भारत में सेनिटेशन की स्थिति-परिचय





दिल्ली में आयोजित (17-18 मई08) नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन सस्टेनेबल सेनिटेशन में तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री रघुवंश प्रसाद सिंह भारत में सेनिटेशन की स्थिति पर अपने विचार रखते हुए एक विकेंद्रीकृत सस्टेनेबल अप्रोच अपनाने के लिए आह्वान किया था।


Tags- Water, Sanitation, Panchayati Raj

समृद्धि के पीपल उगाने लगा है पीपलखूंट

बांसवाडा, आदिवासियों के उत्थान और आदिवासी क्षेत्रों के समग्र विकास के लिए मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे के संकल्पों को साकार करने की अनवरत् जारी श्रृंखला के अन्तर्गत राज्य सरकार ने प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों, ख्ाासकर मेवाड, वागड और कांठल में जनजाति विकास की कई योजनाओं और कार्यक्रमों का सूत्रपात कर बहुआयामी विकास के ऐतिहासिक परिदृश्य का दिग्दर्शन कराया है।
इसी कडी में आदिवासी बहुल प्रतापगढ जिले के सृजन और विकास का जो नवीन अध्याय शुरू हुआ है वह अपने आप में अपूर्व कदम तो है ही, आदिवासी क्षेत्रों के विकास में नए युग के उदय की आधारशिला भी रख रहा है। प्रतापगढ जिले के गठन के बाद प्रदेश की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे पहली बार प्रतापगढ जिले में कदम रख रही हैं और वह भी विकास के कई-कई आयामों के साथ।
पहली बार मुख्यमंत्री की यात्रा को लेकर शासन-प्रशासन से लेकर आम लोगों तक में उत्साह का अतिरेक दिख रहा है। मुख्यमंत्री प्रतापगढ जिले में अपने दौरे की शुरूआत बांसवाडा जिले से सटे पीपलखूंट क्षेत्र से कर रही हैं जो कि पहले बांसवाडा जिले का हिस्सा रहा है।
तहसील बनने से मिला सुकून पीपलखूंट क्षेत्र को
मुख्यमंत्री 22 अगस्त शुक्रवार को प्रतापगढ जिले की नवगठित पीपलखूंट तहसील का उद्घाटन करेंगी। अब तक पीपलखूंट में पंचायत समिति व उप तहसील का वजूद रहा था जिसे वर्तमान राज्य सरकार ने प्रतापगढ को जिला बनाकर तहसील के रूप में क्रमोन्नत कर दिया है।
इस तहसील में 27 ग्राम पंचायतें हैं जिनमें 18 पंचायतें बांसवाडा जिले से मिली हैं जबकि दो पंचायतें अरनोद तथा 7 पंचायतें प्रतापगढ पंचायत समिति से शामिल की गई हैं। पीपलखूंट में तहसील की स्थापना से आदिवासी बहुल समूचे क्षेत्र के लोगों को राजस्व और रोजमर्रा के काम-काज के लिए अब ज्यादा दूरी तय नहीं करनी पडेगी और जीवनचर्या और अधिक आसान हो जाएगी।
बोरीवानगढी बांध सुनाएगा खुशहाली का संगीत
मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे शुक्रवार को अपनी पीपलखूंट यात्रा के दौरान् बोरीवानगढी लघु सिंचाई योजना का लोकार्पण करेंगी। केसरपुरा ग्राम पंचायत अन्तर्गत बोरीवानगढी लघु सिंचाई योजना का कार्य जलसंसाधन विकास खण्ड बांसवाडा द्वारा कराया गया है। यह बांध स्थल बांसवाडा-प्रतापगढ मुख्य मार्ग पर पीपलखूंट से 18 किलोमीटर अन्तरंग पहाडी क्षेत्र में बनाया गया है।
इस बांध तक पहुंच के दो मार्ग हैं। बांसवाडा से पीपलखूंट, वहां से लाम्बाडाबरा व केसरपुरा तथा बोरी गांव। इस गांव से बांध स्थल पास ही है। इसी प्रकार बांसवाडा से माहीडेम, केलामेला व केसरपुरा से बोरी तक का रास्ता भी है।
माही नदी कछार के अन्तर्गत माही की सहायक एराव नदी के जल ग्रहण क्षेत्र के मध्य स्थानीय नाले के प्रवाह को अवरूद्ध कर बोरीवानगढी लघु सिंचाई योजना का निर्माण जल संसाधन विकास खण्ड बांसवाडा द्वारा किया गया है । इस योजना का निर्माण जनजाति वर्ग के लघु एवं सीमान्त काश्तकारों की भूमि में सिंचाई सुविधा उपलब्ध करवाने के मकसद से सन् 2006 में राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक द्वारा वित्त पोषित योजना में आरंभ किया गया।
योजना की पुनःरक्षित कुल लागत राशि लगभग पांच करोड 75 लाख रुपए आंकी गई है । योजनान्तर्गत सतही वर्षा जल संग्रहण हेतु कुल 573 मीटर लम्बा बांध बनाया गया है। इसमें मिट्टी के बांध की लम्बाई 410 मीटर है जबकि मिट्टी के अनुलग्नक बांध (सेडल डेम) की लम्बाई 70 मीटर है। अध्रिग्रहित जल निस्सरण के लिए 93 मीटर लम्बा वेस्टवियर बनाया गया है। इसमें उपयोगी जल भराव की गहराई 11 मीटर(सील स्तर से पूर्ण भराव स्तर तक) है।
जल संसाधन खण्ड बांसवाडा के अधिशासी अभियन्ता दीपक दोसी के अनुसार बांध से 493 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा प्रदत्त करने के सन्दर्भ में क्रमशः, 12.81 किलोमीटर एवं 6.78 किलोमीटर लम्बी दांयी मुख्य नहर एवं बांयी मुख्य नहर का निर्माण किया गया है। इससे 493 हैक्टर क्षेत्र में सिंचाई सुविधाओं का लाभ मिलने लगेगा। इनमें दांयी मुख्य नहर से 232 हेक्टेयर एवं बांयी मुख्य नहर से 261 हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी। इस बांध से आगामी रबी सिंचाई 2008-2009 में सिंचाई के लिए जल प्रवाहित किया जाएगा।
यह योजना पीपलखूंट क्षेत्र के कई गांवों के किसानों के लिए वरदान है। इस योजना से जनजाति समुदाय के लघु एवं सीमान्त कृषकों को खेती-बाडी के लिए ंसंचाई सुविधा प्राप्त होगी। इससे ख्ाासकर बोरी, वानगढी, राणा की हरवर, मोजल एवं हिंगोतों की हरवर आदि गांव के 205 जनजाति परिवारों को प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सम्बल प्राप्त होगा। प्रत्यक्ष सिंचाई लाभ के अतिरिक्त, भूगर्भीय जल स्तर में वृद्धि, मत्स्य पालन, सामाजिक वानिकी आदि प्रकल्पों के सन्दर्भ में परोक्ष लाभ अर्जित होंगे।
पीपलखूंट जैसे पहाडी क्षेत्र में बरसाती पानी के बहकर चले जाने तथा जल संग्रहण के अभाव की वजह से अकाल जैसे हालातों के बार-बार उत्पन्न हो जाने की स्थितियों पर भी इस लघु सिंचाई योजना से अंकुश लगेगा। इस जनजाति क्षेत्र के लिए बोरीवानगढी लघु सिंचाई योजना आदिवासियों के लिए प्रदेश सरकार का महत्त्वपूर्ण तोहफा है।
बोरीवानगढी लघु सिंचाई योजना का जल ग्रहण क्षेत्र 14.75 वर्ग किलोमीटर (5.69 वर्ग मील) पसरा हुआ है। इसमें कुल जल उपलब्धता 164.78 मिलियन घन फीट, कुल भराव क्षमता 96.89 मिलियन घन फीट( 2.744 लाख घनमीटर) तथा इसकी उपयोगी भराव क्षमता 87.20 मिलियन घन फीट( 2.469 लाख घन मीटर) है।
बोरीवानगढी लघु सिंचाई योजना के अन्तर्गत प्रभावित डूब क्षेत्र 38.69 हेक्टर है। इस बांध की कुल लम्बाई 573 मीटर तथा बांध की अधिकतम ऊँचाई 19.70 मीटर है। इसका सिंचाई क्षेत्र (सी.सी.ए.) 493 हेक्टर तथा प्रस्तावित सिंचाई क्षेत्र(आई.सी.ए.) 353 हेक्टर निर्धारित है। इस बांध से सिंचाई की तीव्रता 71.60 प्रतिशत है।
दांयी मुख्य नहर प्रणाली की लम्बाई 12.81 किमी. सिंचित क्षेत्र 261 हेक्टर तथा रूपांकित जल प्रवाह क्षमता 6.462 क्यूसेक है। इसी प्रकार बांयी मुख्य नहर प्रणाली की लम्बाई 6.78 किमी. सिंचित क्षेत्र 232 हेक्टर एवं रूपांकित जल प्रवाह क्षमता 5.40 क्यूसेक है। 5 करोड 70 लाख रुपये अनुमानित लागत(पुनः रक्षित) वाली यह योजना विधिवत रूप में सन् 2006 में आरंभ कर दो वर्ष की अवधि में पूर्ण कर ली गई।
मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे के हाथों शुक्रवार को लोकार्पित होने वाला बोरीवानगढी बांध निश्चय ही पीपलखूंट क्षेत्र में खुशहाली के पीपल उगाने में कामयाब होगा। इससे क्षेत्र के आदिवासियों में खुशहाली का दौर शुरू होगा और खेती-बाडी से खलिहानों में समृद्धि आएगी।

होगेनक्कल विवाद फिर गरमाया

बेंगलूर। तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच चल रहा होगेनक्कल विवाद एक बार फिर गरमाता लग रहा है। कर्नाटक सरकार ने एक सप्ताह में तमिलनाडु द्वारा कोई रास्ता नहीं निकालने पर प्रधानमंत्री से मुलाकात करने का फैसला किया है।

राज्य के जल संसाधन मंत्री बस्वराज बोम्मई ने कहा है कि यदि तमिलनाडु सरकार ने होगेनक्कल जल परियोजना से जुड़े मुद्दों पर रुख स्पष्ट नहीं किया तो राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट की शरण में भी जा सकती है। उधर, राज्य के मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा ने विवाद के हल के लिए प्रधानमंत्री से दखल देने की अपील की है।

तमिलनाडु ने कावेरी नदी पर होगेनक्कल में एक पेयजल परियोजना को पूरा करने का फैसला किया है, जिसका कर्नाटक में भारी विरोध हो रहा है। बोम्मई ने कहा कि परियोजना का संयुक्त सर्वेक्षण कराने व कावेरी नदी के पानी के बंटवारे से जुड़े विवादित मुद्दों को सुलझाने के लिए राज्य सरकार ने तमिलनाडु को एक हफ्ते का समय देने का फैसला किया है। यदि उन्होंने सहयोग नहीं दिया तो अगले महीने एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का गठन किया जाएगा। यह प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से मुलाकात कर अपना पक्ष रखेगा। हाल ही में तमिलनाडु के जल संसाधन मंत्री दोराई मुरूगन ने कहा था कि संयुक्त सर्वेक्षण की जरूरत नहीं है।

उधर, कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा ने कहा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से विवाद में हस्तक्षेप करने और इसे हल करने का आग्रह किया है। एक दिन की निजी यात्रा पर चेन्नई आए येद्दयुरप्पा ने कहा कि वह इस मुद्दे का सौहार्दपूर्ण हल चाहते हैं। वह प्रधानमंत्री की मौजूदगी में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं।

लुप्तप्राय नदियों में शुमार है हमारी पवित्र गंगा - डॉ. महेश परिमल


कितनी श्रध्दा रखते हैं, हम सब अपनी गंगा मैया पर। फिर चाहे वह इलाहाबाद का तट हो या हरिद्वार का, लखनऊ हो या आगरा, हर जगह हम रोज सुबह देखते हैं कि लोग अपनी श्रध्दा को किस तरह से प्रदर्शित करते हैं। इनकी श्रध्दा ही इनका विश्वास है। अगर इन्हें यह कहा जाए कि गंगा अब हमारे देश में कुछ ही वर्षों की मेहमान है, तो इन्हें विश्वास नहीं होगा। पर इस कटु सत्य को हमें अब स्वीकार ही लेना चाहिए, क्योंकि गंगा अब अपना अस्तित्व खोते जा रही है। गंगा तट लगातार सिमटते जा रहे हैं, इसका प्रदूषण भी बढ़ रहा है। गंगा को शुध्द करने के सारे प्रयास नाकाम होते जा रहे हैं। गंगा अब मैली ही नहीं, बल्कि गटर के गंदे पानी वाली गंगा बन गई है। अब इसके पानी में वह बात नहीं रही। अब तो बोतल में बंद पानी अधिक दिनों तक सुरक्षित भी नहीं रह पाता। गंगा नदी अब अपनी आयु पूरी कर रही है। आज की युवा पीढ़ी जब तक अपनी जीवन संधया में पहुँचेंगे, तब तक गंगा नदी केवल पाठय पुस्तकों और पुरानी हिंदी फिल्मो तक ही सीमित रह जाएगी, यह तय है।
गंगा नदी में रोज ही हजारों टन फूल, लाखों गैलन सीवेज का पानी और हजारों गैलन प्रदूषणयुक्त रसायन विभिन्न माध्यम से पहुँच रहे हैं। हाल ही में महानगर दिल्ली में लोकशिक्षण के एक भाग के रूप में गंगा नदी पर केंद्रित एक डाक्यूमेंट्री फिल्म का प्रदर्शन किया। इस फिल्म का नाम है 'गंगा: रेस्क्यूइंग द रिवर इन डिस्ट्रेस'। इस फिल्म को बनाया एक विदेशी गंगा प्रेमी सुसान जी. जोन्स ने, इसमें सहयोग दिया पानी मोर्चा गंगा महासभा नामक एनजीओ ने। इस फिल्म में उन्होंने बताया है कि किस तरह से गंगा पर्वतराज हिमालय की गोद से निकलकर उत्तर के मैदानी इलाकों में प्रवेश कर अपना रौद्र रूप दिखाती है। उसके तट पर होने वाले अंतिम संस्कार, गंगा पूजा-आरती, गंगा में छोड़े जाने वाले दीये, फूल-हार, स्थानीय लोगों द्वारा मल-विसर्जन और स्नान और इसके अलावा बरतन-कपड़े की धुलाई को स्पष्ट रूप से दिखाने की कोशिश की है। दूसरी ओर जगह-जगह पर मिलने वाले रसायनों के कारण किस तरह से गंगा लगातार प्रदूषित होती जा रही है, फिल्म में इसे बखूबी दिखाया गया है।
पिछले एक दशक से पर्यावरण प्रेमी और वकील महेश मेहता गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए काम कर रहे हैं, गंगा में जहरीले रसायनों और गंदा पानी बहाने वाले तमाम निगमों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ना मामूली बात नहीं है। अफसोस के साथ वे बताते हैं कि मानव ने यदि प्र.ति के साथ छेड़छाड़ करना बंद नहीं किया, तो समूची जीवनसृष्टि ही खतरे में पड़ जाएगी। हाल ही में यूएनओ से जारी किए गए रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि गंगा को पानी की आपूर्ति करने वाले हिमालय के हिमखंड सन् 2030 तक पूरी तरह से पिघल जाएँगे। इन हिमखंडों से गंगा को 70 प्रतिशत पानी मिलता है। खासकर चैत और वैशाख में मैदानी इलाकों में जब गंगा बिलकुल सूख जाती है, तब गंगोत्री ही एकमात्र सहारा के रूप में उसकी मदद करती है। यही गंगोत्री अब 50 गज के हिसाब से सिकुड़ती जा रही है। आज से 20 वर्ष पहले गंगोत्री इतनी तेजी से नहीं पिघल रही थी, लेकिन अब उसका पिघलना तेजी से जारी है।
पानी मोर्चा गंगा महासभा के साथ सम्बध्दा निवृत्त कमांडेंट सुरेश्वर सिन्हा कहते हैं कि 2008 के मार्च में यूएनओ ने लुप्तप्राय होने वाले विश्व की दस नदियों की सूची जारी की है, जिसमें गंगा का नाम भी शामिल है। यह जानकर हर भारतीय दु:खी हो सकता है, पर किया क्या जा सकता है? प्र.ति से लगातार छेड़छाड़ के कारण गंगा ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के पर्यावरण पर संकट आ पड़ा है। हजारों वर्ष की पुराण प्रसिध्दा और एक से अधिक संस्कृति की साक्षी गंगा आज लुप्तप्राय नदियों की श्रेणी में आ गई है। यह खबर भारतीय को कँपकँपा सकती है। गंगा केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया खंड में पेयजल की विशाल स्रोत के रूप में जानी जाती है। गंगा लुप्त न हो, इसके लिए एक-एक समझदार भारतीय नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी है।
कमांडेंट सिन्हा के अनुसार गंगा 50 करोड़ लोगों के लिए पेयजल और खेती के लिए पानी की पूर्ति करती है। किंतु अब उसकी यह आपूर्ति जल्द ही खतम हो जाती है। उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर रायों के लोग कम पढ़े-लिखे होने के कारण परिस्थितियों की भयावहता को ये समझ नहीं पा रहे हैं। दूसरी ओर हर पाँच साल में हाथ जोड़कर गरीबों के सामने गरीब बनकर वोटों की भीख माँगने वाले नेता इस स्थिति को समझना ही नहीं चाहते।
विशेषज्ञ कहते हैं कि वह समय दूर नहीं, जब गंगा एक मौसमी नदी बनकर रह जाएगी। यदि बारिश अच्छी हुई तो गंगा के किनारे छलकते हुए मिलेंगे, परंतु गर्मी में गंगा नदी पूरी तरह से सूख जाएगी। 1568 मील लम्बी नदी के किनारे 100 से अधिक छोटे-बड़े शहर बसे हुए हैं। इनमें से बहुत ही थोड़े शहरों की अपनी सीवेज लाइन है, बाकी शहरों का गंदा पानी गंगा में ही बहाया जा रहा है। इसमें उद्योग कारखानों की गंदगी तो और भी बुरी हालत में है। यह सारे काम बेरोकटोक जारी हैं। गंगा में मिलने वाले इन प्रदूषणों को कम करने की दिशा में सरकार के सारे प्रसास नाकाफी साबित हो रहे हैं। हमारे सामने ही गंगा का पलायन हो रहा है। इसे हम जानते हुए भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। गंगा मैली नहीं थी, हमने ही उसे मैली कर दिया है। गंगा तो पवित्र नदी थी, जो अब पाठय पुस्तकों और पुरानी फिल्मों में ही देखने और जानने को मिलेगी। यह हमारा दुर्भाग्य ही है। गंगा हमारे पाप तो धो सकती थी, पर हमारा दुर्भाग्य नहीं बदल सकती। हर-हर गंगे.
डॉ. महेश परिमल

टेरी रिपोर्ट की महत्वपूर्ण बातें


कालाडेरा के कोकाकोला प्लांट के बारे में टेरी रिपोर्ट की महत्वपूर्ण बातें

2004 में कोकाकोला कंपनी के खिलाफ इंटरनेशनल-कैम्पेन ने कंपनी को इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि वह भारत में अपने कोल्डड्रिंक और बोतलबंद पानी कारोबारी प्लांटों के स्वतंत्र आकलन की सहमति दे। टेरी द्वारा किए गये मूल्यांकन में कोकाकोला के भारत के पचास प्लांटों में से छह का मुआयना किया गया। इतने से ही यह बात प्रमाणित हो जाती है कि कोकाकोला कंपनी पहले से ही मौजूद समस्या पानी की भयानक कमी को और बढ़ाने के साथ ही जल-प्रदूषण के लिए भी उत्तरदायी है, इसी बात को कालाडेरा और वाराणसी के स्थानीय समुदायों के लोग भी लम्बे समय से कहते आ रहे हैं।
भारत में टेरी द्वारा आयोजित आंकलन में महसूस किया गया है कि कालाडेरा में जारी कोकाकोला के कार्यों से पानी की स्थिति लगातार बद से बदतर होती रहेगी और आसपास के समुदायों पर दबाव बना रहेगा।
इस रिपोर्ट में कालाडेरा कोकाकोला प्लांट के लिए चार सिफारिशें की गयी हैं:-

1. सबसे नजदीक के किसी जलाशय से पानी परिवहन करके ले आए। ( जो ढूँढना बहुत कठिन हैं )
2. जिन दिनों लोगों को पानी की कम जरूरत रहती हो, उन दिनों जल-भंडारण करे ( शायद मौजूद नहीं है! )
3. अधिशेष जल-क्षेत्र ढूँढ कर प्लांट वहां ले जाए। (जो राजस्थान में ढूँढना बहुत कठिन है)
4. प्लांट बंद करे।

कालाडेरा कोकाकोला प्लांट के बारे में टेरी-रिपोर्ट के कुछ अन्य महत्वपूर्ण निष्कर्ष:-1. 1998 में केन्द्रीय भूजल बोर्ड द्वारा कालाडेरा क्षेत्र को डार्क-जोन के रूप में घोषित किया गया था इसके बावजूद कोकाकोला ने अपना प्लांट यहीं लगाने का निश्चय किया और 2000 में काम भी शुरू कर दिया। जब कोकाकोला कंपनी को पहले से ही यह मालूम था कि कालाडेरा में पानी की समस्या है तो उसने अपना प्लांट जानबूझकर वहां क्यों बनाया?
2. कोकाकोला ने 'पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन' का साथ देने से भी मना कर दिया जो प्लांट लगाने से पहले, पानी पर्यावरण और समुदाय पर पड़ने वाले उसके प्रभावों का अध्ययन कर रहा था।
3. कोकाकोला के कोल्डड्रिंक और बोतलबंद पानी का उत्पादन अप्रैल-मई और जून के महीनों में चोटी पर होता है- यानी कि कोकाकोला ऐसे समय में सबसे अधिक मात्रा में पानी का दोहन करती है जब स्थानीय समुदाय के पास कम से कम मात्रा में पानी उपलब्ध होता है।
4. कोकाकोला जल संरक्षण के लिए वर्षा जल संचयन पर ही सबसे ज्यादा निर्भर है। लेकिन चूंकि वर्षा बहुत कम होती है, इसलिए जल-पुनर्भरण के लिए किए जा रहे कामों की सार्थकता की संभावना बहुत महत्व की नहीं होती है।
5. टेरी की टीम ने दौरा करके कोकाकोला के वर्षा जल-संग्रहण ढांचों को भी देखा और पाया कि वे 'जीर्णशीर्ण' ही हैं, बहुत काम के नहीं हैं।
6. राजस्थान जल नीति-1999 इस बात की जोरदार आवाज में वकालत करती है कि विभिन्न क्षेत्रों में जल संसाधनों का बंटवारा 'आर्थिक और विवेकपूर्ण' आधार पर किया जाना चाहिए जिसमें सिंचाई, उर्जा उत्पादन और उद्योगों को पेयजल आपूर्ति पहली प्राथमिकता के आधार पर होनी चाहिए।
7. इस आकलन में पाया गया है कि कोकाकोला के लिए अपने कारोबार (मुनाफा) की निरंतरता ही उसके लिए प्राथमिकता रही है, समुदाय के लिए पानी के मुद्दों और समस्याओं की उपेक्षा हुई है।

अधिक जानकारी के लिए कृपया देखें www.indiaresource.org या ईमेल info@indiaresource.org से सम्पर्क करें।

संत रविदासनगर में भी जमीन फटी

प्रदेश में सूखाग्रस्त बुंदेलखंड इटावा, कानपुर, इलाहाबाद, प्रतापगढ़ और लखनऊ के बाद अब संतरविदासनगर जिले में जमीन फट गई है। जानकारी के अनुसार जिले के सोनपुर, अमवा, माफी और इटेहरा गांवों में पिछले तीन दिन में हुई जमीन फटने की घटनाओं से सनसनी फैल गई है। सूचना मिलने पर वरिष्ठ अधिकारियों और विशेषज्ञों ने इन गांवों का दौरा किया तथा ग्रामीणों को आश्वस्त किया कि इस घटना से घबराने की कोई जरूरत नहीं हैं।

450 विकासखंडों में भूजल स्तर खतरे की हद से नीचे

विशेषज्ञों का मानना है कि जमीन फटने की घटनाएं भूगर्भ जल के अधिक दोहन की वजह से हो रही है। इसके मद्देनजर राज्य सरकार वर्षा जल के संरक्षण और भूजल के अत्यधिक दोहन को रोकने के लिए जल्दी ही एक कानून बनाने की अपनी मंशा का मंगलवार को इजहार कर चुकी है। गौरतलब है कि जिले के सोनपुर और अनंगपुर गांव में दो साल पहले भी जमीन फटने की घटना हुई थी। इस बीच राज्य के करीब 25 स्थानों पर अब तक जमीन फटने की घटनाएं हो चुकी है।

इनमें से तेरह स्थान हमीरपुर जिले में है। इसके पूर्व राज्य का भूगर्भ जल विभाग पेयजल की किल्लत की आशंका के मद्देनजर पहले ही कृषि कायों के लिए भूगर्भ जल के अधिक दोहन को रोकने की सलाह दे चुका है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि राज्य के 72 जिलों के 822 विकासखंडों में से 450 विकासखंडों में भूगर्भ जलस्तर खतरे की हद तक नीचे जा चुका है। केन्द्रीय भूगर्भ जल विभाग तथा उत्तर प्रदेश भूगर्भ जल विभाग द्वारा हाल में कराए गए संयुक्त सर्वेक्षण में पता चला है कि राज्य के 13 जिलों के 22 विकासखंडों में भूगर्भ जल का अधिक दोहन हो चुका है। इसके अलावा, 29 जिलों के 75 विकास खंडों में भी हालात खराब हो चुके हैं। आगरा-चम्बल पट्टी में भूगर्भ जल का स्तर 60 फीट से नीचे जा चुका है।
एजेंसी
लखनऊ, 20 जून

जल प्रदूषण की रोकथाम के लिए नई तकनीक

विष्णु पांडे / कानपुर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और हरकोर्ट बटलर टैक्ोलॉजिकल इंस्टीटयूट (एचबीटीआई) ने प्राकृतिक संसाधन जल के प्रदूषण को रोकने के लिए एक नई तकनीकि को ईजाद किया है। यह नई तकनीकि आईआईटी कानपुर के पर्यावरणीय इंजीनियर विनोद तारे ने सैन सिस्टम तकनीक के आधार पर विकसित की है। इस तकनीक में प्रदूषण को रोकने के लिए जीरो डिस्चार्ज सिद्वांत का प्रयोग किया जाएगा। इस तकनीक में टायलेट में प्रयोग किये जाने वाले पानी को सफाई के बाद पुन: प्रयोग किया जा सकता है। इसमें अपशिष्ट पदार्थ के ठोस और तरल भाग को अलग-अलग टैकों में एकत्रित कर लिया जाएगा। इन टैंको में जमा ठोस अपशिष्ट को खाद और तरल अपशिष्ट को तरल उर्वरक के रुप में विकसित किया जा सकेगा। इसके लिए टायलेट सीट के नीचे पानी को अलग करने के लिए एक यंत्र लगाया जाएगा। तारे के अनुसार वर्तमान में टायलेट में अपशिष्ट को साफ करने के लिए स्वचछ पानी का प्रयोग किया जाता है। शहरों के सीवरों से नदी में जाने वाले पानी का लगभग 90 फीसदी हिस्सा बिना किसी दोहन के ही नदियों में पहुचाया जाता है, जो जल प्रदूषण का एक बहुत बड़ा कारण है। इस तकनीकि से न केवल जल प्रदूषण को रोका जा सकेगा साथ ही श्रम और पूंजी के अतिव्यय को भी रोका जा सकेगा। तारे और उनके छात्रों द्वारा निर्मित की गई इस तकनीकि को भारतीय रेल द्वारा मंजूरी प्रदान कर दी गई है और रेलवे अपनी आगामी परियोजना में इसका इस्तेमाल करने वाला है। इस बाबत डॉ तारे ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि इस तकनीकि का सबसे पहला प्रयोग चेन्नई और त्रिवेन्द्रम रेलवे के मध्य किया जाएगा। इसके अलावा यूनीसेफ भी इस तकनीकि के लिए आईआईटी से संपर्क कर रहा है। इसके अलावा जल क्षेत्रों में प्रदूषण की दर को नापने के लिए एचबीटीआई के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख दीपेश सिंह ने एक कंप्यूटर प्रोग्राम का निर्माण किया है। इससे किसी क्षेत्र में उपस्थित जल क्षेत्रों में प्रदूषण की जांच की जा सकेगी और समय-समय पर बदल रहें प्रदूषण के आंकड़ो को भी दिखाया जा सकेगा। दीपेश सिंह ने बताया कि इस तकनीकि से बिना किसी यंत्र की सहायता के किसी स्थान में जल की गहराई को भी नापा जा सकता है। अभी तक जल प्रदूषण को जांचने के लिए ट्रायल और एरर तकनीकि का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा केंद्रीय भूमिगत जल बोर्ड ने भी इस तकनीकि को रायबरेली के 9 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में लगाने के लिए भी रुचि दिखाई है।

मुद्दा : वर्षा जल संरक्षण के बिना बेमानी हैं सभी प्रयास

ज्ञानेन्द्र रावत
जल संकट देश ही नहीं, समूचे विश्व की गंभीर समस्या है। दुनिया के विशेषज्ञों की राय है कि वर्षा जल संरक्षण को बढ़ावा देकर गिरते भूजल स्तर को रोका व उचित जल–प्रबंधन से सबको शुद्ध पेयजल मुहैया कराया जा सकता है। उनका मानना है कि यही टिकाऊ विकास का आधार हो सकता है। इसमें ंदो राय नहीं कि जल संकट ही आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती होगी, जिस पर गौर करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है, वरना स्थिति इतनी भयावह होगी जिसका मुकाबला कर पाना असंभव होगा। इसलिए तेजी से कम होते भूजल को संरक्षित करने के लिए जल–प्रबंधन पर ध्यान दिया जाना बेहद जरूरी है। इसमें दो राय नहीं कि भूजल पानी का महत्वपूर्ण स्रोत है और पृथ्वी पर होने वाली जलापूर्ति अधिकतर भूजल पर ही निर्भर है। लेकिन आज वह चाहे सरकारी मशीनरी हो, उघोग हो, कृषि क्षेत्र हो या आम जन हों, सभी ने इसका इतना दोहन किया है, जिसका नतीजा आज हमारे सामने भूजल के लगातार गिरते स्तर के चलते जल संकट की भीषण समस्या आ खड़ी हुई है, बल्कि पारिस्थितिकीय तंत्र के असंतुलन की भयावह स्थिति पैदा हो गई है। हालात यहां तक खराब हो रहे हैं कि इससे देश में कहीं धरती फट रही है, कहीं जमीन अचानक तप रही है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखण्ड, अवध व ब्रज क्षेत्र के आगरा की घटनाएं इसका प्रमाण हैं। ये संकेत देती हैं कि भविष्य में स्थिति विकराल रूप ले सकती है।
वैज्ञानिकों व भूगर्भ विशेषज्ञों का मानना है कि बुंदेलखण्ड, अवध, कानपुर, हमीरपुर व इटावा में यह सब पानी के अत्यधिक दोहन, उसके रिचार्ज न पाने के कारण जमीन की नमी खत्म होने, उसमें ज्यादा सूखापन आने, कहीं दूर लगातार हो रही भूगर्भीय हलचल की लहरें यहां तक आने व आगरा में पानी में जैविक कूड़े से निकली मीथेन व दूसरी गैसों के इकट्ठे होने के कारण जमीन की सतह में अचानक गर्मी बढ़ जाने का परिणाम हैं। यह भयावह खतरे का संकेत है, क्योंकि जब–जब पानी का अत्यधिक दोहन होता हैे, तब जमीन के अंदर के पानी का उत्प्लावन बल कम होने या खत्म होने पर जमीन धंस जाती है और उसमें दरारें पड़ जाती हैं। इसे उसी स्थिति में रोका जा सकता है, जब भूजल के उत्प्लावन बल को बरकरार रखा जाये। पानी समुचित मात्रा में रिचार्ज होता रहे। यह तभी संभव है जब ग्रामीण-शहरी, दोनों जगह पानी का दोहन नियंत्रित हो, संरक्षण, भंडारण हो ताकि वह जमीन के अंदर प्रवेश कर सके। जल के अत्यधिक दोहन के लिए कौन जिम्मेदार है, इस बारे में योजना आयोग के अनुसार भूजल का 80 फीसद उपयोग कृषि क्षेत्र द्वारा होता हैै। इसे बढ़ाने में सरकार द्वारा बिजली पर दी जाने वाली सब्सिडी जिम्मेदार है। आयोग की रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि यह सब्सिडी कम की जाये। वह, इस रूप में दी जाये ताकि किसान भूजल का उचित उपयोग करें। सब्सिडी के बदले किसान को निश्चित धनराशि नकद दी जाये। इससे भूजल का संरक्षण होगा तथा विघुत क्षत्र पर भी आर्थिक बोझ कम होगा। विश्व बैंक की मानें, तो भूजल का सर्वाधिक 92 फीसद उपयोग और सतही जल का 89 फीसद उपयोग कृषि में होता है। 5 फीसद भूजल व 2 फीसद सतही जल उघोग में, 3 फीसद भूजल व 9 फीसद सतही जल घरेलू उपयोग में लाया जाता है। आजादी के समय देश में प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति पानी की उपयोगिता 5,000 क्यूबिक मीटर थी, जबकि उस समय आबादी 40 करोड़ थी। यह उपयोगिता कम होकर वर्ष 2000 में 2000 क्यूबिक मीटर रह गयी और आबादी 100 करोड़ पार कर गई। 2025 में यह घटकर 1500 क्यूबिक मीटर रह जाएगी, जबकि आबादी 1 अरब 39 करोड़ हो जाएगी। यह आंकड़ा 2050 तक 1000 क्यूबिक मीटर ही रह जाएगा और आबादी 1 अरब 60 करोड़ को पार कर जाएगी।
आयोग के मुताबिक, 29 फीसद इलाका पानी की समस्या से जूझ रहा है। हकीकत यह है कि जल संकट गहराने में उघोगों की अहम भूमिका है। विश्व बैंक मानता है कि कई बार फैक्ट्रियां एक ही बार में उतना पानी जमीन से खींच लेती हैं, जितना एक गांव पूरे महीने में भी न खींच पाये! सवाल है कि जिस देश में भूतल व सतही विभिन्न साधनों के माध्यम से पानी की उपलब्धता 2300 अरब घनमीटर है और जहां नदियों का जाल बिछा हो, सालाना औसत वर्षा 100 सेमी से भी अधिक होतीे है, जिससे 4000 अरब घनमीटर पानी मिलता हो, वहां पानी का अकाल क्यों है? असल में वर्षा से मिलने वाले जल में से 47 फीसदी यानी 1869 अरब घनमीटर पानी नदियों में चला जाता है। इनमें से 1132 अरब घनमीटर पानी उपयोग में लाया जा सकता है लेकिन इसमें से भी 37 फीसद उचित भंडारण–संरक्षण के अभाव में समुद्र में चला जाता है जो बचाया जा सकता है। इससे काफी हद तक पानी की समस्या का हल निकाला जा सकता है।

जल प्रदूषण की रोकथाम के लिए नई तकनीक

विष्णु पांडे / कानपुर

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और हरकोर्ट बटलर टैक्ोलॉजिकल इंस्टीटयूट (एचबीटीआई) ने प्राकृतिक संसाधन जल के प्रदूषण को रोकने के लिए एक नई तकनीकि को ईजाद किया है।
यह नई तकनीकि आईआईटी कानपुर के पर्यावरणीय इंजीनियर विनोद तारे ने सैन सिस्टम तकनीक के आधार पर विकसित की है। इस तकनीक में प्रदूषण को रोकने के लिए जीरो डिस्चार्ज सिद्वांत का प्रयोग किया जाएगा।
इस तकनीक में टायलेट में प्रयोग किये जाने वाले पानी को सफाई के बाद पुन: प्रयोग किया जा सकता है। इसमें अपशिष्ट पदार्थ के ठोस और तरल भाग को अलग-अलग टैकों में एकत्रित कर लिया जाएगा। इन टैंको में जमा ठोस अपशिष्ट को खाद और तरल अपशिष्ट को तरल उर्वरक के रुप में विकसित किया जा सकेगा। इसके लिए टायलेट सीट के नीचे पानी को अलग करने के लिए एक यंत्र लगाया जाएगा।
तारे के अनुसार वर्तमान में टायलेट में अपशिष्ट को साफ करने के लिए स्वचछ पानी का प्रयोग किया जाता है। शहरों के सीवरों से नदी में जाने वाले पानी का लगभग 90 फीसदी हिस्सा बिना किसी दोहन के ही नदियों में पहुचाया जाता है, जो जल प्रदूषण का एक बहुत बड़ा कारण है। इस तकनीकि से न केवल जल प्रदूषण को रोका जा सकेगा साथ ही श्रम और पूंजी के अतिव्यय को भी रोका जा सकेगा।
तारे और उनके छात्रों द्वारा निर्मित की गई इस तकनीकि को भारतीय रेल द्वारा मंजूरी प्रदान कर दी गई है और रेलवे अपनी आगामी परियोजना में इसका इस्तेमाल करने वाला है। इस बाबत डॉ तारे ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि इस तकनीकि का सबसे पहला प्रयोग चेन्नई और त्रिवेन्द्रम रेलवे के मध्य किया जाएगा। इसके अलावा यूनीसेफ भी इस तकनीकि के लिए आईआईटी से संपर्क कर रहा है।

इसके अलावा जल क्षेत्रों में प्रदूषण की दर को नापने के लिए एचबीटीआई के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख दीपेश सिंह ने एक कंप्यूटर प्रोग्राम का निर्माण किया है। इससे किसी क्षेत्र में उपस्थित जल क्षेत्रों में प्रदूषण की जांच की जा सकेगी और समय-समय पर बदल रहें प्रदूषण के आंकड़ो को भी दिखाया जा सकेगा।
दीपेश सिंह ने बताया कि इस तकनीकि से बिना किसी यंत्र की सहायता के किसी स्थान में जल की गहराई को भी नापा जा सकता है। अभी तक जल प्रदूषण को जांचने के लिए ट्रायल और एरर तकनीकि का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा केंद्रीय भूमिगत जल बोर्ड ने भी इस तकनीकि को रायबरेली के 9 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में लगाने के लिए भी रुचि दिखाई है।

नदियों के प्रदूषण पर धयान जरूरी

संजय सिंह- मीडिया स्टार


राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में यमुना किनारे बनें भव्य अक्षरधाम मंदिर और २०१० में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के लिए बनने वाले फ्लेट दिल्ली के विकास को सिद्ध करते हैं लेकिन विशेषज्ञों ने इन दोनों निर्माणों के संबंध में जो विचार व्यक्त किये हैं उन से दिल्ली वाले निराश हैं।

भारतीय नदियों की स्थिति पर हाल ही में आयोजित संगोष्ठी में उपरोक्त निर्माण के बारे में कहा गया कि ये निर्माण विशेषज्ञों की राय के विरूद्ध कराये गये हैं और ये आत्म हत्या की तरह है।

संगोष्ठी में यमुना जय अभियान के डॉ० मनोज मिश्रा के अनुसार खेल गांव बनाने के पीछे एक बड़ा घपला है।खेल तो एक बहाना है इसके हो जाने के बाद वहां बनें हुए फ्लेट प्राइवेट मालिकों को बेच दिये जायेंगे जिस से डीडीए और ठीकेदारों को करोड़ों रूपये मिलेंगे।

डॉ० मिश्रा ने दलील पेश करते हुए कहा कि नेंशनल इन्वायरमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीटियूट (एन ई ई आर आई) ने अपनी एक रिपोर्ट में सलाह दी थी कि यमुना के किनारे स्थायी अवासीय ढांचा न बनाया जाये। उन्हों ने कहा कि यमुना से संबंधित स्टैंडिंग कमीटी ने सूचना अधिकार के अन्तर्गत आवेदन करने वाले एक व्यक्ति को बताया था कि उसने नदी के किनारे किसी स्थायी ढांचा की निर्माण की अनुमति नहीं दी है।

दिल्ली फाल्ट लाईन पर बसी हुई है और विशेषज्ञों के जायजे के अनुसार शहर में इंजीनियर स्केल के अनुसार सात की क्षमता वाला भुकंप आ सकता है जिसमें नदी के आस पास बने मकान बराबर हो जायेंगे। प्रो० मिश्रा ने उन लोगों को चेतावनी दी जो यूरोपीय नगरों आक्सफोर्ड और वायना की तरह नदी के किनारे के हिस्सों को प्रगति देने की बातें करते हैं। उन्हों ने कहा कि उपरोक्त यूरोपीय शहरों में साल भर बारिश होती रहती है जबकि दिल्ली में मुशिकल से तीन महीने बारिश होती है।

विशेषज्ञों के जायजे और जायजों पर डॉ० मिश्रा के विचार ध्यान देने योग्य हैं। यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि यमुना स्टैंडिंग समिति की अनुमति के बिना निर्माण शुरू किस तरह हुआ? ये सवाल भी महत्वपूर्ण है कि खेल गांव के निर्माण के पीछे व्यापारिक उद्देश्यों को सामने रखा जा रहा है। विकास का सब्ज+ बाग दिखाकर जान बुझ कर अगर दिल्ली वालों को खतरे में डाला जा रहा है तो यह दुःख की बात है। सरकार को इस संबंध में सक्रिय हो जाना चाहिए।

ये अच्छी खबर है कि गंगा यमुना और अन्य बड़ी नदियों में बढ़ते प्रदूषण से चिंतित राज्य सरकारों के साथ दस्तावेजी समझौते पर हस्ताक्षर करने पर विचार कर रही है ताकि वह सिवेज ट्रेटमेंट प्लांटों का आरंभ कर सके।

राज्यों में पर्यावरण और वन मंत्रालय ने जो सिवेज प्लांट लगाये हैं उन में से अधिकतर या तो खराब पड़े हैं या तो फिर अच्छी तरह से काम नहीं कर रहे हैं। परिणामस्वरूप शहर का कूड़ा नदियों में यूं ही जाकर गिर जाता है।

पर्यावरण और वन मंत्रालय के अधिकारी ने बताया कि जब राज्य सरकारें कूड़ा साफ करने वाले प्लांटों को चालू रखने के लिए समझौते करेंगी तो फिर उनकी देख रेख और चलाने की उनकी जिम्मेदारी हो जायेगी। अधिकारी ने बताया कि इस संबंध में राज्य सरकारों और दूसरे मंत्राालयों से बात चीत जारी है।

देश के बड़े और छोटे शहरों में हर वर्ष २९ हजार मिलियन लीटर सिवेज रोजाना पैदा होता है जबकि केवल ६ हजार मिलियन लीटर सिवेज की सफाई की गुंजाईश है। उपरोक्त अधिकारी के अनुसार दुःख की बात ये है कि इस क्षमता का भी पूरा इस्तेमाल नहीं किया जाता है।

राज्य सरकारों का सहयोग नदियों से साफ करने से संबंधित प्रोजेक्टों को चलाने में सबसे बड़ी रूकावट है।रीभर एक्शन प्लांट के अन्तर्गत कूड़ा साफ करने वाले प्लांट तैयार करने पर करोड़ों रूपये खर्च किये जाते हैं लेकिन कोई उत्साहवर्द्धक परिणाम सामने नहीं आ रहा है।प्लांटों के लिए पर्र्याप्त फंड चाहिए लेकिन राज्य सरकारें इस मोर्चे पर भी नाकाम हैं। इन प्लांटों को चलाने के लिए बिजली भी पूरी नहीं पड़ती। पर्यावरण और वन मंत्रालय प्रदूषण को रोकने के लिए निर्णायक बनाता है लेकिन नदियों के किनारे बढ़ती आबादी की वजह से वित्तीय संसाधन की उपलब्धता और कामों के बीच हमेशा अंतर रहता है।

कानपुर में भूजल को साफ करने के लिए अभियान की शुरुआत

विष्णु पाण्डेय / कानपुर

कानपुर के विभिन्न इलाकों में प्रदूषित भूजल को साफ करने का अभियान शुरू करने के लिए उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को प्रस्ताव भेजा है।
प्रस्ताव में मंत्रालय से जमीनी पानी को साफ करने के लिए जांची परखी बायो-रेमिडेशन तकनीक को प्रायोजित करने पर विचार करने का अनुरोध किया गया है। यहां के नौरीखेरा और जाजमऊ इलाके में पानी में हानिकारक तत्व हेक्सावेलेंट क्रोमियम की मात्रा तय मानक से 100 गुना ज्यादा है।
राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जमीन के अंदर गंदे पानी से हानिकारक तत्वों को हटाने में नई बायो-रेमिडेशन तकनीक की उपयोगिता की जांच के मद्देनजर अध्ययन भी कर रहा है। इस प्रोजेक्ट को अमेरिका के ब्लैकस्मिथ इंस्टिटयूट द्वारा तैयार और लागू किया गया है। ब्लैस्मिथ पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं पर नजर रखने के अलावा इसके समाधान की दिशा में उपाय सुझाने वाली अग्रणी संस्था है।
इस संस्थान ने भारत में की वजह से प्रदूषित हो रहे पानी को साफ करने के काम में अग्रणी भूमिका अदा की है। हेक्सावेलेंट क्रोमियम का इस्तेमाल चमड़ा उद्योग में किया जाता है। गौरतलब है कि कानुपर भारत में चमड़ा उद्योग का सबसे बड़ा केंद्र है और इस वजह से आसपास के इलाकों का भूजल इस विषैले पदार्थ से संक्रमित हो रहा है। अध्ययन बताते हैं कि हेक्सावेलेंट क्रोमियम की वजह से फेफड़े का कैंसर होने का खतरा होता है।
साथ ही इस हानिकारक तत्व की गंध की वजह से सांसों की बीमारी भी हो सकती है। साथ यह किडनी और लीवर को भी नुकसान पहुंचा सकता है। जमीनी पानी को साफ करने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने संस्थान के साथ मिलकर ट्रायल प्रोग्राम भी शुरू किया है। इसके तहत भूजल में कुछ रसायन डाला जाता है, जिसके परिणामस्वरूप क्रोमियम से जहरीले तत्व दूर हो जाते हैं।
यह ट्रायल काफी हद तक सफल रहा है। यहां तक कि कुछ टेस्ट में हेक्सावेलेंट क्रोमयिम की मात्रा नहीं के बराबर पाई गई। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी राधेश्याम ने बताया कि यह भूजल को साफ करने की दुनिया की आधुनिक तकनीक है।
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खुशियों की सौगात देने वाली सांवली नदी देग

पंजाब की भूमि अपनी पांच नदियों की विशेषता से प्रसिध्द है। बहुत कम लोग जानते हैं कि पंजाब में केवल पांच नदियां नहीं हैं। इसकी भूमि पर रक्त नाड़ियों की भांति अनेक छोटी-बड़ी नदियां प्रवाहित होती हैं। बल्कि हर नगर की अपनी एक नदी है। मगर हमारे लोग नदियों को कम ही पहचानते हैं।
जब मैं प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन कर रहा था तो मेरे सामने बार-बार देविका नदी की धारा चलने लगती थी। पंजाब के मानचित्र में और फिर भूमि पर देविका को देखता तो मुझे अनुभव होता कि वह नदी भी कभी एक शक्तिशाली जलधारा रही होगी। इसे ही अलबरूनी ने अपने ग्रंथ 'अलहिंद' में कहा है कि वह सौवीरा अर्थात मुल्तान देश में प्रवाहित थी।
समय की गति के साथ देविका का स्रोत काफी हद तक कम हो गया और लोगों ने भी उसका नाम देविका से देग और फिर लोक मुहावरे में 'डेक' बना लिया।

देग के ईद-गिर्द बसने वाले लोगों ने मुझे बताया था कि-एक बरसाती नदी है, मगर जब उसमें पर्वतमाला का सांवला पानी आता है तो फसल खूब पैदा होती है। इसके पानी में ऊपर पहाड़ से गारा बहुत आता है। इसका मतलब है कि देग का स्रोत ऊपर हिमालय पर्वत नहीं, बल्कि शिवालिक पर्वतमाला में ही है। मगर हमें लगता है कि कहीं नगर के बाहर निकट ही इसका स्रोत है। क्योंकि अचानक ही इसके पाट में पानी भर जाता है। अपने स्रोत से चलकर रावी में संगम तक उसकी रफ्तार इसी प्रकार की अकस्मात किस्म की है। विश्वासहीन सी... देविका अथवा देग का स्रोत मैनाक पर्वतमाला (शिवालिक) में जम्मू क्षेत्र के जसरोता के आंचल में से आरंभ होता है, मगर उस पर्वतमाला पर क्योंकि हिमपात नहीं होता, इसलिए देविका का स्वभाव अब सदानीरा नहीं रहा। वर्षा ऋतु के अलावा उसमें बहुत कम पानी रहता है। फिर भी उसकी धारा कुछ समय में ही अपने क्षेत्र की भूमि को जितना उपजाऊ बना देती है, उसी वरदान के कारण लोग उसे वर्ष भर याद रखते हैं। मोह-मोहब्बत से।
पाणिनी ने भी 'अष्टाध्यायी' में लिखा है कि देविका अपने तटों पर रौसली (रजसवला अथवा बरसाती) मिट्टी की एक तह छोड़ जाती है जो फसल के लिए लाभकारी होती है। किसान को सुख देती है।
मेरे एक मित्र जगदीश सिंह नामधारी ने बताया था कि जितना बढ़िया बासमती धान इसके पानी के निकट पैदा होता है, और कहीं शायद ही होता हो।
मंडी मुरीदके और कामोके से जो सुगंधित चावल विदेशों में जाते हैं, उनका मूल्य बहुत अधिक है।
'स्यालकोट और शेखूपुरा के क्षेत्र को तो देग ने स्वर्ग बना दिया है।' नामधारी जगदीश सिंह कहता था हंसकर।
पिछले वर्ष जब मैं 'उन्नीसवीं सदी का पंजाब' नामक पुस्तक पढ़ रहा था तो उसमें स्यालकोट शहर के वर्णन में डेक नदी का स्वरूप पूरी तरह साकार हो गया,'स्यालकोट नगर में निचली तरफ एक नदी है जिसे डेक (देग) कहते हैं। यह नदी वर्षा के दिनों में जीवित हो जाती है। कहा जाता है कि अतीत में यह सदानीरा थी। वर्षा में इसे पार करना कठिन था। हजरत शाह दौला दरवेश ने आने-जाने वाले लोगों के लिए इसके पाट पर एक पुल बनाया, जिसे शाह दौला पुल कहते थे।' देग नदी खैरी रहाल नाम के गांव के पास से फूट कर जम्मू के गांव-मोरचापुर डबलड़, मांजरा और आरीना आदि में प्रवाहित होती है। सईयांवान गांव के निकट और करटोपा के बीच में पहुंचकर यह कहीं सूखी और कहीं प्रवाहित दिखाई देती है। वहां से यह स्यालकोट के नीचे की ओर जा निकलती है। आगे चलकर सोहदरा तथा भोपाल वाला तक चली जाती है। फिर कावांवाला, धड़ और नुकल गांव के बराबर बिखर जाती है। वहां इसका नाम 'कुलहरी' है। नदी की दूसरी ओर स्यालकोट के पूर्व में रंगपुर, रायपुरा तथा जठापुरा बस्तियां हैं। इन्हें बडेहरा खतरियों ने आबाद किया था। रंगपुर में कागज तैयार करने वाले कारीगर रहते हैं। माबड़ों की औरतें रंगदार रेशमी धागे से सफेद सुर्ख वस्त्रों पर कसीदाकारी का काम करती हैं।
पंजाब में फिरंगी सरकार से पूर्व रावी और चिनाब के बीच वाला अधिक क्षेत्र बिल्कुल जंगल था और जंगली लोग देग के निकट आबाद थे। इन लोगों के बारे में ही प्रो. पूर्ण सिंह ने अपनी पुस्तक 'खुले आसमानी रंग' में लिखा था-'यहां मुझे मालुम हुआ कि हवा, पानी, मिट्टी, प्रकाश, चांद, सूर्य, आदमी, जानवर, पंछी, प्यार के बारीक रेशमी धागे से एक जीवन में बंधे हुए हैं। मुर्गे की बांग और प्रभाव के मेघों के रंगों का सौंदर्य दोनों की कोई मिली-जुली उकसाहट है। फूलों का खिलना और सूर्य प्रकाश का नित नए विवाह की भांति प्रसन्नता और चाव में अपना एक जादुई अचम्भा है। किरण फूल के दिल में कुछ कह जाती है और दिन भर फूल अपनी छोटी सी झोंपड़ी में अनंत हुआ, आता ही नहीं।'
प्रो. पूर्ण सिंह की कविता 'जांगली छोहर' भी इस क्षेत्र के जीवन की गवाही बनती है। प्रो. पूर्ण सिंह महान प्रतिभा का कवि था और वह मानवीय मानसिकता में गहराई तक पहुंचकर मानव के सबसे अधिक प्रिय भाव को प्रकाशित कर देता था। उसने इस क्षेत्र के बारे में लिखा था, 'मुझे महसूस हुआ है जैसे मैं किसी जादू के देश में आ गया हूं। यहां बच्चे फूल हैं, वृक्ष मानव हैं और नारियां सौंदर्य का साकार स्वरूप दिखाई देती हैं। धरती आकाश जहां मिलते हैं, वहां ही मैत्री का स्नेह है।'
पुरातन शास्त्रों में आता है कि मूला स्थान अर्थात मुल्तान भी देविका की धारा के निकट ही था। यह बात निश्चित है कि देविका की धारा मुल्तान तक भी जाती होगी। अवश्य ही...
देग नदी का फासला अपने स्रोत से चलकर रावी में संगति तक दो सौ किलोमीटर से अधिक ही है। रावी के पानी में यह दाएं हाथ से शामिल होती है। जिस प्रकार रावी और पंजाब की शेष नदियों की चाल तेज रही है, वैसे ही लोगों के स्वभाव भी तीखे और रुष्ट किस्म के रहे हैं। नगरों में यदि शिष्ट स्वभाव के कुटिल लोग रहते थे तो दूर जंगलों में सादे लोग भले मानस किस्म के-जिन्हें हम जांगली कहते थे। वे जांगली खुद को राजपूत समझते थे। वे शूरवीर लोगों से अपना विरसा मिलाकर प्रसन्न होते थे। नूरा नहंग इस क्षेत्र का लोककवि था। वह अपने खेतों में झोंपड़ी बनाकर रहता था और आज भी जांगली लोगों के दिलों की धड़कन में बसा-रसा हुआ है-

पंजाबियों की बात कैसी
लड़ना है किस काम का
रक्तपात होता है लोगों का
रक्तरंजित हुआ है नदी का पानी।
कई जगहों पर रावी और देग के निकट बसने वाले लोगों की भाषा बहुत मधुर और शिष्ट है-
जितवल यार उतेवल काअबा।
मैं हज करों दिहुं रातीं।
न गुण रूप न दौलत पल्ले।
हिक ओंदी जात पछाती।


रावी के उत्तर में रावी और चिनाब के बीच के क्षेत्र में जो छोटी तूफानी नदियां चलती हैं, उनमें से देग अधिक शक्तिशाली है। शायद कभी, शताब्दियों पूर्व जब सिंधु और राजस्थान में सागर रहा होगा और शिवालिक में हिमपात तथा वर्षा का जोर रहा होगा, तब देविका भी शक्तिशाली धारा के रूप में चलती होगी। मगर अब तो एक मामूली जलधारा ही है। हां, पूर्ण भगत और महान पंजाबी लेखक और चिंतक गुरब2श सिंह प्रीतलड़ी इसी क्षेत्र से संबंध रखते थे, इसलिए देविका भी महान रही होगी। मगर अब तो मुझे लगता है, जैसे वह एक मुल्तानी काफी सुनाकर हमें कह रही हो-

सजनां दी महमानी खातर
खून जिगर दा छानी दा।
की साडा मंजूर ना करसें
हिक कटोरा पाणी दा?



देविका अथवा देग का स्रोत मैनाक पर्वतमाला (शिवालिक) में ज6मू क्षेत्र के जसरोता के आंचल में से आरंभ होता है, मगर उस पर्वतमाला पर क्योंकि हिमपात नहीं होता, इसलिए देविका का स्वभाव अब सदानीरा नहीं रहा। वर्षा ऋतु के अलावा उसमें बहुत कम पानी रहता है। फिर भी उसकी धारा कुछ समय में ही अपने क्षेत्र की भूमि को जितना उपजाऊ बना देती है, उसी वरदान के कारण लोग उसे वर्ष भर याद रखते हैं। मोह-मोहब्बत से...। पाणिनी ने भी 'अष्टाध्यायी' में लिखा है कि देविका अपने तटों पर रौसली (रजस्वला अथवा बरसाती) मिट्टी की एक तह छोड़ जाती है जो फसल के लिए लाभकारी होती है

पिघलता गंगोत्री : क्या गंगा अक्षुण्ण रहेगी?

गौमुख की राह उमंग और आसभरी होती है. चट्टानों पर आपका एक-एक कदम उस ग्लेशियर की तरफ ले जाता है जो गंगा का उद्भव है. घाटी में नीचे भागीरथी चीड़ व देवदार के बीच उछलती बहती है. जैसे-जैसे ग्लेशियर नजदीक आता जाता है. पेड़ दुर्लभ होते जाते हैं, केवल चट्टानें व पत्थर ही नजर आते है. यहां भी छोटे-छोटे मंदिर व ढाबे जरूर मिल जाएंगे. गंगोत्री ग्लेशियर 30 डिग्री 44' से 30 डिग्री 56' उत्तरी अक्षांश व 79 डिग्री 04' से 79 डिग्री 16' पूर्वी देशांतर के बीच फैला है. इसके सामने के मुख पर एक विशाल हिम गुफा है. भौगोलिक रूप से यह उच्च हिमालय के क्रिस्टेलाइन क्षेत्र है. यह छोटे-बड़े ग्लेशियरों का समूह है. मुख्य ग्लेशयर की लंबाई 30.20 कि.मी. व चौड़ाई 0.5-2.5 कि.मी. है. चार हजार फीट ऊंचाई पर स्थित गौमुख भागीरथी नदी का स्रोत है जो देवप्रयाग में अलकनंदा से संगम के बाद गंगा कहलाती है.
जब आप गंगा ग्लेयिर या गौमुख पर पहुंचते है तो आपकी कल्पनाएं चकनाचूर हो जाती है. यह कोई विशाल ग्लेशियर नहीं है वरन बर्फ से ढंकी चट्टानें भर है. गंगोत्री ग्लेशियर दिन-ब-दिन सिकुड़ रहा है. रास्ते में मीनारों की तरह खड़ी चट्टानों पर लिखा मिलेगा, गंगोत्री 1991 में, गंगोत्री 1961 में, गंगोत्री .... में. इसकी सिकुड़ती लंबाई को उन चट्टानों पर रिकार्ड किया जाता है. जो कभी ग्लेशियर का एक हिस्सा थीं. यदि गंगोत्री ग्लेशियर इस तरह पिघलते रहे, तो गंगा का भविष्य कैसा होगा? क्या ग्लोबल वार्मिंग उस नदी को सुखा देगा जो 50 करोड़ लोगों की जीवन रेखा है? पिघलते ग्लेशियर बर्फ का सबसे बड़ा भू भाग बनाते हैं. यहां से 7 महानदियां (यमुना, सिंधु व ब्रह्मपुत्र आदि) निकलती है. राष्ट्र संघ की जलवायु परिवर्तन संबंधी सरकारी पेनल (आई.पी.सी.सी.) विश्व भर में जलवायु परिवर्तन पर किए गए वैज्ञानिक शोध को इकट्ठा करती है.
पेनल ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में सख्त चेतावनी दी है: 'सारी दुनिया में हिमालय के ग्लेशियर सबसे तेजी से पिघल रहे हैं और अगर यही दर जारी रही तो सन् 2035 या शायद और भी पहले ये विलुप्त हो जाएंगे.' वर्तमान का 5 लाख का वर्ग कि.मी. बर्फीला क्षेत्र एक लाख वर्ग कि.मी. रह जाएगा. ग्लेशियरों के पिघलने का वर्तमान रुझान गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र व उत्तर भारतीय मैदानों में बहने वाली अन्य नदियों को मौसमी बना देगा. लेकिन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के ग्लेशियर भूसंरचना विज्ञानी मिलाप शर्मा का मानना है यद्यपि ग्लेशियर पिघल रहे हैं. फिर भी वे गुम होने नहीं जा रहे हैं क्योंकि पिछले 30-35 वर्षों से सिकुड़ने की दर में कमी आई है. करंट साइंस में छपे एक लेख में किरीट कुमार व उनके साथियों ने भी यही कहा है कि ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम से पिछले 69 वर्षों में 15.19 मीटर सुकड़न पता चली है. यद्यपि सन् 1971 के बाद सिकुड़न की दर कम हुई है और 2004-05 के बीच तो बेहद कम रही है.
यह अध्ययन एक अन्य तथ्य की ओर इशारा कर रहा है कि ग्लेशियर का दक्षिणी मुख उत्तरी भाग की तुलना में धीमे पिघल रहा है. दूसरी ओर अधिकतम सिकुड़न ग्लेशियर की मध्य रेखा में पाई गई है. इनका समर्थन करते हैं लखनऊ के रिमोट सेसिंग एप्लीकेशन सेंटर के ए.के. टांगरी. उनके अनुसार ग्लेशियर पिघलने की दर में कमी से तापमान बढ़ने की दर में भी कमी का संकेत मिलता है. हिमालय पर तापमान परिवर्तन का कोई अध्ययन नहीं हुआ है. दरअसल ऊपरी हिमालय पर दशकों से तापमान के रिकार्ड लेना मुश्किल रहा है. तापमान में वृध्दि के सही रुझान को समझने के लिये पिघले 30-40 वर्षों के आंकड़ों की जरूरत होती जबकि मात्र 7 वर्ष पहले कुछ स्वचलित मौसम केंद्र स्थापित किये गये हैं. वैसे हिमालय को छोड़कर शेष भारत में तापमान 0.42 डिग्री से 0.57 डिग्री सेल्सियस प्रति 100 वर्ष की दर से बढ़ रहा है. आई.पी.सी.सी. के अनुसार पूरे विश्व का तापमान 0.74 डिग्री सेल्सियस प्रति शब्द बढ़ा है.
सन् 1980 से भागीरथी क्षेत्र में बर्फ का भाग कम हो रहा है. अर्थात् नदी को पानी देने के लिये कम बर्फ उपलब्ध है. टांगरी का मत है कि भागीरथी के जलग्रहण क्षेत्र में कम बर्फ पिघलकर कम पानी पहुंच रहा है. राष्ट्र जल विज्ञान संस्थान, रुड़की के हिमखंड विशेषज्ञ मनोहर अरोड़ा के अनुसार ''गंगा अपने पानी के लिए गौमुख ग्लेशियर पर पूरी तरह निर्भर नहीं है.'' पश्चिम बंगाल तक का ज्यादातर जलग्रहण क्षेत्र वर्षा से ही जल प्राप्त करता है. देवप्रयाग तक का भागीरथी बेसिन (20,000 वर्ग कि.मी.) कुल गंगा जलग्रहण क्षेत्र का 7 प्रतिशत है. गंगा के कुल वार्षिक बहाव का 48 प्रतिशत जल गंगोत्री से भागीरथी में व 29 प्रतिशत देवप्रयाग में गंगा से मिलता है. शेष वर्षा के जल से प्राप्त होता है.
डॉ. चंद्रशीला गुप्ता

गमगीन झीलों में गंगा को तबदील मत कीजिए

यह नदी हमारी आस्था और परंपराओं से जुड़ी है, जिनके बूते ही हम बचे रह सके हैं
पवन कुमार गुप्ता
पिछले दिनों प्रोफेसर गुरुदास अग्रवाल ने घोषणा की कि वह आगामी गंगा दशहरा यानी 17 जून से उत्तरकाशी में गंगा की रक्षा एवं संवर्ध्दन-संरक्षण को लेकर आमरण अनशन करेंगे। मुजफ्फरनगर के एक गांव में पैदा हुए गुरुदास अग्रवाल आईआईटी कानपुर में एनवायरमेंटल साइंस पढ़ाते रहे। पर्यावरण संरक्षण पर गठित केंद्र और राज्य सरकार की अनेक समितियों के वह सदस्य भी रहे। बर्कले यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद प्रोफेसर अग्रवाल ने पश्चिमी अवधारणाओं के बजाय भारतीय चिंतन और परंपरा के नजरिये से पर्यावरण को देखने पर बल दिया। पर्यावरण के बारे में उनकी समझ गहरी रही है। लेकिन उनकी दृष्टि को लगातार नजरअंदाज किया गया। इस संदर्भ में वर्तमान निर्वासित ति4बती सरकार के प्रधानमंत्री सामदोंग रिन्पोछे का वह कथन याद आता है, जिसमें उन्होंने तब कहा था, 'अधिकांश लोग वही शब्दावली इस्तेमाल करते हैं, जो पाश्चात्य पध्दति में प्रचलित है।
...एक भारतीय व्यक्ति भारतीय पध्दति से जीवन व्यतीत करे, भारतीय सोच-पध्दति से सोचे, तो उसमें एक मौलिकता रहती है। लेकिन हम लोगों ने यह आदत डाल रखी है कि जो कुछ भी सोचना हो, खोजना हो, विश्लेषण करना हो, सभी पाश्चात्य पध्दति से करें, ताकि उसको कहा जा सके कि वह साइंटिफिक है।' साफ है, पढ़े-लिखे भारतीय, जिनमें हमारे नीतिकार और विषेशज्ञ शामिल हैं, पश्चिम से बुरी तरह प्रभावित हो गए हैं। कहीं गहरे में एक हीन भावना भी है कि हमें अपनी चीजों, अपनी परंपराओं को या तो नजरअंदाज करना है या उन्हें 'साइंटिफिक' चोला पहनाकर पेश करना है। मानो साइंस सत्य की खोज न रहकर, एक भूत जैसा बन गया है, जो हमें डराता रहता है और हम डर की वजह से जो सही है, जो हमें अंदर से स्वीकार होता है, उसे नकारते रहते हैं। हमारे देश में नदियों का जितना सम्मान है, उतना शायद किसी अन्य देश में नहीं। ऐसा अनुमान है कि नर्मदा नदी, अमर कंटक से अरब सागर तक की तीन हजार किलोमीटर की दूरी की परिक्रमा किसी भी समय पचास हजार साधारण ग्रामीण करते रहते हैं। ये लोग इस यात्रा को तीन वर्ष, तीन माह और 33 दिन में पूरा करते हैं। और इस पूरी अवधि में रहने-खाने के लिए उन्हें कोई खास खर्च नहीं करना पड़ता। रास्ते भर साधारण लोग इनका आतिथ्य सत्कार करके अपने को धन्य मानते हैं। कमोबेश ऐसा अन्य नदियों के साथ भी होता है। एक बार एक साधु ने, जिन्होंने गोमुख से गंगा सागर तक की 2,500 किलोमीटर की परिक्रमा जीवन में दो बार की है, लेखक को बताया कि नदी के दोनों तटों पर उन्हें एक भी ऐसा गांव ऐसा नहीं मिला, जिसका गंदा-मैला गंगा में जाता हो और इसके उलट, एक भी ऐसा शहर नहीं मिला, जिसका गंदा-मैला, गंगा में नहीं जाता हो। पर्यावरण की बात करने वाले पढ़े-लिखे लोग फिर भी गांव को पिछड़ा और शहर को विकसित कहते हैं। क्या वास्तव में यह विरोधाभास नहीं है?
हमें तीर्थ यात्रियों, श्रध्दालुओं की गंदगी दिखलाई देती है, परंतु शहर, जो लगातार अपना मल-मूत्र, मैला-कुचला और फैक्टरियों का प्रदूषण हमारी पवित्र नदियों और सागर में दिन-रात डालते रहते हैं, वह हमें नजर नहीं आता, क्योंकि यह पश्चिम वालों को भी नजर नहीं आता।
आज भी नदियों का प्रदूषण धार्मिक अनुष्ठानों की वजह से जितना होता है और शहर की गंदगी एवं औद्योगिक कचरे से जितना होता है, इसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती। फिर भी धार्मिक अनुष्ठान करने वाले लोग हीन दृष्टि से देखे जाते हैं। आज आस्था और विश्वास अंधविश्वास के पर्याय बन गए हैं। जबकि इस आस्था के अनेक प्रतीक आज भी विद्यमान हैं, जिनमें भारत की पवित्र नदियां एक अहम भूमिका निभाती हैं। और इन नदियों में सर्वोपरि है गंगा। ठीक उसी तरह, जैसे पहाड़ों में हिमालय। दरअसल, हमारी आस्था और हमारी परंपराओं ने ही हमें बचा रखा है। देश के साधारण व्यखति के लिए उसकी आस्था एक बड़ी श1ति है। इसलिए उसे बाहर से कितना ही क्यों न दबाया जाए, अंदर से इस बड़ी शखति में उसे भरोसा रहता है। इसकी वजह से हजारों जुल्मों के बीच भी आदमी अपने को जिंदा रख पाता है।
भारतीय समाज के इस विश्वास की गहरी समझ महात्मा गांधी को थी। तभी वह इतने बड़े जनमानस को अपने साथ खड़ा कर पाए। तभी 1907 के भारत में जिन लोगों की यह हालत थी कि वे अंगरेजों के सामने बोलना तो दूर, अपनी आंखें नीची किए रखते थे, वही गांधी जी के भारत आने के साल-दो-साल के बाद ही, यानी 1917 तक इतनी हिम्मत जुटा लेते हैं कि अंगरेजों को दो-चार बातें सुनाने लायक बन जाते हैं। महात्मा गांधी लोगों के भीतर बसी इस आस्था के बीज का सहारा लेकर उनमें शक्ति फूंकते थे। लेकिन इसके विपरीत आधुनिक शिक्षा एवं तंत्र अनजाने ही इस आस्था के बीज को कुचलकर लोगों को श1तिहीन करने के प्रयास करते आए हैं। जाहिर है, शक्तिहीन लोगों पर शासन करना आसान है, उन्हें हांकना आसान है, उन्हें मारना भी आसान है। वे कठपुतली बन जाते हैं, वे आशाविहीन होते हैं। आस्थाविहीन होने का मतलब ही है आशाविहीन होना। ऐसा व्य1ति ज्यादा-से-ज्यादा एक कानून मानने वाला एक अच्छा नागरिक बन सकता है। इस अच्छे नागरिक की लालसा अमेरिकी जीवनशैली की नकल करने की हो सकती है। इस अच्छे नागरिक को फिर अपनी ही जनसं2या बोझ लगने लगती है।
ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार आजकल अमेरिकी राष्ट्रपति को हमारी जनसंख्या बोझ लगने लगी है। इन्हें साफ-सुथरे मकानों और मुहल्लों में रहना तो बहुत महत्वपूर्ण लगता है, परंतु उस सफाई को बनाए रखने के लिए जिन स्लमों में रहने वाले लोगों की जरूरत पड़ती है, वे आंखों से ओझल रहें, ऐसा भी जरूरी लगता है। ऐसे ही विकास के वे सेवक बन जाते हैं। दुनिया और भारत को अगर बचाना है, तो आस्था को बचाना महत्वपूर्ण है। अन्यथा हम एक आक्रामक और भयभीत समाज को पोषित करेंगे। गंगा हमारी आस्था की प्रतीक नदी है। इसकी राह में अवरोध पैदा करना, इसको प्रदूषित करने के समान एक बड़ा अपराध है। 1योंकि यह अवरोध हमारी आस्था को डगमगाएगा। और जब आस्था डगमगाएगी, तो हम बच नहीं पाएंगे। टिहरी बांध से पहले ही बहुत बड़ा नुकसान हम कर चुके हैं। टिहरी से गंगा अविरल बहने वाली नदी न रहकर एक ठहरी हुई, गमगीन व उदास झील में परिवर्तित हो गई है। प्रोफेसर अग्रवाल जैसे मनीषी चाहते हैं कि कम से कम उत्तरकाशी तक तो भागीरथी को मानव-हस्तक्षेप से दूर रखा जाए।
(लेखक गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
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समझना होगा गंदे पानी के गणित को - सुनीता नारायण

जन इस्तेमाल के बाद निकलने वाले गंदे पानी के बारे में आज कोई सोचने की जरूरत नहीं समझता। इस बारे में अगली दफा जब आप सड़क मार्ग या रेल से देश के किसी हिस्से की यात्रा पर निकलें, तो खिड़की से बाहर जरा गौर से झांकिए।
रास्ते में जहां कहीं भी आपको रिहायशी इलाके दिखेंगे, उनके इर्दगिर्द गंदे और काले पानी से भरे गङ्ढे (कचड़ों के ढेर के अलावा) नजर आएंगे, जिनसे जलनिकासी का कोई रास्ता नहीं होता।
एक मशहूर जुमला है - जहां मानव आबादी रहती है, वहां मल उत्सर्जन तो होगा ही। पर आधुनिक समाज ने एक और सचाई गढ़ दी है, वह है - जहां पानी है, वहां उसकी बर्बादी तो होगी ही।

माना जाता है कि घरों में पहुंचने वाले पानी के मोटे तौर पर 80 फीसदी हिस्से का इस्तेमाल कर उसे बहा दिया जाता है।इस समस्या की जड़ में दो चीजें हैं। पहली यह कि हमारी सोच सिर्फ पानी तक ही सीमित है। हम इस बारे में सोचने की जरूरत महसूस नहीं करते कि पानी से पैदा होने वाले कचड़े (गंदे पानी) का क्या हो। दूसरी यह कि हमें लगता है कि हमारे पास सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट हैं, जो गंदे पानी की रीसाइकलिंग कर इसे दोबारा इस्तेमाल के लायक बना देते हैं। यहां तक कि योजनाकारों की फिक्र भी ज्यादातर इसी बात को लेकर होती है कि लोगों को पानी मिले, उनकी नजर सिक्के के दूसरे पहलू की ओर नहीं जाती।

यानी लोगों द्वारा साफ पानी का इस्तेमाल किए जाने के बाद जो गंदा पानी आएगा, उसके बारे में सोचना वे ज्यादा जरूरी नहीं समझते। पर यह सोचा जाना बहुत जरूरी है कि गंदा पानी आखिरकार कहीं तो जाएगा (और जाता ही है) चाहे वे नाले, तालाब, झील हों या नदियां। इस तरह फैलने वाली गंदगी से पशु और मनुष्य जाति की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। इस गंदे पानी को जमीन भी सोख लेती है। इससे ग्राउंड वाटर प्रदूषित होता है, जिनका इस्तेमाल लोग पीने के लिए करते हैं। ग्राउंड वॉटर से जुड़े सर्वे बताते हैं कि उनमें नाइट्रेट की ज्यादा से ज्यादा मात्रा बढ़ रही है, जो बेहद घातक है।

ग्राउंड वॉटर में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ने के लिए जाहिर तौर पर जमीन के ऊपर से सोखे जाने वाला गंदा पानी ही जिम्मेदार है। मिसाल के तौर पर दो शहरों दिल्ली और आगरा को ही ले लीजिए, जो यमुना के किनारे बसे हैं। दोनों ही शहर पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं। दिल्ली को पहले से ही टिहरी बांध (जहां 500 किलोमीटर क्षेत्र में जल संचय किया गया है) से पानी मिल रहा है। अपनी प्यास बुझाने के लिए आगरा की नजर भी टिहरी पर टिकी है। दिलचस्प यह है कि दिल्ली में यमुना को इतना ज्यादा प्रदूषित कर दिया जाता है कि आगरा पहुंचकर भी उसका पानी इस लायक नहीं रहता कि सफाई के बाद उसे पीने लायक बनाया जा सके।

आगरा का कहना है कि इस पानी को साफ करने के लिए उसे बड़े पैमाने पर क्लोरीन का इस्तेमाल करना पड़ेगा और इससे बेहतर है कि टिहरी (जहां गंगा की ऊपरी धारा है) से स्वच्छ पानी के इंतजाम के विकल्प को खंगाला जाए।जाहिर है हम एक अजीब घातक भंवर में फंसते जा रहे हैं। जैसे-जैसे भूजल और भूमिगत जल गंदा हो रहा है, शहरों के पास पानी के दूसरे विकल्प तलाशने के अलावा कोई और उपाय नहीं है। यह खोज काफी व्यापकता ले रही है और जैसे-जैसे दूरी बढ़ती है, पंपिंग और सप्लाई का खर्च काफी बढ़ जाता है।

यदि नेटवर्क की मेंटिंनेस पर ध्यान नहीं दिया जाए, तो पानी की बर्बादी काफी बढ़ जाती है। आज देश के नगर निगमों का आधिकारिक रूप से कहना है कि लीकेज की वजह से 30 से 50 फीसदी पानी की बर्बादी होती है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि सप्लाई के लिए कम पानी है और उन पर आने वाला खर्च ज्यादा है।यह मामला पानी से पैदा होने वाले कचड़े से भी जुड़ा है। इस बारे में हमारे पास अभी किसी तरह के आंकड़े नहीं है। यानी कितना कचड़ा पैदा होता है, उसमें से कितने का ट्रीटमेंट किया जाता है और कितने का नहीं, इस बारे में अभी कोई ठोस आकलन नहीं है।

पानी से पैदा होने वाले कचड़े का कितना बोझ हमारे शहरों पर है, इस बारे में भी कोई ठोस आंकड़ा नहीं है, क्योंकि लोग अलग-अलग स्रोतों से पानी लेते हैं और अलग-अलग तरीकों से उसे अपशिष्ट के रूप में छोड़ते हैं।फिलहाल हम सीवेज के आकलन का काम काफी अजीब तरीके से करते हैं। हम यह मान लेते हैं कि नगर निगमों द्वारा सप्लाई किए जाने वाले पानी का 70 से 80 फीसदी हिस्सा सीवेज के रूप में वापस आ जाता है। पर पानी का यह गणित सही नहीं है। ऐसा होता है कि पानी की सप्लाई की गई, पर वह लीकेज की वजह से रास्ते में ही बर्बाद हो गया यानी घरों तक पहुंचा ही नहीं। कई दफा पानी की सप्लाई बाधित होने की वजह से लोग मजबूरन या तो ग्राउंड वॉटर का इस्तेमाल करते हैं या टैंकर आदि से पानी खरीदते हैं। पर ये सारा पानी सीवेज का रूप तो लेता ही है।

यानी पानी हासिल करने का स्रोत जो भी हो, इसे सीवेज तो बनना ही है।फिलहाल देश में उत्सर्जित कुल गंदे पानी (सरकारी आंकड़े के हिसाब से लें तो) के महज 18 फीसदी हिस्से का ट्रीटमेंट किया जाता है। वॉटर ट्रीटमेंट प्लांटों में रीसाइकलिंग कर ऐसा किया जाता है। पर यह बात स्वीकारी जा चुकी है कि इनमें से कुछ ट्रीटमेंट प्लांट इसलिए काम नहीं करते, क्योंकि इन्हें चलाने में आने वाली लागत काफी ज्यादा है और कुछ प्लांट इसलिए काम नहीं करते, क्याेंकि उन्हें जरूरी मात्रा में गंदा पानी हासिल नहीं हो पाता। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि वॉटर पाइपलाइन की तर्ज पर सीवेज पाइपलाइन नहीं हैं और यदि थोड़े बहुत हैं भी, तो उनके रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया जाता। यदि इन सब मामलों पर गंभीरता से विचार किया जाए, तो नतीजा निकलता है कि लोगों द्वारा उत्सर्जित गंदे पानी के 13 फीसदी हिस्से का ट्रीटमेंट सही तरीके से हो पाता है। हमें गंदे पानी के इस गणित को समझना होगा, ताकि हम इसका हल निकाल सकें।
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पानी रे पानी - महेश परिमल


२२ मार्च विश्व जल दिवस के अवसर पर विशेष

२२ मार्च याने विश्व जल दिवस। पानी बचाने के संकल्प का दिन। पानी के महत्व को जानने का दिन और पानी के संरक्षण के विषय में समय रहते सचेत होने का दिन। आँकड़े बताते हैं कि विश्व के १.४ अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नही मिल रहा है। प्रकृति जीवनदायी संपदा जल हमें एक चक्र के रूप में प्रदान करती है, हम भी इस चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। चक्र को गतिमान रखना हमारी ज़िम्मेदारी है, चक्र के थमने का अर्थ है, हमारे जीवन का थम जाना। प्रकृति के ख़ज़ाने से हम जितना पानी लेते हैं, उसे वापस भी हमें ही लौटाना है। हम स्वयं पानी का निर्माण नहीं कर सकते अतः प्राकृतिक संसाधनों को दूषित न होने दें और पानी को व्यर्थ न गँवाएँ यह प्रण लेना आज के दिन बहुत आवश्यक है।

पानी के बारे में एक नहीं, कई चौंकाने वाले तथ्य हैं। विश्व में और विशेष रुप से भारत में पानी किस प्रकार नष्ट होता है इस विषय में जो तथ्य सामने आए हैं उस पर जागरूकता से ध्यान देकर हम पानी के अपव्यय को रोक सकते हैं। अनेक तथ्य ऐसे हैं जो हमें आने वाले ख़तरे से तो सावधान करते ही हैं, दूसरों से प्रेरणा लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और पानी के महत्व व इसके अनजाने स्रोतों की जानकारी भी देते हैं।

- मुंबई में रोज़ वाहन धोने में ही ५० लाख लीटर पानी खर्च हो जाता है।
- दिल्ली, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों में पाइप लाइनों के वॉल्व की खराबी के कारण रोज़ १७ से ४४ प्रतिशत पानी बेकार बह जाता है।
- इज़राइल में औसतन मात्र १० सेंटी मीटर वर्षा होती है, इस वर्षा से वह इतना अनाज पैदा कर लेता है कि वह उसका निर्यात कर सकता है। दूसरी ओर भारत में औसतन ५० सेंटी मीटर से भी अधिक वर्षा होने के बावजूद अनाज की कमी बनी रहती है।
- पिछले ५० वर्षों में पानी के लिए ३७ भीषण हत्याकांड हुए हैं।
- भारतीय नारी पीने के पानी के लिए रोज ही औसतन चार मील पैदल चलती है।
- पानीजन्य रोगों से विश्व में हर वर्ष २२ लाख लोगों की मौत हो जाती है।
- हमारी पृथ्वी पर एक अरब ४० घन किलो लीटर पानी है. इसमें से ९७.५ प्रतिशत पानी समुद्र में है, जो खारा है, शेष १.५ प्रतिशत पानी बर्फ़ के रूप में ध्रुव प्रदेशों में है। इसमें से बचा एक प्रतिशत पानी नदी, सरोवर, कुओं, झरनों और झीलों में है जो पीने के लायक है। इस एक प्रतिशत पानी का ६० वाँ हिस्सा खेती और उद्योग कारखानों में खपत होता है। बाकी का ४० वाँ हिस्सा हम पीने, भोजन बनाने, नहाने, कपड़े धोने एवं साफ़-सफ़ाई में खर्च करते हैं।
- यदि ब्रश करते समय नल खुला रह गया है, तो पाँच मिनट में करीब २५ से ३० लीटर पानी बरबाद होता है।
- बाथ टब में नहाते समय ३०० से ५०० लीटर पानी खर्च होता है, जबकि सामान्य रूप से नहाने में १०० से १५० पानी लीटर खर्च होता है।
- विश्व में प्रति १० व्यक्तियों में से २ व्यक्तियों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल पाता है।
- प्रति वर्ष ६ अरब लीटर बोतल पैक पानी मनुष्य द्वारा पीने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
नदियाँ पानी का सबसे बड़ा स्रोत हैं। जहाँ एक ओर नदियों में बढ़ते प्रदूषण रोकने के लिए विशेषज्ञ उपाय खोज रहे हैं वहीं कल कारखानों से बहते हुए रसायन उन्हें भारी मात्रा में दूषित कर रहे हैं। ऐसी अवस्था में जब तक कानून में सख्ती नहीं बरती जाती, अधिक से अधिक लोगों को दूषित पानी पीने का समय आ सकता है।
- पृथ्वी पर पैदा होने वाली सभी वनस्पतियाँ से हमें पानी मिलता है।
आलू में और अनन्नास में ८० प्रतिशत और टमाटर में ९५ प्रतिशत पानी है।
- पीने के लिए मानव को प्रतिदिन ३ लीटर और पशुओं को ५० लीटर पानी चाहिए।
- १ लीटर गाय का दूध प्राप्त करने के लिए ८०० लीटर पानी खर्च करना पड़ता है, एक किलो गेहूँ उगाने के लिए १ हजार लीटर और एक किलो चावल उगाने के लिए ४ हजार लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इस प्रकार भारत में ८३ प्रतिशत पानी खेती और सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है।

पानी के विषय में विभिन्न सरकारी नियमों और नीतियों के विषय में जानकारी भी इसके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत में १९९१ में भारतीय अर्थव्यवस्था में खुलेपन कारण एक के बाद एक कई क्षेत्रों में निजीकरण की परंपरा शुरू हो गई है। सबसे बड़ा झटका जल क्षेत्र के निजीकरण का मामला है। जब भारत में बिजली के क्षेत्र को निजीकरण के लिए खोला गया, तब इसके बहुत से लाभ देखे गए थे और इसके दुष्परिणामों का ठीक से आकलन नहीं किया गया। बाद में सरकार ने यह स्वीकार किया निजीकरण सफल नहीं रहा। अब जल के निजीकरण से पहले ही इसके दुष्परिणामों पर भी पहले से ठीक से विचार करना आवश्यक है।

समय आ गया है जब हम वर्षा का पानी अधिक से अधिक बचाने की कोशिश करें। बारिश की एक-एक बूँद कीमती है। इन्हें सहेजना बहुत ही आवश्यक है। यदि अभी पानी नहीं सहेजा गया, तो संभव है पानी केवल हमारी आँखों में ही बच पाएगा। पहले कहा गया था कि हमारा देश वह देश है जिसकी गोदी में हज़ारों नदियाँ खेलती थी, आज वे नदियाँ हज़ारों में से केवल सैकड़ों में ही बची हैं। कहाँ गई वे नदियाँ, कोई नहीं बता सकता। नदियों की बात छोड़ दो, हमारे गाँव-मोहल्लों से तालाब आज गायब हो गए हैं, इनके रख-रखाव और संरक्षण के विषय में बहुत कम कार्य किया गया है।

पानी का महत्व भारत के लिए कितना है यह हम इसी बात से जान सकते हैं कि हमारी भाषा में पानी के कितने अधिक मुहावरे हैं। आज पानी की स्थिति देखकर हमारे चेहरों का पानी तो उतर ही गया है, मरने के लिए भी अब चुल्लू भर पानी भी नहीं बचा, अब तो शर्म से चेहरा भी पानी-पानी नहीं होता, हमने बहुतों को पानी पिलाया, पर अब पानी हमें रुलाएगा, यह तय है। सोचो तो वह रोना कैसा होगा, जब हमारी आँखों में ही पानी नहीं रहेगा? वह दिन दूर नहीं, जब सारा पानी हमारी आँखों के सामने से बह जाएगा और हम कुछ नहीं कर पाएँगे।

लेकिन कहा है ना कि आस का दामन कभी नहीं छूटना चाहिए तो ईश्वर से यही कामना है कि वह दिन कभी न आए जब इंसान को पानी की कमी हो।

लेकिन कहा है ना कि आस का दामन कभी नहीं छूटना चाहिए तो ईश्वर से यही कामना है कि वह दिन कभी न आए जब इंसान को पानी की कमी हो। विज्ञान और पर्यावरण के ज्ञान से मानव ने जो प्रगति की है उसे प्रकृति संरक्षण में लगाना भी ज़रूरी है। पिछले सालों में तमिलनाडु ने वर्षा के पानी का संरक्षण कर जो मिसाल कायम की है उसे सारे देश में विकसित करने की आवश्यकता है।
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हर बीस मिनट में मछली की एक प्रजाति का अंत

संसार भर में पर्यावरण पर प्रदूषण का असर कितना खतरनाक हो रहा है, यह बात अब किसी से छिपी नहीं है। प्रदूषण और विश्व में हो रहे मौसम परिवर्तन के कुप्रभाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रत्येक 20 मिनट में मछली की एक प्रजाति लुप्त हो रही है। लखनऊ में शनिवार को इंडियन फिश जेनेटिक रिसोर्सज विषय पर आयोजित एक सम्मेलन में इंडियन काउंसिल और एग्रिकल्चरल रिसर्च (आई.सी.ए.आर.) के ए.डी.जी. (फिशरी) डाक्टर ए.डी. दीवान ने कहा कि यह खतरा भारत के संदर्भ में और बढ़ जाता है, क्योंकि कई समुद्री जीव पहले से ही लुप्त होने के कगार पर है। दीवान ने भारतीय उप महाद्वीप में लुप्त हो रही प्रजातियों को बचाने के लिए प्रभावी कदम उठाने पर जोर दिया उन्होंने जैव विविधता कानून 2002 और कानून 2004 के बारे में कहा कि इस पर अभी अमल शुरू भी नहीं किया गया है। साथ ही, संबंधित अधिकारियों और लोगों से इस कानून पर अमल करने का अनुरोध किया।
कन्हैया ने कहा कि भारत में खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मछली पालन को बढ़वा दिया जाना चाहिए। वर्तमान स्थिति को देखते हुए मछली और समुद्री खाद्यों के क्षेत्र में शोध किए जाने और इनकी उत्पादकता बढ़ाए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जैव विविधता से संपन्न देशों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। इसके उदाहरण के रूप में उन्होंने भारत, ब्राजील और चीन का नाम लिया। इस अवसर पर एन.बी.एफ.जी.आर. के निदेशक डाक्टर डब्लू.एस. लाकरा ने कहा कि भारत जल जैव विविधता के क्षेत्र में काफी समृद्ध रहा है, इसलिए इनका संरक्षण काफी महत्वपूर्ण है। साथ ही लाकरा ने मछली के जेनेटिक संसाधनों के विकास और संरक्षण पर प्रभावी कदम उठाने को जोर दिया। जिससे प्रकृति के विविध रूपों को बचाया जा सके। इन सब बातों को देखते हुए मनुष्य अब भी नहीं चेतता है, तो वह दिन दूर नहीं, जब इन जीवों के दर्शन किताबों में ही हुआ करेंगे। फिलहाल दुनिया में मछलियों की करीब 26,710 प्रजातियां हैं, जिनमें से 7000 प्रजाति की मछलियों तक मानव की अच्छी पहुंच है।
करीब 2000 मछलियों के बारे में ही मानव ठीक से जान पाया है। इनमें से कई प्रजाति की मछलियों का उपयोग खाने, सजाने व अन्य कामों में होता है। केवल नदियों में ही नहीं, बल्कि समुद्र में भी मछलियों पर संकट मंडरा रहा है।

गंगा का अस्तित्व समाप्ति की ओर

सतयुग में राजा भागीरथ की तपस्या से भगवान शंकर की जटाओं से अवतरित होकर धरती पर आई गंगा आज अपनी पवित्रता को खोती जा रही है। आचमन के लायक भी इसका पानी नहीं बचा। खेती कि सिंचाई के योग्य बी अब पानी नहीं रहा। इसका कारण ऑक्सीजन की कमी एवं लोकल कोलिफार्म की मात्रा का अधिक होना है, जो बताया है कि गंगा में नुकसानदायक जीवाणुओं की मात्रा अधिक है। इलाहाबाद और वाराणसी जो धार्मिक और पवित्र शहर माने जाते हैं, वहाँ गंगा मानव और जानवरों के सड़े-गले शवों को ढो रही है तथा शहर का सीवर लाईन का (मल-मूत्र, गंदा जल) अपने पानी में समा रही है। लगता है अब गंगा समाप्ति की ओर अग्रसर है।
त्र+ग्वेद में कहा गया है कि हमारे त्र+षि सबसे पहले गंगा को नमन कर उसका आचमन करते थे। गंगा भागीरथ की तपस्या का प्रतिफल है। आज के कलयुग में सतयुग की अवतरित गंगा अपने अस्तित्व को बचाने में असफल रही है। वह अब मरणासन्न स्थित में आ गई है। जिस गंगा का पा वेदों-पुराणों में होता रहा, अब भविष्य में वह जब लोप हो जावेगी तब उसकी कहानी हमें देखने-सुनने को भी शायद ही मिले।
जिस गंगा की दो बूंद पीने से मृत्यु पूर्व व्यक्ति की शांति प्राप्त होती थी। गंगा में स्नान करके सनातनधर्मी अपने को धन्य मानता था। जिस गंगा में डुबकी लगाने के लिये हिन्दू समाज और उसके त्र+षि मुनि लालायित रहते थे, उन्हें उससे मन की शांति तथा पवित्रता का भास होता था। वहाँ अब इसमें स्नान करने से लोग कतराते हैं। लोगों को रोगों के लगने का भय सा बना हुआ है। क्योंकि इस गंगा में अब ऑक्सीजन की मात्रा समाप्त सी हो गई है।
अन्य शहरों की हम बात नहीं करते। भारत के पवित्र एवं धार्मिक नगरों इलाहाबाद और वाराणसी में ही अगर इस गंगा की दयनीय दशा को देखेंगे तो हमारी इसके प्रति विरक्ति हो जावेगी। स्वयं लेखक ने इलाहाबाद और बनारस में सड़े-गले एवं अधजले मानव शवों एवं पशुओं की लाशों को गंगा में बहते देखा है। इन शहरों का सीवर लाईन का मल-जल एवं गन्दा पानी इसमें डाला जा रहा है। जिसे प्रशासन, नगर पालिक निगम तथा गंगा प्रदूषण बोर्ड तक नहीं रोक पाते है। गंगा की स्वच्छता एवं सफाई के लिये 1985-86 में राजीव गांधी ने 1500 करकोड़ की योनजा स्वीकृत की थी। इस योजना को तीन चरणों में सम्पन्न किया जाना था, किन्तु इसका पहला चरण ही अनपे लक्ष्य तक नहीं पहुँच सका। द्वितीय एवं तृतीय चरण का कोई अता-पता नहीं।
विगत दिनों, डॉ. मनमोहन सिंह ने वाराणसी का दौरा किया। यहाँ के घाटों का अवलोकन किया तब प्रशासन गंगा की स्वच्छता की ओर सजग हुआ। किन्तु वह भी अच्छा मजाक था। घाटों की गंदगी वर्षों से साफ नहीं हुई थी। उसकी सफाई की गई। उसे पानी की तेज़ धार से धोया गया किन्तु उन घाटों की सफाई के दौरान पूरी गंदगी गंगा में ही प्रवाहित की गई। गंगा की स्वच्छता के नाम पर उसमें गंदगी स्वयं नगर पालिक निगम एवं प्रशासन के अधिकारियोंन खड़े होकर डलवायी। इस घटना पर वाराणसी के सजग पर्यावरणविद एवं गंगा स्वच्छता के लिये समर्पित संकट मोचन फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रो. वीरभद्र मिश्र ने कहा कि यहाँ गंगा की सफाई के नाम पर उसका माखौल उड़ाया गया है, जिसका हम विरोध करते हैं।
वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार अगर देखें तो मात्र वाराणसी अकेले में ही 40 करोड़ लीटर सीवर का गंदा (मल-जल) पानी गंगा में प्रतिदिन डाला जाता है। प्रो. वीरभद्र मिश्र द्वारा स्थापित गंगा अनुसंधान प्रयोगशाला के अनुसार इसका पानी पीने योग्य होने के लिए इसमें आदर्श रूप में तो फीकल कोलिफार्म बिलकुल नहीं होना चाहिए। लेकिन सरकार की ओर से निर्धारित स्तर के अ़नुरूप भी यह प्रति लीटर 5 हज़ार से अधिक कतई नहीं होने चाहिए। नहाने योग्य पानी में 50 हज़ार से कम, केती योग्य पानी में 5 लाख से कम होना चाहिए।
लेकिन वाराणसी में इस समय गंगा नदी के विभिन्न घाटों में फीकल कोलिफार्म की संख्या 4 लाख 90 हज़ार से लेकर 21 लाख तक है। फीकल कोलिफार्म की संख्या अधिक होना यह दर्शाता है कि पानी में नुकसानदायक सूक्ष्म जीवाणु बड़ी मात्रा में मौजूद है। इसका परिणाम यह है कि अब गंगा अपने पतित पावनी स्वरूप को छोड़ कर रोगों को देने वाली हो गई है। रैज्ञानिकों का तो यहाँ तक कहना है कि नहाने की बात छोड़िए, गंगा का पानी अब सिंचाई के लायक भी नहीं रहा, पीने की बात तो दूर की रही है।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में गंगा अनुसंदान प्रयोगशाला के प्रोफेसर उदयकांत चौधरी के अ़नुसार वाराणसी में गंगा जल में ऑक्सीजन की भी भारी कमी देखी गई है। जहाँ शुद्ध पेयजल में ऑक्सीजन की मात्रा कम से कम 8 कण प्रति 10 लाख कण (पीपीएम) होनी चाहिए। वह घट कर महज साढ़े 3 से 4 पी.पी.एम. तक रह गई है। शासन भले ही इस बात को नकारे वह इसके लिये घाटों की जगह अन्य जगह से परीक्षण कर खानापूर्ति करें, पर यह गलत है। केन्द्र सरकार ने एक मामले में सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया कि गंगा का पानी जैसा 1985 में था, वैसा ह है। उसमें कतई परिवर्तन नहीं हुआ। यानि गंगा गंदी की गंदी ही है। गंगा की शुद्धि का 15 सौ करोड़ रुपया पानी में बह गया या कहें अधिकारियों और ठेकेदारों की जेबों में चला गया।
जितना कुछ स्वच्छता का काम हुआ है वह भी पुन अपने पहले स्वरूप में आ गया है। वाराणसी के बाद हुगली में गंगा गंदगी का महारूप लेकर समुद्र में विलीन हो जाती है, अगर शासन देश के नागरिकों एवं संगठनों में जागृति आ जाती है तो गंगा पूर्व की भांति पवित्र हो सकती है। उसका स्वरूप बदला जा सकता है।
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सूखे की मार से लोग मप्र से कर रहे हैं पलायन

टीकमगढ़, 13 अप्रैल (आईएएनएस)। मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले के करमौरा गांव में रहने वाला 75 वर्षीय मोहन यादव असहाय होकर अपनी मौत का इंतजार कर रहा है। घोर गरीबी में गुजर बसर कर रहा उसका परिवार जब अपने पड़ोसियों से खाना मांग-मांग कर शर्मिदा हो गया तब उसने काम की तलाश में दिल्ली जाने का फैसला किया।

परिवार का यह फैसला मोहन के लिए और अधिक पीड़ा लेकर आया। वृद्धावस्था के कारण एक ओर जहां वह परिवार के साथ बाहर जाने में असमर्थ था वहीं दूसरी ओर उसका अशक्त शरीर उसे अपनी आजीविका के लिए काम करने की इजाजत भी नहीं दे रहा था। परिस्थितियों से निराश मोहन ने कई बार आत्महत्या करने की कोशिश की।

मध्य प्रदेश के कई जिलों के लिए ऐसे वाकये नए नहीं हैं, लगातार दो दशकों से चले आ रहे सूखे और अपर्याप्त वर्षा ने लोगों को अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया है। इस साल राज्य के 48 में से 39 जिले बरसात की कमी का सामना कर रहे हैं। हालात इतने खराब हैं कि पानी बाजार में बिकने लगा है।

जिले के घूरा गांव की झीतबाई कहती हैं, "हमने सपने में भी नहीं सोचा था कि किसी दिन हमें पानी खरीद कर पीना पड़ेगा।" गांव के पास स्थित एक कुएं का मालिक 50 रुपये में दो लोटा पानी देता है। कोई दूसरा विकल्प न होने से लोग मजबूरन इतनी बड़ी कीमत चुका कर पानी खरीदने के लिए विवश हैं।

हिमारपुरा गांव में लगाए गए आठ हैंडपंपों में से एक भी काम नहीं कर रहा है। गांव में ज्यादातर आबादी केवट समुदाय के लोगों की है जिनका पेशा है मछली मारना। पिछले चार सालों से लगातार पड़ रहे सूखे के कारण जब क्षेत्र की सारी नदियां सूख गईं तो इस समुदाय के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया, नतीजतन समुदाय के 60 फीसदी लोग यहां से पलायन कर गए हैं।

टीकमगढ़ जिले के दूसरे गांवों में भी स्थिति इससे ज्यादा बेहतर नहीं है। जिले के जतारा ब्लाक के करमौरा गांव के 600 परिवारों में से 400 अपने घर छोड़ कर जा चुके हैं। ये प्रवासी मजदूर दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बेहद कम मेहनताने पर काम करने के लिए मजबूर हैं। गांव वालों से बातचीत करने पर पता चला कि लोगों के घर छोड़कर बाहर जाने को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता।

लोगों के घर छोड़ कर जाने के आंकड़ों पर अगर गौर किया जाए तो इसका सबसे ज्यादा असर अहिरवार (दलित) समुदाय पर पड़ा है। जतारा ब्लाक से जाने वाले 400 परिवारों में से 40 फीसदी अहिरवार समुदाय के हैं। पहले के तीन-चार महीनों के मुकाबले अब इन गांवों के लोग 6-8 महीनों के लिए अपना घर छोड़ कर परदेस जाने लगे हैं। पुरुषों और स्त्रियों दोनों के बाहर जाने के कारण गांव में केवल बूढ़े और अशक्त लोग ही बचते हैं।

सरकार द्वारा लोगों का पलायन रोकने के लिए किए जा रहे उपाय भी काम नहीं आ रहे हैं। बैरवार खास में 894 परिवारों को रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत रोजगार की आवश्यकता थी लेकिन यहां सिर्फ 30 परिवारों को ही रोजगार उपलब्ध कराया जा सका। योजना के अनुसार हर परिवार को दो साल में दो सौ दिनों तक रोजगार दिया जाना है लेकिन वर्ष 2006-07 के दौरान करमौरा गांव के 547 परिवारों में से केवल एक को 100 दिनों तक रोजगार मिला। ज्यादातर परिवारों को योजना के अनुसार 100 दिन की बजाय साल में केवल 30-40 दिन का रोजगार ही मिला।

दो दशकों से सूखे की मार झेल रहे इस राज्य में सरकार द्वारा पर्याप्त मात्रा में राहत कार्य न किए जाने से स्थितियां दिन पर दिन खराब होती जा रही हैं। सरकार को चाहिए कि लोगों का पलायन रोकने के लिए यहां पर्याप्त मात्रा में रोजगार और स्वच्छ जल उपलब्ध कराने के साथ ही यहां के निवासियों को जल संरक्षण की तकनीक से भी परिचित कराए।

(सुमिका राजपूत सिंबायोसिस संचार संस्थान, पुणे की छात्रा हैं और विकास संवाद भोपाल के साथ मिलकर मध्यप्रदेश में सूखे पर प्रशिक्षु के रूप में कार्य कर रही हैं।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

तालाबों ने किया सिंगारी गांव का कायाकल्प

सुधीर पाल

उन्हें नहीं पता कि देशभर की नदियों को जोड़ने की योजना बनाई जा चुकी है। इस योजना से होने वाले नफा-नुकसान से भी उनका कोई सरोकार नहीं है। उनके पास तो नदियां हैं ही नहीं, बस तालाब हैं और वे इसे ही जोड़ने की योजना पर काम कर रहे हैं। तालाबों को जोड़ने के लिए उनके पास श्रम की पूंजी है और नतीजे के रूप से चारों ओर लहलहाती फसल। यही वजह है कि झारखंड के इस गांव में अब कोई प्यासा नहीं है। इस गांव के तालाब अब सूखते नहीं और फसलों की पैदावार ऐसी होती है कि लोगों के जीवन में खुशहाली आ गई। ग्रामीण किसान मजदूर विकास समिति के अधयक्ष एतवा बेदिया कहते हैं कि चार तालाब और बन जाएं तो लोग सौ फीसदी खुश हो जाएंगे।

दरअसल रांची जिले के अनगड़ा प्रखंड के टाटी पंचायत के सिंगारी गांव के लोगों को ऐसा मंत्र मिल गया है जिसकी बदौलत उन्होंने अपने गांव की किस्मत ही बदल दी है। करीब दो हजार की आबादी वाले इस गांव में 18 तालाब हैं और इसे तालाबों वाले गांव के नाम से जाना जाता है। लेकिन 1978 से पहले यहां के हालात कुछ और थे। गांव में तालाब तो थे लेकिन वे केवल बरसात में ही भर पाते थे। इन तालाबों का पानी सालभर की फसल और सिंचाई के लिए पर्याप्त नहीं था। पानी की कमी के चलते लोग असम, कलकत्ताा और धनबाद के ईंट भट्ठों और चाय बगानों में काम करने जाते थे। हालांकि वे बरसात से पहले वापस लौट आते, पर ज्यादा से ज्यादा 15 जनवरी तक ही अपने गांव में रह पाते। हर साल लगने वाले टुसू मेले के बाद गांव में वीरानी छा जाती थी। एक जानकारी के अनुसार गांव में सिर्पफ 12 परिवार ही रह जाते थे, जिनका किसी न किसी मजबूरी के चलते गांव से बाहर निकलना मुश्किल था।

हर साल हो रहे पलायन से गांव के बड़े-बुर्जुगों को गांव में सामाजिक असंतुलन पैदा होने का डर हो गया। लेकिन यह भी हकीकत थी कि बिना पानी के कोई भी गांव में रफककर अपने परिवार वालों को भूखे रखने का खतरा नहीं उठाना चाहता था। गांव में सामूहिक बैठक में इस पर विचार किया गया कि यदि वर्षा के पानी को रोका जाए और पानी का बैंक बनाया जाए तभी जीने का साधन मिलेगा। अब क्या था, गांववालों को तो जैसे एक मंत्र ही मिल गया। सबने मिलकर सबसे पहले पानी के स्रोतों को ढूंढ़ने पर विचार किया।

गांव के बुजुर्गों को अच्छी तरह पता था कि पानी कहां-कहां मिल सकता था। उन्होंने मिलकर वैसी जगह तालाब खोदने का फैसला किया जहां पहले दांडी होते थे। दांडी सदियों पुराने पानी के वे स्रोत थे जिनमें साल भर पानी हुआ करता था। पहले सिंगारी के हर टोले में एक दांडी हुआ करता था, लेकिन धीरे-धीरे ये दांडी भी खत्म होने लगे थे।

तालाब खोदने में हजारों रपए खर्च होने थे और गरीब गांववालों के लिए यह मुमकिन नहीं था कि वे इतने रफपयों का इंतजाम कर पाएं। लिहाजा बुजुर्गों की सलाह पर गांव के हर व्यक्ति ने तालाब खोदने में श्रमदान किया। इस दौरान वे लोग भी लौटकर अपने गांव आ गए थे जो रोजगार के चलते किसी न किसी शहर में चले गए थे। सिंगारी में पिछले एक दशक में कई विकास कार्य हुए हैं और इतना सब कुछ इसलिए हो पाया क्योंकि गांव वालों ने सरकारी कार्यों और योजनाओं को अपना ही समझा। सरकार की सभी योजनाएं गांव में लागू तो हुईं लेकिन उसके रखरखाव और प्रबंधन की जिम्मेदारी गांव वालों ने अपने हाथ में ही रखी। यही वजह है कि गांव में आज 68 कुंए, 22 हैंडपंप और 18 तालाब हैं और सभी ठीक-ठाक हालत में हैं।
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