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गांवों में सूखती, सिकुड़ती जमीन

(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। शहर वालों जैसे क्यों नहीं रह पाते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। इसी ठहराव-बदलाव का मैं एक बड़ा चित्र खींचने की कोशिश कर रहा हूं। इसी श्रृंखला की ये पांचवी कड़ी। इस कड़ी में गांवों में सिकुड़ती, सूखती जमीन और इसकी वजहों की चर्चा। अच्छी बात ये कि बरबादी के बाद थोड़ी उम्मीद की रोशनी भी दिख रही है।)गांवों से लोग शहरों की तरफ बेतहाशा भाग रहे हैं फिर भी जमीन सिकुड़ती जा रही है। जमीन सिकुड़ती जा रही है यानी जोत का आकार छोटा होता जा रहा है। और, उस पर भी काम करने वाले लोग नहीं मिल रहे हैं। मेरे गांव के आसपास काफी उपजाऊ जमीन है। लेकिन, प्रतापगढ़ के ज्यादा इलाकों में ऊसर (बंजर) जमीन ज्यादा है। और, जिस तरह से जमीन के नीचे का जलस्तर तेजी से और नीचे जा रहा है। वो, भयावह स्थिति बना रहा है।

जलस्तर लगातार घटने के लिए ज्यादातर गांव के लोग ही जिम्मेदार हैं। पानी घटा तो, शहरों से जाकर गावों में जल संरक्षण की बात हो रही है, आंदोलन चल रहे हैं। एनजीओ संगठित तरीके से काम कर रहे हैं। जब पानी ही पानी था तो, जल का अपमान किस तरह हुआ इसका बेहतरीन उदाहरण मैंने देखा है। शायद ये हर किसी को अपने गांव की कहानी लगे। मेरे गांव में तीन कुएं थे। और, गांव के अगल-बगल तीन तालाब थे। एक मेरे घर के सामने की चकरोड के पार और दो गांव के पिछले हिस्से में। तीन कुओं में से एक मेरे दरवाजे पर ही था। लेकिन, पता नहीं कौन से बंटवारे के लिहाज से पूरी जमीन तो हमारी थी लेकिन, हमरे दुआरे का कुआं सुकुलजी क रहा। औ, सुकुलजी का घर हमारे घर के पीछे है। अब सुकुलजी न तो उस कुएं से कभी पानी भरने आते थे और कुआं कच्चा होने की वजह से न तो हम लोग ही उस कुएं का इस्तेमाल करते।

पता नहीं क्या वजह थी मैंने एकाध बार पिताजी से पूछा- ये कुआं हम्हीं लोग क्यों नहीं बनवा लेते। पता चला सुकुलजी को ऐतराज है। खैर, शायद हमारे घर वाले भी यही चाहते थे और, कच्चा कुआं धीरे-धीरे भंठ गया (कुआं रह ही नहीं गया)। बचा-खुचा कुआं, कुएं के आगे की हमारी बैठकी की मिट्टी से पट गया। हमारा घर पहले ही पक्का था। मिट्टी-गारे से बनी दोनों बैठकी भी धीरे-धीरे करके खत्म हो गई। दूसरी बैठकी की ही जगह पर दादा ने नया पक्का घर बनवाया है। अच्छे कमरे बने हैं। शहरातू लैट्रिन भी बन गई है। हैंडपंप घर के अंदर लग गया है (पहले हैंडपंप बाहर था। कोई बी प्यासा राहगीर दो हाथ चलाकर अपनी प्यास बुझा लेता था)। टुल्लू लगा है जो, लाइट रहने पर टंकी भर देता है और लैट्रिन का दरवाजा बंद करने पर नल से गिरता पानी शहर में होने का अहसास दिलाता है। पहले सुबह जल्दी उठकर खेत में दिशा-मैदान जाना शहर वालों को अचरज में डालता था। अब गांव वाले भी दिशा-मैदान नहीं जाते। लैट्रिन जाते हैं। दिशा-मैदान अब तो पता नहीं कितने लोग ही समझते होंगे।

कच्ची बैठकी-कुएं क साथ दुआरे प खड़ा महुआ औ मदीना क पेडौ समय क भेंट चढ़ि ग। महुआ सूखि ग तो, दूसर लगावा नाहीं ग। औ, पिताजी-दादाजी म बंटवारा के बाद मदीना क पेड़ कटवाए दीन ग। दूसरी कच्ची बैठकी में सिर्फ दो बहुत लंबे-लंबे कमरे ( कमरे क्या बड़े से एरिया को चारों तरफ से घेरकर बीच में एक और मिट्टी की दीवार बनाई गई थी) थे। कच्ची मिट्टी के कमरे खपरैल की छत। कुल मिलाकर इस बैठकी में एक साथ 50 से कुछ ज्यादा ही चारपाई बिछ जाती थी। और, ये ज्यादातर गांव की बारात का जनवासा बन जाती थी। अब तो एक दूसरे से इतने मधुर संबंध भी नहीं रहे कि अपनी बारात रुकवाने के लिए कोई किसी दूसरे की बैठकी मांगे। अब तो, गांव में भी बरात टेंट कनात में रुक रही है।

गरमी कितनी भी हो, कच्ची बैठकी में एयरकंडीशनर जैसी ठंडक का अहसास मिलता था। और, दो महीने की गरमी की छुट्टियों में खेलकूद से फुरसत मिलने पर इसी कच्ची बैठकी में गजब की नींद आती थी। लेकिन, धीरे-धीरे गरमी की छुट्टियों में सबका जाना कम हुआ। मिट्टी-गारा की दीवार और खपरैल की छत का रखरखाव महंगा (झंझटी) लगने लगा। क्योंकि, हर साल गोबर और पिड़ोर (नदी से निकली मिट्टी) से दीवारों की पुताई करनी पड़ती थी। जिससे दीवार कमजोर न पड़े और बाहर के तापमान को संतुलित किए रहे। खपरैल भी हर दूसरी बारिश के पहले फिर से बदलवानी पड़ती थी। लेकिन, खपरा छावै वाले औ मिट्टी-गारा क देवाल बनवै वाले कम होत गएन (ज्यादातर पंजाब से लैके महाराष्ट्र तक टैक्सी, रिक्शा चलाने, फैक्ट्री में काम करने चले गए)।

घर के सामने चकरोड के पार वाले तलाव म बेसरमा क फूल (पता नहीं कितने लोग अब बेशरमा क गोदा औ ओकर फूल देके होइहैं) इतना बढ़िया खिलत रहा कि मन खुश होए जाए। 1991 में मेरी छोटी दीदी की शादी की वीडियो रिकॉर्डिंग में ये तालाब ऐसे दिख रहा था जो, किसी फिल्म में खूबूसरत लोकेशन पर हीरो-हीरोइन के गाने के लिए तैयार की जाती है। इस खूबसूरत का अहसास भी हमें अच्छे से रिकॉर्डिंग का कैसेट टीवी पर देखते ही हुआ। यही तालाब था जिसकी वजह से पांडेजी लोगों के हिस्से (पड़ान) में जाने के लिए थोड़ा घूमकर जाना पड़ता था। लेकिन, इस बार मैं गया तो, चकरोड ने तालाब का कुछ और हिस्सा लील लिया था। और बचा हिस्सा जिनके सामने तलाव रहा उनकर दुआर बनि ग।

गांव के बीच के दोनों कुएं बचे तो हैं लेकिन, उनका इस्तेमाल अब ना के बराबर होता है। रस्सी में बाल्टी बांधकर पानी बांधने से बेहतर गांवावालों को हैंडपंप चलाना लगता है। गांव के पीछे के दोनों तालाब भी सूख गए हैं। इन तालाबों में मैंने भी खूब रंगबिरंगी गुड़िया पिटी है। बांसे क कैनी से गुड़ियां पीटै म खुब मजा आवत रहा।

वैसे, अब पड़ान घूमके जाए क जरूरत नाहीं तालाब पटि ग। दुआरे प मदीना क फूल से गंदगी नाहीं होत। महुआ बिनै वालेन से झगड़ा नाही करै क परत। मिट्टी-गारा क दीवार पोतावै औ खपरा छवावै से मुक्ति मिली। सब बड़ा अच्छा होइ ग। बस गरमी कुछ बढ़ि ग। नवा हैंडपंप म पानी अब 70 मीटर नीचे मिलत बा। 10 साल पहिले तक 30 मीटर पर बढ़िया मीठा पानी मिल जात रहा।

उम्मीद की रोशनी
मैं गांव गया तो, एक निमंत्रण में दिन में ही जाकर लौटा तो, एक बाघराय बाजार से एक नहर के रास्ते जाना था। इस तरफ कुछ ज्यादा ही बंजर जमीन है। दूर-दूर तक ऊसर जमीन की सफेद मिट्टी दिखती है। लेकिन, उसके बीच-बीच में कुछ छोटे-छोटे चौकोर गड्ढे खुदे दिख रहे थे। जहां सरकारी बोर्ड लगा हुआ था। मौसी के लड़के ने जो, रहता तो, इलाहाबाद में है लेकिन, अक्सर गांव आता-जाता रहता है। उससे मैंने पूछा तो, उसने बताया कि सरकारी नियम आए ग बा। जे तलाव भंठवाए के दुआर बनै लेहे रहेन या घर बनवाए लेहे रहे उनकै घर तोड़वाए क तलाव बनावावा जात बा। और, दूसरी जगहों पर भी छोटे-छोटे गड्ढे खुदवा दिए गए हैं कि बारिश में इन तालाबों में कुछ जल संरक्षण हो जाए।
जल संरक्षण के जरिए गांव की तकदीर बदलने की एक कहानी मैंने गुजरात के एक गांव में देखी है। अब गुजरात के मुकाबले तो, यूपी के खड़ा होने में बहुत टाइम लगेगा। लेकिन, अगर ये मुहिम कुछ रंग लाई तो, फिर से मीठा पानी तो तीस मीटर पर मिल सकेगा।
http://batangad.rediffiland.com/blogs/2008/05/04/.html

जल संरक्षण की चुनौती : माइक पांडे

आज पूरे भारत में पानी की कमी पिछले 30-40 साल की तुलना में तीन गुनी हो गई है। देश की कई छोटी-छोटी नदियां सूख गई हैं या सूखने की कगार पर हैं। बड़ी-बड़ी नदियों में पानी का प्रवाह धीमा होता जा रहा है। कुएं सूखते जा रहे है। 1960 में हमारे देश में 10 लाख कुएं थे, लेकिन आज इनकी संख्या 2 करोड़ 60 लाख से 3 करोड़ के बीच है। हमारे देश के 55 से 60 फीसदी लोगों को पानी की आवश्यकता की पूर्ति भूजल द्वारा होती है, लेकिन अब भूजल की उपलब्धता को लेकर भारी कमी महसूस की जा रही है। पूरे देश में भूजल का स्तर प्रत्येक साल औसतन एक मीटर नीचे सरकता जा रहा है। नीचे सरकता भूजल का स्तर देश के लिए गंभीर चुनौती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए की आजादी के बाद कृषि उत्पादन बढ़ाने में भूजल की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इससे हमारे अनाज उत्पादन की क्षमता 50 सालों में लगातार बढ़ती गई, लेकिन आज अनाज उत्पादन की क्षमता में लगातार कमी आती जा रही है। इसकी मुख्य वजह है बिना सोचे-समझे भूजल का अंधाधुन दोहन। कई जगहों पर भूजल का इस कदर दोहन किया गया कि वहां आर्सेनिक और नमक तक निकल आया है। पंजाब के कई इलाकों में भूजल और कुएं पूरी तरह से सूख चुके है। 50 फीसदी परंपरागत कुएं और कई लाख ट्यूबवेल सुख चुके है। गुजरात में प्रत्येक वर्ष भूजल का स्तर 5 से 10 मीटर नीचे खिसक रहा है। तमिलनाडु में यह औसत 6 मीटर है। यह समस्या आंध्र प्रदेश, उत्तार प्रदेश, पंजाब और बिहार में भी है। सरकार इन समस्याओं का समाधान नदियों को जोड़कर निकालना चाहती है। इस परियोजना के तहत गंगा और ब्रह्मंापुत्र के अलावा उत्तार भारत की 14 और अन्य नदियों के बहाव को जोड़कर पानी को दक्षिण भारत पहुंचाया जाएगा, क्योंकि दक्षिण भारत की कई नदियां सूखती जा रही है।
इस परियोजना को अंजाम तक ले जाने के लिए 100 अरब डालर से लेकर 200 अरब डालर तक की आवश्यकता होगी। परियोजना के तहत लगभग 350 डैम, वाटर रिजर्व और बैराज बनाने होंगे। 12000 से लेकर 13000 किलोमीटर लंबी नहरे होगी, जिसमें प्रति सेकेंड 15 क्युबिक मीटर की गति से पानी का प्रवाह हो सकेगा। हमने लाखों साल से जमा भूजल की विरासत का अंधाधुन दोहन कर कितने ही जगहों पर इसे पूरी तरह से सुखा दिया। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जिन जगहों पर नदी के पानी को रोककर डैम, बैराज और वाटर रिजर्व बनाया जाता है वहां से आगे नदी का प्रवाह सिकुड़ने लगता है। भारत का एक तिहाई हिस्सा गंगा का बेसिन है। इसे दुनिया का सबसे अधिक उपजाऊ क्षेत्र माना जाता है, लेकिन इस नदी के ऊपर डैम बनने से यह क्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है। गंगा की लगभग 50 सहायक नदियों में पानी का प्रवाह कम हो गया है। भारत की तीन प्रमुख नदियां-गंगा ब्रह्मपुत्र और यमुना लगातार सिकुड़ती जा रही हैं। दिल्ली में यमुना के पानी में 80 फीसदी हिस्सा दूसरे शहर की गंदगी होती है। चंबल, बेतवा, नर्मदा, गोदावरी और कावेरी जैसी अन्य नदियों में भी लगातार पानी कम होता जा रहा है। इससे निपटने के लिए नदियों को आपस में जोड़ने की परियोजना की चर्चा हो रही है, लेकिन पर्यावरणविद् और वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसा करने से पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि हर नदी में लाखों तरह के जीव-जंतु रहते हैं। हर नदी का अपना एक अलग महत्व और चरित्र होता है। अगर हम उसे आपस में जोड़ देंगे तो लाजमी है कि उन नदियों में जी रहे जीव-जंतु के जीवन पर विपरीत असर पड़ेगा। हम हिमालय क्षेत्रों के पानी को दक्षिण भारत में पहुंचा देंगे तो क्या इससे पानी की गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा?
जब इस पानी को दक्षिण भारत ले जाया जाएगा तो कितने ही जंगल डूब जाएंगे। नदी जोड़ योजना की सबसे पहले बात 1972 में हुई थी, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के कारण इसे टाल दिया गया था। मेरा मानना है कि आर्थिक दृष्टि से यह योजना जायज है, पर इस योजना में बहुत सोच-समझकर कदम उठाने की आवश्यकता है, क्योंकि इससे कुदरत के चक्र को क्षति पहुंच सकती है। अगर हम अपने पूर्वजों के विरासत की ओर लौटे तो हम पानी की किल्लत को आसानी से पूरा कर सकते है। महाभारत में सरोवर की चर्चा है। उस जमाने में भी पानी को संचय करने की व्यवस्था थी। हमारे गांवों में तालाब-पोखर आज भी हैं। दिल्ली जैसे शहर में सैकड़ों तालाब थे। उसमें पानी जमा होता था और वहां से धीरे-धीरे रिस-रिस कर भूजल के स्तर को बनाए रखता था। हमने विकास की अंधी दौड़ में पोखरों को नष्ट कर मकान बना दिए, खेत बना दिए और उद्योग लगा दिए। दूसरी ओर भूजल का लगातार दोहन करते रहे। नतीजा आज हमारे सामने है। हम अपने पूर्वजों की जीवन शैली का अनुकरण जरूर करते है, लेकिन उनकी सोच को लेकर हम अनभिज्ञ है। हम सुबह-सुबह नहाकर सूर्य को जल जरूर चढ़ाते है, लेकिन इसके पीछे जो सोच है उसे समझने की कोशिश नहीं करते। वैदिक युग में सूर्य को जल चढ़ाते हुए प्रार्थना की जाती थी कि हे सूर्य भगवान, मैं आभारी हूं कि मुझ पर ऊर्जा, हवा और पानी की कृपा हुई। मैं आप तीनों का आदर करता हूं।
विडंबना यह है कि आज हम हवा और पानी को लेकर संवेदनशील नहीं हैं। हमारी हवा और पानी प्रदूषित हो चुका है। हमें यह सोचना चाहिए कि हम कैसी प्रगति की ओर बढ़ते जा रहे है? हमें यह नहीं भूलना चाहिए जब हम नदियों को आपस में जोड़ेंगे तो एक नदी का जहरीला पानी दूसरी नदी में भी जाएगा। ऐसा भी हो सकता है कि कोई नदी सूख जाए। बेहतर हो कि इन्हीं पैसों को खर्च कर परंपरागत स्त्रोतों को फिर से जिंदा किया जाए। जल संरक्षण में पेड़ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पेड़ों के कारण जमीन में नमी बरकरार रहती है। क्या यह सही नहीं होगा कि नदियों को आपस में जोड़ने के अलावा दूसरे विकल्प तलाशे जाएं? जरूरत तो सिर्फ इच्छाशक्ति की है।
[माइक पांडे, लेखक जाने-माने पर्यावरण विद् हैं]
साभार - http://in.jagran.yahoo.com/news/opinion/general/6_3_4170413.html

वर्तमान में जल संरक्षण आवश्यक : डीएम

गाजियाबाद, जिलाधिकारी अजय कुमार शुक्ला ने कहा कि मानव जाति के बने रहने के लिए जल आवश्यक है। उन्होंने कहा कि एक तरफ तेजी से बढ़ रहे औद्योगिकीकरण से जल प्रदूषित हो रहा है वहीं दूसरी तरफ वातावरण गर्म होने के कारण बरसात भी कम हो रही है। यदि आज ही शहर से लेकर गांव तक जल संरक्षण अभियान नहीं चलाया गया तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है। श्री शुक्ला भूगर्भ जल दिवस पर आयोजित गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने कहा कि गाजियाबाद जिला गंगा-जमुना के मध्य में होने, नहरों के बावजूद जमीरी पानी का स्तर लगातार गिर रहा है। इससे स्थिति गंभीर हो रही है। जिले की सामान्य वर्षा 648.65 मिमी तथा बगैर मानसून की वर्षा 105.20 मिमी वार्षिक है। जिले में कुल 98154.45 हे.मी भूगर्भ जल उपलब्ध है जिसमें से 71903.36 हे.मी. भूजल का सिंचाई के लिए दोहन होता है। जिलाधिकारी ने कहा कि घरेलू और औद्योगिक उपयोग के लिए 25 वर्ष बाद 50128.68 हे.मी. भूजल की आवश्यकता होगी जबकि वर्तमान आवश्यकता 30808.29 हे.मी. है। 25 वर्ष बाद कुल 26251.09 हे.मी. जल सिंचाई के लिए मिल पाएगा। उन्होंने बताया कि जिले के आठ ब्लाकों में से लोनी व हापुड़ अभी सेमीक्रिटिकल स्थिति में हैं, जबकि शेष छह सुरक्षित स्थिति में हैं। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लोनी व रजापुर में प्रति वर्ष 10 से 20 सेमी भूजल में गिरावट आ रही है। अजय कुमार शुक्ला ने कहा कि जिले में सभी हैंडपंपों के सोख्ते बनाए जाएं, नहरों के आसपास के तालाबों को भरा जाए, सरकारी और गैर सरकारी 200 वर्ग मीटर वाले भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाये जाएं। इसका उल्लंघन करने वालों को दंडित किया जाए। उन्होंने जीडीए व नगर निगम को इस संबंध में अपने दायित्वों का निर्वहन करने को कहा। जिला विकास अधिकारी वाई.एन. उपाध्याय ने कहा कि जिले के सभी 1428 तालाबों का संरक्षण व पुनरुद्धार किया जा रहा है। जिला पंचायत राज अधिकारी वी.बी. सिंह ने बताया कि प्रधानों की तीन दिवसीय गोष्ठी में जल संरक्षण का प्रशिक्षण दिया जाएगा। गोष्ठी में क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी के साथ ही जल निगम, लोनिवि, विद्युत विभाग के अधिकारी भी उपस्थित थे।
साभार - http://a2zghaziabad.blogspot.com/

कहीं तीसरे विश्व युद्ध का कारण न बन जाए पानी

नई दिल्ली। आठ अगस्त को दक्षिण दिल्ली के एक रिहायशी इलाके में 24 घंटे से पेयजल आपूर्ति बाधित रहने के कारण हाहाकार मचा हुआ था। यह तो सिर्फ एक दिन की बात थी, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं यह दस्तक है आने वाले कल की, जब पानी तीसरे विश्व युद्ध का कारण बनेगा।
इस इलाके के ठीक पीछे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पानी की समस्या का हल प्रो. सौमित्र चटर्जी ने सुदूर संवेदन तकनीक के जरिए निकाला है।

विशेषज्ञों ने इस तकनीक के बारे में बताया कि किसी वस्तु या परिवर्तन का बिना उसके संपर्क में आए उपग्रह के माध्यम से अध्ययन किया जाता है। उपग्रह से मिले चित्र खुलासा कर देते हैं कि किस इलाके में जमीन कैसी है और उसकी अंदरूनी संरचना कैसी है। कहां पानी बचाया जा सकता है और किस हिस्से में पानी रह सकता है। इसके बाद चैकडेम बनाए जाते हैं।

नई दिल्ली और राजस्थान में इस तकनीक का प्रयोग हो चुका है। जल योद्धा हरदेव सिंह जडेजा के अनुसार यह तकनीक जल संरक्षण में काफी उपयोग में लाई जा रही है। राजस्थान, गुजरात का सौराष्ट्र, आंध्र का रायल सीमा, महाराष्ट्र का मराठवाड़ा, मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड और कर्नाटक के कुर्ग जैसे क्षेत्रों के लिए यह तकनीक बहुत उपयोगी साबित हो सकती है। यह वे इलाके हैं जहां तीन साल में एक बार अल्प वर्षा और चार साल में एक बार अति वर्षा होती है फिर भी यह इलाके पेयजल की किल्लत झेलते हैं।

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ आधिकारिक तौर पर पहला राज्य है जहां प्रमुख नदी शिवनाथ का 23.5 किमी का हिस्सा बीस साल के लिए रेडियस वाटर लिमिटेड के हवाले कर दिया गया। छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष एवं पूर्व विधायक जनक लाल ठाकुर के अनुसार यह तो वैश्वीकरण की हद हो गई। पानी के निजीकरण के मुद्दे पर वह कहते हैं, यह महज पानी का नहीं, बल्कि सरकार की नीयत में खोट आने का मामला है। अब लोगों को जागरूक होना होगा। पुराने बांध जहां खेती के लिए होते थे वहीं नए बांध महज औद्योगिक विकास के काम आ रहे हैं।

राजस्थान के अलवर में जल-क्रांति लाने में लगे तरुण भारत संघ के राजेंद्र सिंह यानी वाटरमैन जागरूकता लाने के प्रयासों में लगे हैं। मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सिंह अपनी सफलता का श्रेय उस देशज ज्ञान और पारंपरिक समझ को देते हैं जो समय की कसौटी पर खरी साबित हुई। आज उनके बनाए जोहड़ों ने रेगिस्तान में तब्दील हो रहे अलवर को हराभरा कर दिया।

सरकार नौकरशाही और वैज्ञानिकों का एक बड़ा हिस्सा भले ही इस पारंपरिक ज्ञान को अव्यवहारिक मानता है, लेकिन प्रेमजी भाई पटेल, श्याम जी भाई, पूना भाई जैसे जल दूत विभिन्न इलाकों में मौन क्रांति लाने में लगे हुए हैं।

श्याम जी भाई अंटाला पिछले दो दशकों में तीन लाख से ज्यादा कुएं रिचार्ज (पुनर्भरण) कर चुके हैं। वह कहते हैं कि सौराष्ट्र में 1964, 1972, 1985, 1986 एवं 1987 में सूखा पड़ा, लेकिन 1988 में भारी बारिश हुई और लोगों ने सोचा कि कुएं में पानी भर लेना चाहिए।

वह मानते हैं कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा। इससे बचना है तो बुजुर्गों के उन अनुभवों का लाभ उठाना चाहिए जो चैकडेम, पोखर, तालाब और कुएं के जरिए जलापूर्ति में काम आ रहे थे।

हम शायद यह भूल गए कि इस देश में कुएं पूजन की परंपरा है और हमने कुएं और जल स्रोतों को खराब करना शुरू कर दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि एक घर के ऊपर जितना पानी गिरता है। वह उस परिवार की वार्षिक जरूरत से पांच गुना तक अधिक होता है। छत के पानी को बटोर कर आसानी से साल भर के पेयजल की व्यवस्था हो सकती है।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि पेय जलापूर्ति से निपटने और बढ़ती आबादी के बीच संतुलन बिठाने के लिए विकसित राष्ट्रों की तर्ज पर पेयजल के संबंधित विभागों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने पर विचार करते हुए संवैधानिक शक्तियां प्रदान करनी होगी। साथ ही राज्यों में पेयजल के वितरण और प्रबंधन के लिए सरकारी योजनाओं में जन भागीदारी को प्राथमिकता देनी होगी।

हर वर्ष बेकार हो रहा 36 अरब घन मीटर पानी

नई दिल्ली (एजेंसी)। देश में हर वर्ष 36 अरब घन मीटर पानी बेकार बह जाता है, जिसका उपयोग भूजल कृत्रिम पुनर्भरण के लिए किया जा सकता है। यह अनुमान जल संसाधन मंत्रालय के केंद्रीय भूजल बोर्ड ने देश में भूजल के कृत्रिम पुनर्भरण के लिए मास्टर प्लान नाम से एक अवधारणा रिपोर्ट में व्यक्त किया गया है।
जल संसाधन मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार इस रिपोर्ट में भूजल भंडारों के कृत्रिम पुनर्भरण के लिये प्राथमिकता के आधार पर उन क्षेत्रों की पहचान की गई है, जहां इस योजना को अमल में लाकर पानी की कमी की समस्याओं को दूर किया जा सकता है। इस काम के लिए देश में 4 48760 वर्ग किलोमीटर ऐसी भूमि चिन्हित की गई है, जहां भूजल के कृत्रिम पुनर्भरण की आवश्यकता है।
प्रवक्ता ने बताया कि रिपोर्ट में यह अनुमान व्यक्त किया गया है कि हर वर्ष 36453 मिलीयन घन मीटर पानी बेकार बह जाता है जिसका उपयोग भूजल कृत्रिम पुनर्भरण के लिए किया जा सकता है। इस मास्टर प्लान के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में 19880 करोड़ रूपए की लागत से कृत्रिम पुनर्भरण के 2.25 लाख ढांचों का निर्माण किया जाएगा। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पूर्वोत्तर राज्यों और सिक्किम में जल स्रोतों को विकसित किये जाने पर जोर दिया जाएगा। इसमें 2700 जल स्रोतों को विकसित और उन्हें सुदृढ करने का भी प्रस्ताव है। रिपोर्ट में शहरी क्षेत्रों में भूजल संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। भवनों की छतों पर गिरने वाले वर्षा जल संचयन का भी प्रस्ताव है।
इसके लिए जल को या तो सीधे जमीन के अंदर पहुंचाया जायेगा या फिर इसे विशेष बैंकों में एकत्र किया जाएगा। रिपोर्ट में यह भी अनुमान व्यक्त किया गया है कि देश में भवनों की छतों पर वर्षा जल संचय के 37 लाख ढांचों का निर्माण किया जा सकता है। इसकी अनुमानित लागत लगभग 4590 करोड़ रूपए होगी। वैसे इस मास्टर प्लान की कुल लागत 245 करोड़ रूपए है और इसका कार्यान्वयन चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा।

पानी पर नहीं मिलेगी सब्सिडी

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आज कहा कि पानी के व्यावसायिक और वाणिज्यिक इस्तेमाल के लिए सब्सिडी जारी नहीं रख सकेंगे। किसानों को निशुल्क बिजली दिए जाने की नीति से पम्प सेटों के ज्यादा इस्तेमाल को भी भूमिगत पानी के दोहन के लिए जिम्मेदार बताया।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राष्ट्रीय भूमि जल अधिवेशन 2007 में बोल रहे थे। अधिवेशन में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने जल प्रदूषण पर चिंता जताते हुए कहा कि जल संरक्षण के काम को एक आंदोलन के रूप में जनता को जोडना चाहिये। राष्ट्रीय जल संरक्षण एवं भूमि जल संवर्दन पुरस्कार दिए गए। क्रषि मंत्री शरद पवार, जल संसाधन मंत्री सैफुद्दीन सोज, राज्य मंत्री जय प्रकाश यादव मौजूद थे।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि उचित प्रोत्साहन और जुर्माना लगाकर जल संरक्षण प्रबंधन को बेहतर बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि कारोबारी जल के लिए निरंतर सब्सिडी जारी नहीं रख सकते इससे जुडी नीतियों में बदलाव आना चाहिए जिससे भविष्य के लिए जल संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके। उन्होंने समतामूलक कुशल और पर्यावरणीय तौर पर स्थाई जल नीति पर आम सहमति बनाने की आवश्यकता जताई। मनमोहन सिंह ने जलवायु परिर्वतन और धरती का तापमान बढ़ने के खतरे का एहसास कराते हुए कहा कि देश में जलापूर्ति के लिए हम काफी हद तक हिमनद पर निर्भर है।
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने आह्वान किया कि एक-एक बूंद पानी के बचाव को एक आंदोलन के रूप में लेना चाहिए उन्होंने राज्य सरकारों को जल संरक्षण को एक चुनौती के रूप में लेने की बात कही। जल संसाधन मंत्री सैफुद्दीन सोज ने कृत्रिम पुनर्भरण के जरिये भूजल वृद्धि को विकल्प बताते हुए कहा कि डग वेल रिचार्ज की स्कीम बना रहे हैं। इस मौके पर राष्ट्रीय जल पुरस्कार महाराष्ट्र के अहमद नगर की हिवारे पंचायत को दिया गया। 14 भूमि जल संवर्धन पुरस्कार विभिन्न संस्थाओं और पंचायतों को दिए गए।
- सहारा न्यूज ब्यूरो

जल संरक्षण कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह का बिहार को बाढ़ से बचने का मंत्र

पटना, जल संरक्षण कार्यकर्ता और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेन्द्र सिंह का मानना है कि अगर बिहार एक संतुलित विकेन्द्रीकत जल प्रबंधन व्यवस्था अपनाए तो महज तीन वर्षों में ही बिहार को बाढ़ से छुटकारा मिल सकता है।

उन्होंने आईएएनएस से बातचीत करते हुए कहा कि बिहार को बाढ़ से मुक्ति दिलाने के लिए विकेन्द्रीकृत जल प्रबंधन व्यवस्था की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बिहार में हर साल बाढ़ से भारी तबाही होती है। इस साल मानसून में बिहार में बाढ़ से 650 से अधिक लोगों की मौत हुई और 2.1 करोड़ लोग प्रभावित हुए। इस प्राकृतिक आपदा से नेशनल हाईवे, बांधों और सड़कों को भारी नुकसान पहुंचा। बाढ़ से 8.28 अरब रुपये की खड़ी फसल को भी भारी नुकसान पहुंचा वहीं 521,441 घर क्षतिग्रस्त हो गए। उन्होंने कहा कि यह बिहार सरकार को निर्णय लेना है कि वह इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए किफायती दीर्घकालीन मॉडल पर अमल करेगी या अस्थायी तौर पर ऊंची लागत वाले मॉडल पर अमल करेगी।

उन्होंने कहा कि बिहार को बाढ़ से मुक्ति दिलाने के लिए खास रणनीति बनानी होगी। उन्होंने कहा कि छोटे छोटे बांध, जलाशय आदि बनाकर राज्य में पानी का बेहतरीन प्रबंधन किया जा सकता है और बाढ़ से बचा जा सकता है। ऐसी छोटी परियोजनाओं के लिए सिंचाई एवं जल प्रबंधन परियोजनाओं से फंड की व्यवस्था की जा सकती है। उन्होंने कहा कि केंद्रीकृत जल प्रबंधन व्यवस्था से सिंचाई समस्या भी दूर होगी। उन्होंने कहा कि बड़े बांधों के निर्माण से बिहार की इस समस्या का समाधान नहीं निकलेगा। वैसे, बिहार सरकार के दिमाग में दूसरी ही योजनाएं घुमड़ रही हैं। बिहार सरकार ने नदी तटबंधों व बांधों में दरार रोकने के लिए एक अमेरिकी तकनीकी का इस्तेमाल करने का फैसला किया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

कम होता पानी

देश में उपलब्ध पानी की मात्रा और कुल जल आवश्यकता के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति उतनी भयावह नही लगती जितनी प्रचारित की जाती है। केन्द्रीय जल आयोग और समेकित जल संसाधन विकास योजना के राष्ट्रीय आयोग का निष्कर्ष है कि देश में हर वर्ष हिमपात व वर्षा के रूप में चार हजार अरब घनमीटर पानी बरसता है जिसमें से 3600 अरब घनमीटर पानी जून से सितंबर तक मानसून के तीन महीनों में ही बरस जाता है। जल आयोग का मानना है कि शेष पानी में से 1140 अरब घनमीटर सतही और भूजल उपयोग में लाया जा सकता है।

2025 की जनसंख्या, सिंचाई और औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए 1050 अरब घनमीटर यानि कुल उपयोगी जल का 92 प्रतिशत उपयोग में लाना होगा। विशाल जलराशि उपलब्ध होने के बावजूद पानी के लिए मारामारी का जो कारण समझ में आता है वह देश की भौगोलिक विविधता, जल दोहन और प्रबंधन की वर्तमान नीतियों का परिणाम लगता है। जल आवश्यकताओं की पूर्ति की राह में सबसे बड़ी बाधा देश का विविध भौगोलिक स्वरूप है जिसमें पानी की उपलब्धता एक समान नहीं है। ब्रह्मपुत्र घाटी में पानी की उपलब्धता जहां 18400 घनमीटर प्रति व्यक्ति है वहीं तमिलनाडु के कुछ क्षेत्रों में यह मात्र 380 घनमीटर प्रति व्यक्ति है। चेरापूंजी में वर्षा का औसत 10 हजार मिलीमीटर है जबकि देश का एक तिहाई हिस्सा हमेशा सूखे की चपेट में रहता है। देश में जल प्रबंधन के लिए बांध निर्माण को सबसे लोकप्रिय तकनीक के रूप में अपनाया गया है। अब तक निर्मित किये जा चुके 4200 छोटे-बड़े बांधों में कुल 178 अरब घनमीटर पानी एकत्र किया जा रहा है। 75 अरब घनमीटर जल संग्रह करने की परियोजनायें निर्माणाधीन हैं। पेयजल के अलावा तेजी से बढ़ी बिजली, सिंचाई और औद्योगिक जरूरतों ने सरकार को बांधों के रास्ते पर चलने को प्रेरित किया। लेकिन पुनर्वास, पर्यावरण-लाभ और लागत विषयों पर गंभीरता न दिखाये जाने के कारण बांधों का निर्माण विवाद का विषय वन गया। नर्मदा और टिहरी के बांध विरोधी आंदोलनों ने इन विषयों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने में मुख्य भूमिका निभाई है। अंतरघाटी जल परियोजना दीर्घकालीन समाधान का रास्ता हो सकता है लेकिन एक तो यह राजनैतिक सर्वानुमति प्राप्त नहीं कर पा रहा है और बांधों के निर्माण में छले गये लोग इस परियोजना को सामान्य गरीब व वनवासियों को उजाड़ने तथा पर्यावरण विनाश के रूप में देख रहे हैं।

जल संकट से निपटने का एक और रास्ता जल संरक्षण की परंपरागत विधियों को पुनजीर्वित करने व वर्षा जल संग्रह का है, जिसमें व्यापक संभावनाएं हैं। जल अभियंताओं और नीति निर्यताओं को भले ही यह तत्काल परिणाम देने वाली न दिखाई देती हो लेकिन जल संकट के दीर्घकालीन व निर्विवाद समाधान की गुंजाइश इसी रास्ते से प्राप्त की जा सकती है। अध्ययन बताते हैं कि देश में बरसने वाले जल का 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा सीधे समुद्र में समा जाता है। विश्व बांध आयोग की एक रपट बताती है कि आजादी से पहले जब जल प्रबंधन में सरकारी हस्तक्षेप नगण्य था, वर्षा का केवल 65 प्रतिशत समुद्र तक पहुंचता था। शेष पानी लोग तालाब, कुएं, कच्ची नहरें बनाकर रोक लेते थे। लेकिन अब जबकि पानी पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में है 85 प्रतिशत पानी समुद्र में चला जाता है। आजादी के बाद बांधों से निकाली गई बड़ी-बड़ी नहरों ने किसानों और ग्रामीणों को परंपरागत पद्धतियों से हटा दिया गया। शहरीकरण के कारण लाखों तालाब पाट दिये गये। कुएं सूख गए और जल संरक्षण का परंपरागत ज्ञान समाप्त होने लगा। जल संकट का सामना करने के लिए 2002 की राष्ट्रीय जलनीति में सरकार ने जल संरक्षण की परंपरागत विधाओं की ओर लौटने की सहमति दी है। पुराने तालाबों को पुनर्जीवित करने और नये तालाब खुदवाने की योजनायें चल रही हैं। नदियां भूजल का पर्याप्त संभरण कर सकें। इसके लिए परियोजनाएं बन रही हैं। वर्षा जल संरक्षण के लिए जरूरी उपाय किये जा रहे हैं। गैर सरकारी विशेषज्ञ योजनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण कर समर्थन व विरोध करके सरकार पर दबाव बना रहे हैं।
दून दर्पण (देहरादून), 27 May, 2006

पानी का प्रबंधन

यह चेतावनी भी अब पुरानी पड़ गई है कि चौथा विश्व युद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा। विश्वयुद्ध तो दूर की बात है, क्या हम घर-घर, गांव-गांव में लड़ी जा रही पानी की लड़ाई के प्रति तनिक भी गंभीर हैं? आज भी देश के लगभग आधे गांवों में या तो पानी की घोर किल्लत है या वहां पानी अशुद्ध है। उत्तर भारत की स्थिति और भी दयनीय है। लेकिन हमारे नीति नियंता हैं कि उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। सिर्फ गरमी के मौसम में वे निद्रा से जागते हैं और कुछ आश्वासन देकर फिर अगली गरमियों तक सो जाते हैं। चूंकि पानी की समस्या सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं है, इसलिए संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन पानी को लेकर लगातार आगाह कराते रहते हैं।

संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि वर्ष 2027 तक 250 करोड़ लोगों को बमुश्किल पानी उपलब्ध हो पाएगा। आंकड़े बताते हैं कि आज भी 110 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं हैं। यह कहने की जरूरत नहीं है कि इनमें अधिसंख्य भारतीय ग्रामवासी है। कहने को तो दुनिया का दो तिहाई हिस्सा पानी से घिरा है, लेकिन उसमें से सिर्फ ढाई फीसदी पानी ही खारा नहीं है। यह ढाई फीसदी मीठा पानी भी पहाड़ों की ऊंची चोटियों में बर्फ के रूप में या नदियों और झीलों के पानी के रूप में है। जैसे-जैसे दुनिया की आबादी बढ़ रही है, वैसे-वैसे पानी की जरूरत भी बढ़ रही है। अनुमान है कि वर्ष 2020 तक हमें 17 फीसदी ज्यादा पानी की दरकार होगी। बावजूद इसके दुनिया के जल प्रबंधकों का मानना है कि यदि उपलब्ध जल का ही सही संरक्षण किया जाए और उसका वितरण संतुलित हो, तो हम भावी चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में जल संरक्षण की बातें फैशन के तौर पर हो रही है, लेकिन अभी भी हम इस काम के प्रति गंभीर नहीं है। यूरोपीय देशों ने पानी की किल्लत को देखते हुए पहले से कुछ उपाय कर लिए हैं, लेकिन भारत जैसे विकासशील देशों में नियोजन के स्तर पर अभी जागरूकता आनी बाकी है।

हमारे यहां सरकार से पहले स्वयंसेवी क्षेत्र ने इस संबंध में सोचना शुरू किया। सरकारें उनका अनुसरण कर रही हैं। दुर्भाग्य इस बात का है कि हमारे नीति नियोजकों के पास कोई समेकित दृष्टि नहीं है। यदि कोई एक योजना कहीं सफल हो जाती है, तो वे उसी के पीछे पड़ जाते हैं। मसलन पिछले दिनों वाटर हारवेस्टिंग का फैशन-सा चल पड़ा। लेकिन भारत में केवल वाटर हारवेस्टिंग से समस्या हल नहीं हो सकती। इसके साथ ही साथ, हमें जंगल बचाने, नहर बनाने, छोटे बांध बनाने और कुएं रिचार्ज करने जैसे उपाय भी करने होंगे और सबसे बड़ी बात, हमें प्रकृति का दोहन कम करना होगा। जिस देश की संस्कृति में प्रकृति के कण-कण की पूजा का विधान हो, वहां किसी और देश की तरफ ताकने की जरूरत ही नहीं बचती, क्योंकि यह सारा झगड़ा प्रकृति से छेड़छाड़ और आसमान वितरण का है। जब तक हम प्रकृति के मर्म को नहीं समझेंगे, तब तक कैसे किसी समाधान तक पहुंच सकते हैं?
अमर उजाला (देहरादून), 16 May, 2006

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