक्रिया खुली और चौड़ी सतह से ज्यादा तेजी से होती है क्योँकि सूर्य की किरणेँ ज्यादा हिस्से पर अपना प्रभाव जमा पाती हैं। लेकिन कम होते जाने के कारण पानी छलका की तरफ के गहरे हिस्से में ही बचता है और वहां सूर्य की किरणेँ को ज्यादा सतह नहीं मिलती। नतीजे में भाप बनने की प्रक्रिया भी धीमी हो जाती है। चम्मच के आकार की बनावट तालाब के पानी को वाष्पीकरण से बचाने के लिए की जाती है।


आमतौर पर तालाबों के किनारे अमराई और मंदिर रहते हैं जिनसे इस पूरे क्षेत्र में छाया और पवित्रता बनी रहती है। कहावत भी है कि 'कहां देखओ अइसन तरिया जहां आमा के छांव'। छत्तीसगढ़ में कई प्रसिध्द और ऐतिहासिक मंदिर तालाबों के किनारे ही पाए जाते हैं। पाली, जांजगीर, शिवरीनारायण मंदिर हसौद, रायपुर, रतनपुर, सिरपुर आदि के ऐतिहासिक तालाबों और मंदिरों का निर्माण साथ-साथ ही हुआ था।

आज भी पानीदार है – छत्तीसगढ़, भाग 6

बड़े-बड़े तालाबों में उठने वाली विशाल लहरों को तोड़ने में इन मंदिरों की खास भूमिका होती है। बड़े जल भंडारों में हवा के कारण उठने वाली पल्लरें धीरे-धीरे तालाबों की पाल को तोड़ती है। इससे बचने के लिए बीच तालाब में मंदिर निर्माण किया जाता है। इसके अलावा बड़े तालाबों को खोदने से निकली मिट्टी को फेंकने के लिए दूर तक जाना पड़ता है। इससे बचने के लिए भी एक समय के बाद तालाब के बीच में ही मिट्टी फेंकी जाने लगती है। इस तरह से बीच तालाब में बने टीले पर मंदिरों का निर्माण किया जाता है। कभी-कभी इस जगह पर छोटा-मोटा बगीचा भी लगा दिया जाता है। जगदलपुर के जगतदेव तालाब या रायपुर के बूढ़ातालाब के बीच में बने शिव मंदिर इसी वजह से बनाए गए हैं। आखिर शिवजी पर्यावरण के रक्षक देवता ही तो होते हैं।

मोटे-तौर पर देखें तो आबादी की पेयजल व निस्तार की जरूरतों के लिए तालाबों की शृंखला बनाई जाती है और सिंचाई तथा जानवरों के लिए कई बार अकेले तालाब। सारंगढ़, रतनपुर, रायपुर, जांजगीर, आरंग सरीखे कस्बों, शहरों में तालाबों की इस शृंखला में पीने और भोजन पकाने के पानी के लिए एक या दो तालाब खासतौर पर बनाए जाते हैं। इनमें सफाई बनाए रखने के नियम-कायदे होते हैं। लेकिन जानवरों या सिंचाई के लिए ढलानों पर पानी रोककर बंधिया, बंधा या बंध बनाए जाते हैं। कई जगह पुरानी नदियों के रास्ता बदलने से 'सरार' या गङ्ढों में भी पानी इकट्ठा हो जाता है। मध्य छत्तीसगढ़ में खोचका, खुचका, तरिया, डबरा या डबरी पाए जाते हैं जो आकार में छोटे
तालाब ही होते हैं।

बड़े और बारहमासी तालाबों में 'दहरा' या 'दहारा' यानी की धारा पाई जाती है। तल में निकली इस धारा का स्रोत कहीं और होता है तथा यह तालाब को लगातार पानी देती रहती है। इस धारा के लिए तीन से चार हाथ तक के गङ्ढे भी किए जाते हैं। कई जगह तालाबों की तलहटी में कुएं खोद दिए जाते हैं। जगदलपुर, कोंडागांव, रायपुर आदि शहरों में इस तरह के कुएं भीषण अकाल में भी तालाबों को पानी देते रहते हैं। इन कुओं की चिनाई भी की जाती है।

आमतौर पर तो तालाबों में भिन्न-भिन्न जातियों के लिए पत्थर रखे जाते हैं ताकि उन पर बैठकर स्नान या कपड़े धोने जैसे काम किए जा सकें। लेकिन खास तालाबों पर बहुत सुंदर घाट बनाए गए हैं। राजनांदगांव के राजा बलरामदास ने रानी सागार तालाब में ऐसे विशाल घाट और तैरने के लिए बुर्ज बनाने का ठेका दिया था। तब के ठेकेदार शिवरतनलाल ने काम तो कर दिया लेकिन उन्हेँ या उनके परिवार को बकाया दस हजार रुपए आज तक नहीं मिले। राजा बलराम दास ने अपनी वसीयत में इसका जिक्र भी किया है। रायपुर, जशपुर, रायगढ़, सारंगढ़, रतनपुर और जगदलपुर सरीखे कस्बों, शहरों में आज भी ऐसे तालाब देखे जा सकते हैं जिन पर सुंदर घाट और बुर्ज बने हैं। सारंगढ़ के राजा के बारे में कहा जाता है कि उन्होँने अपने तालाब पर आने वाले पक्षियों का शिकार करने के लिए चारों तरफ ऐसे बुर्ज बनवाए थे जहां से छिपकर गोली चलाई जा सके। ऐसे शिकारियों में क्रिप्स कमीशन वाला प्रसिध्द अंग्रेज लार्ड क्रिप्स भी हुआ करता था।

आज की तरह उन दिनों तालाब खोदकर तुरत-फुरत पानी उलीचने की उतावली नहीं रहती थी। आखिर तालाब खोदना इष्टापुर्त धर्म यानी परमार्थ के लिए किया जाने वाला पुण्य का काम माना जाता था। बगीचे लगवाना, तालाब खुदवाना, राजाओं-जमीदारों का कर्तव्य माना जाता था। दानी, समाजसेवी संपन्न लोगों के लिए ऐसे लोकोपकारी काम
करवाना पुण्य माना जाता था। इस काम में समाज को संबोधित किया जाना अभिष्ठ था। तालाब यदि व्यक्तिगत उपयोग के हों तो पूजा करना जरूरी नहीं था लेकिन सार्वजनिक तालाबों की पूजा जरूरी थी। इसमें देवताओं को साक्षी मानकर अपने पर्यावरण के कर्ज को उतारने जैसा लोकार्पण का भाव रहता था। सबसे पहले जलदेवता वरुण का यूप या स्तंभ प्रतिष्ठित किया जाता था। यह यूप सरई या साल की लकड़ी का होता था। यूप प्रतिष्ठा संस्कार के बारे में 'प्रतिष्ठा महोदधि' नामक ग्रंथ में विस्तार से बताया गया है। विशेष और विशाल तालाबों के लोकार्पण के इन विधि-विधानों के अलावा लोकजीवन में आज भी तालाबों के विवाह की परंपरा जारी है। मान्यता है कि विवाह
हुए बिना किसी भी तालाब का पानी पीने योग्य नहीं होता।

तालाब विवाह या विहाव राजस्थान से आई परंपरा मानी जाती है जिसमें स्तंभ पति का प्रतीक माना जाता है। इस तरह से कुओं के भी विवाह होते हैं। छत्तीसगढ़ के गांवों में आमतौर पर तालाब जोड़े से बनाए जाते हैं और इनके बाकायदा विवाह होते हैं। पूरे तालाब को सात बार सूत से बांधा जाता है, गौदान किया जाता है। यह परंपरा दरअसल तालाबों के लोकार्पण की मानी जाती है। तालाब विवाह में प्रतीक स्वरूप स्तंभ गाड़ने की परंपरा तो है ही लेकिन इन स्तंभों से पानी के स्तर का भी पता लगता रहता है। नियम है कि एक खास चिन्ह तक तालाब का जलस्तर उतर जाए तो फिर निस्तार, स्नान आदि की मनाही हो जाती है। मान लिया जाता है कि अब पानी कम बचा है और इसे किफायत से इस्तेमाल करने की जरूरत है। इन स्तंभों पर तालाब बनाने वालों के नामों के नामों के अलावा सुंदर कलाकृतियां उकेरी जाती थी। किरारी गांव में मिले और रायपुर के संग्रहालय में रखे ऐसे ही एक स्तंभ में बारहवीं शताब्दी के राजअधिकारियों के अलावा तालाब बनाने वालों के नाम भी खुदे पाए गए हैं।

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