राष्ट्रीय. भूजल दोहन दो अंतिम

जल संसाधन मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि हालांकि भूजल की बहुत कमी वाले .डार्क एरिया. के रुप में वर्गीकृत क्षेत्र कुल ब्लाकों की संख्या की तुलना में काफी कम है1 लेकिन कृष िअर्थशास्त्र तथा नीतिगत अनुसंधान केन्द्र द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार 1980 के मध्य से लेकर 1990 के मध्य तक डार्क अथवा ..क्रिटिकल ब्लाकों.. की संख्या में प्रतिवर्ष 5.5 प्रतिशत की दर से वृध्दि हुई1 यदि वृदि्ध की यही दर बनी रहती है तो भी दो दशकों के अंदर देश के एक तिहाई ब्लाक डार्क ब्लाक श्रेणी में शामिल हो जायेंगे1 वर्ष 1995 में 50 प्रतिशत डार्क ब्लाक गुजरात. हरियाणा. पंजाब. तमिलनाडु. कर्नाटक और राजस्थान में स्थित थे

1960 से सघन खेती की वजह से भूजल का इतना ज्यादा दोहन हुआ है कि गुजरात के मेहसाणा जैसे क्षेत्रों तथा हरियाणा और पंजाब के कुछ भागों में किसानों द्वारा 500 मीटर तक की गहराई के ट्यूबवेल लगाना एक आम बात हो गयी है

प्रवक्ता ने कहा कि सिंचाई में भूजल का इस्तेमाल छोटे छोटे किसानों की मजबूरी है लेकिन जल प्रबंधकों के लिये भूजल की स्थायी उपलब्धता सुनिश्चित करना एक विराट चुनौती बनता जारहा है1 देश के कई हिस्सों खासकर शहरी हिस्सों में भूजल के स्तर में अत्यंत गिरावट एक प्रमुख समस्या बनती जा रही है1 पानी के कुल इस्तेमाल में शहरी जरुरत का हिस्सा लगभग आठ प्रतिशत है और देश के लगभग हर कस्बे और शहर के आसपास भूजल का स्तर गिर रहा है

भूजल- -इसका आकलन कैसे किया जाता है

भूजल सिंचाई का एक महत्वपूर्ण स्रोत होता है और वह देश की 50% से अधिक सिंचाई की पूर्ति करता है। खाद्यान्न उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भरता की स्थिति तक पहुंचने में पिछले तीन दशकों में भूजल सिंचाई का योगदान उल्लेखनीय रहा है। आने वाले वर्षों में सिंचित कृषि के विस्तार तथा खाद्य उत्पादन के राष्ट्रीय लक्ष्यों की पूर्ति के लिए भूजल प्रयोग में कई गुना वृद्धि होने की संभावना है। हालांकि भूजल वार्षिक आधार पर पुनःपूर्ति योग्य स्रोत है फिर भी स्थान और समय की दृष्टि से इसकी उपलब्धता असमान है। इसलिए भूजल संसाधन के विकास की योजना तैयार करने के लिए भूजल संसाधन और सिंचाई क्षमता का एकदम सही आकलन करना एक पूर्वापेक्षा है।

भूजल की प्राप्ति और संचलन पर जल भू-वैज्ञानिक, जल-वैज्ञानिक और जलवायुपरक जैसे बहुविध तत्वों का नियंत्रण रहता है। पुनःपूरण और निस्सारण का सही आकलन करना दुष्कर होता है क्योंकि उनके प्रत्यक्ष मापन के लिए फिलहाल कोई तकनीक उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए भूजल संसाधन के आकलन के लिए प्रयुक्त सभी विधियां परोक्ष हैं। क्योंकि भूजल एक गतिशील और पुनःपूर्तियोग्य संसाधन है इसलिए इसका आकलन प्रायः वार्षिक पुनःपूरण के घटक पर आधारित रहता है जिसे उपर्युक्त भूजल संरचनाओं के बल पर विकसित किया जा सकता है।

भूजल संसाधनों के परिमाणन के लिए जलधारक चट्टान, जिसे जलभृत कहते हैं के निर्माण के व्यवहार और विशेषताओं की सही जानकारी जरूरी है। एक जलभृत के दो प्रमुख कार्य होते हैं (i) पानी का संक्रमण करना (नाली का कार्य) तथा (ii) संग्रह करना (भण्डारण का कार्य)। अबाधित जलभृतों के भीतर भूजल संसाधनों को स्थिर और गतिशील के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। स्थिर संसाधनों को जलभृत के पारगम्य भाग में जल स्तर उतार-चढ़ाव के क्षेत्र के नीचे उपलब्ध भूजल की मात्रा के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। गतिशील संसाधनों को जलस्तर उतार-चढ़ाव के क्षेत्र में उपलब्ध भूजल की मात्रा के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। पुनःपूर्तियोग्य भूजल संसाधन अतिवार्यतः एक गतिशील संसाधन है जिसकी प्रतिवर्ष अथवा नियतकालिक आधार पर वर्षा, सिंचाई प्रत्यावर्ती प्रवाह, नहर रिसाव तालाब रिसाव, अन्तःस्रावी रिसाव आदि से पुनःपूर्ति होती है।

भूजल संसाधनों की गणना करने के लिए प्रयुक्त प्रविधियां आमतौर पर जल-वैज्ञानिक बजट तकनीकों पर आधारित होती है। भूजल अवस्था के लिए जल-वैज्ञानिक समीकरण जल सन्तुलन समीकरण का एक विशिष्ट रूप होता है जिसके लिए इन मदों के परिमाणन की जरूरत होती हैः भूजल जलाशय में अन्तर्वाह तथा उसमें से बहिर्वाह तथा जलाशय के भीतर मौजूद भण्डार में बदलाव। इनमें से कुछेक मदें सीधी मापी जा सकती हैं, कुछ का निर्धारण सतही जल की मापित मात्रा अथवा दरों के बीच के अन्तर के आधार पर किया जा सकता है तथा कुछ के आकलन के लिए परोक्ष विधियों की जरूरत रहती है। इन मदों का प्रतिपादन नीचे किया गया हैः

I. भूजल जलाशय को उपलब्ध कराई जाने वाली मदें

1. भूजल तल में वर्षा अन्तःस्यन्दन

2. नदी, झीलों और कुंडों से प्राकृतिक--पुनर्भरण

3. विचाराधीन क्षेत्र में भूजल अन्तर्वाह

4. सिंचाई, जलाशयों तथा कृत्रिम पुनर्भरण के लिए विशेष रूप से तैयार की गई अन्य स्कीमों से पुनर्भरण

II. भूजल जलाशय से निपटान की मदें

1. उथले भूजल तक के क्षेत्रों में केशिका, फ्रिन्ज से वाष्पीकरण तथा भूजल पोषितों और अन्य पौधों/वनस्पति द्वारा वाष्पोत्सर्जन

2. नदियों, झीलों और कुण्डों को रिसाव और वसन्तकालीन प्रवाह द्वारा प्राकृतिक निस्सारण

3. भूजल बहिर्वाह

पांच सालों में भूगर्भ के जलस्तर में आयी तेजी से गिरावट

हमीरपुर (उत्तर प्रदेश)। पिछले पांच सालों में चित्रकूट धाम मंडल में डेढ़ मीटर के भूगर्भ जलस्तर में गिरावट आयी है। सबसे अधिक जलस्तर महोबा में 1.83 मीटर गिरा है।

भूगर्भ के जलस्तर में पिछले पांच सालों में जबरदस्त गिरावट आयी है। जिसमें सबसे अधिक महोबा 1.83, चित्रकूट 1.82 मीटर जलस्तर गिरा है। जबकि हमीरपुर में 1.31 और बांदा में 1.14 मीटर जलस्तर में गिरावट आयी है। मगर पिछले 10 साल के आंकड़ों को देखा जाये, तो वे बहुत ही भयावह हैं। क्योंकि 10 साल में हमीरपुर जिले में 1.34 मीटर जलस्तर में गिरावट आयी है। जबकि अन्य जिलों में यह गिरावट आधा मीटर के आसपास रही है।

अधिशाषी अभियंता भूगर्भ जल विभाग ए एच जैदी बताते हैं कि बुंदेलखंड क्षेत्र में हरियाली क्षेत्र लगातार कम हो जा रहा है। वन की कमी और वृक्षों की मृत्युदर अधिक होने से वर्षा के घंटे और दिन कम होते जा रहे हैं। खेत का खेत पानी खेत में का संकल्प पूरा नहीं हो पा रहा है। शहरी क्षेत्रों में सीमेंट और कंकरीट का जंगल तैयार हो रहा है। शासनादेशों की मंशा के अनुसार इसे बंद होना चाहिए। हैंडपंपों के जरिए भूजल का अत्याधिक दोहन और दुरुपयोग हो रहा है। रीचार्ज पिट बनाने की जरूरत है।

बुंदेलखंड की धरती असमतल होने के कारण भूगर्भ की कम्पैक्टेड ग्रेनाइट की पर्तो के पाये जाने के कारण वर्षा के घंटे और दिन कम होते जा रहे हैं। क्योंकि भूजल की वांछित रिचार्जिग नहीं हो पा रही है। सूखे के कारण पेयजल व सिंचाई के लिए भूगर्भ जल भंडारों पर अत्यधिक दबाव बढ़ता जा रहा है। भूजल दोहन की मात्रा हर साल बढ़ रही है। इन्हीं सबका परिणाम है कि गोहांड के जिगनी और मौदहा के परछा व खंडेह में धरती फटने की घटनायें हुई। क्षेत्र में ग्राउंड वाटर की ओवर एक्प्लाइटेड कंडीशन का प्रबल संकेत है, जो चिंता का विषय है।

अधिशाषी अभियंता जैदी ने इसके लिए पांच उपाय सुझाये हैं। उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड के सातों जनपदों में एक-एक वर्षा जल केंद्र की स्थापना की जाये, ताकि सूचनायें एकत्रित कर एक छत के नीचे सेवा उपलब्ध हो सके। चेकडैम व अन्य जल संभरण के संसाधनों को बनाया जाये। भूजल की रसायनिक अशुद्धियों वाले क्षेत्र में नलकूपों का आप्टिमम यूज हो सकता है। वर्षा जल को संरक्षित, संचयन और भंडारण किया जाये।

नल सरोवर: सैलानी परिंदों की जन्नत

नल सरोवर भारत में ताजे पानी के बाकी नम भूमि क्षेत्रों से कई मायनों में भिन्न है। सरदियों में उपयुक्त मौसम, भोजन की पर्याप्तता और सुरक्षा ही इन सैलानी पक्षियों को यहां आकर्षित करती है। सरदियों में सैकडों प्रकार के लाखों स्वदेशी पक्षियों का जमावडा रहता है। इतनी बडी तादाद में पक्षियों के डेरा जमाने के बाद नल में उनकी चहचाहट से रौनक बढ जाती है।

नल में इन्हीं उडते सैलानियों की जलक्रीडाएं व स्वर लहरियों को देखने-सुनने के लिए बडी संख्या में पर्यटक यहां प्रतिदिन जुटते हैं। पर्यटकों के अतिरिक्त यहां पक्षी विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, शोधार्थी व छात्रों का भी जमावडा लगा रहता है तो कभी-कभार यहां पर लंबे समय से भटकते ऐसे पक्षी प्रेमी भी आते हैं जो किसी खास पक्षी के छायाचित्र भी उतारने की तलाश में रहते हैं।

अनूठा है नल

नम भूमि क्षेत्र नल सरोवर अपने दुर्लभ जीवन चक्र के लिए जाना जाता है जिस कारण यह एक अनूठी जैवविविधता को बचाए हुए है। नल का वातावरण अनेक प्रकार के जीव जन्तुओं के लिए उपयुक्त है और एक भोजन श्रृंखला बनाता है। मूलत: यह वर्षा जल पर आश्रित एक नम क्षेत्र है। गर्मी में जब यह सरोवर सूखने के कगार पर होता है तो मानसूनी वर्षा इस सरोवर को नई जिंदगी देती है। इसके जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा इसे लबालब कर देती है। बरसात की समाप्ति के बाद लगभग मृत प्राय: इस सरोवर में धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर लौटने लगती है। प्रारंभ में पहले इसमें सूक्ष्मजीव पैदा होते हैं उसके बाद छोटे कीट-पतंगे पैदा होते हैं या आस-पास से आकर यहां शरण लेते हैं। वातावरण की अनुकूलता के साथ आस-पास से व जमीन में बचे रह गए अंडों से कई प्रकार का जलीय जीवन तेजी से विकसित होता है। इनमें अनेक प्रकार की मछलियां उत्पन्न होने लगती हैं जिनकी संख्या तेजी से बढने लगती है। मछलियों का लालच पक्षियों को यहां आकर्षित करता है। आरंभ में यहां छोटे पक्षी ही आते हैं किन्तु जब नवंबर में मछलियां बडी हो जाती हैं तो भोजन की प्रचुरता व उचित वातावरण पाकर प्रवासी जल पक्षी भी यहां आने लगते हैं। दिसंबर व जनवरी में इनकी संख्या अधिकतम होती है।

फरवरी के अंत में नल में भोजन व जलस्तर में कमी व गर्मी के बढने के चलते मेहमान पक्षी अपने मूल घरों को लौटने लगते हैं। मार्च में जब क्षेत्र में पारा 40 डिग्री तक पहुंच जाता है तो नल के जल स्तर तेजी से कम होने लगता है। मई का अंत आते सरोवर का क्षेत्रफल पानी के सूखने से काफी कम हो जाता है। इससे उसमें मौजूद जीवन समाप्त प्राय: होने लगता है। गर्मी के बाद प्रकृति बदलती है और एक बार फिर से वही जीवन चक्र शुरू हो जाता है।

नल एक खास प्रकार की जैवविविधता को बचाये है। इस सरोवर में पिछली पक्षी गणनाएं बताती हैं कि नल में पक्षियों की संख्या साल दर साल बढ रही है। वर्ष 2002 में हुई गणना के मुताबिक यह संख्या 1.33 लाख थी। वर्ष 2004 में यह 1.84 लाख रही तो वर्ष 2006 में यह संख्या 2.52 लाख रही। वर्ष 2006 में बत्तख व हंसों की संख्या 1.19 लाख व क्रेक्स, रेहस व कूट की संख्या 82 हजार थी। इस सरोवर में प्रसिद्ध फ्लेमिंगो की संख्या 5820 आंकी गई।

कल का सागर आज का सरोवर

गुजरात के अहमदाबाद व सुंदर नगर जिलों से सटा नल सरोवर अभयारण्य अहमदाबाद से लगभग 65 किमी की दूरी पर है। सरोवर क्षेत्र में छोटे-बडे कुल 300 तक टापू हैं जिनमें से 36 ऐसे बडे टापू है जिनके अपने स्थानीय नाम हैं। नल की संरचना के बारे में भूगर्भवेताओं का मानना है कि जहां पर आज नल सरोवर है वह कभी समुद्र का हिस्सा था जो खंभात की खाडी को कच्छ की खाडी से जोडता था। भूगर्भीय परिवर्तनों से जब समुद्र पीछे चला गया तो यह एक बन्द संरचना में बदल गया। वर्षाकाल में जब यह भर जाता है तो 120 वर्ग किमी क्षेत्रफल की विशाल उथली झील में बदल जाता है। आकार में तब भले ही यह विशाल लगता हो किंतु इस सरोवर की गहराई अपने सर्वाधिक विस्तार के समय भी 2.5 मीटर से अधिक नही होने पाती है। इसका कारण यह है कि इससे अधिक मात्रा में जल इस बेसिन से बाहर बह निकलता है। शीतकाल आते-आते यह स्तर घट कर 1 से 1.5 मीटर तक रह जाता है।

क्या और कैसे देखे

नल सरोवर का परिवेश विशिष्ट प्रकार की वनस्पतियों, जल पक्षियों, मछलियों, कीट पतंगों व जीव-जंतुओं की शरण प्रदान करता है। 1969 में अभयारण्य का दर्जा मिलने के बाद से उठाए गए कदमों से इसमें मेहमान विदेशी व स्वदेशी पक्षियों की संख्या लगातार बढती जा रही है कभी कुछ हजार तक सीमित रहने वाली संख्या आज 2.5 लाख प्रतिवर्ष से ऊपर ही है। सरोवर क्षेत्र में 225 प्रकार के मेहमान पक्षी तक देखे गए हैं जिनमें से सौ प्रकार के प्रवासी जल पक्षी हैं। इसके अतिरिक्त सरोवर क्षेत्र में 19 प्रकार की मछलियां,11 प्रकार के सरीसृप, 13 स्तनपायी जानवर मिलने का पता चला है। इनमें से कुछ को घूमते हुए देखा भी जा सकता है। इन पक्षियों में हंस, सुर्खाब, रंग-बिरंगी बतखें, सारस, स्पूनबिल, राजहंस, किंगफिशर, प्रमुख हैं। इनकी बडी संख्या आपको सरोवर क्षेत्र में विचरित करती मिल जाएगी। कई बार यहां पर ऐसे पक्षी भी देखे गए हैं जिनको दुर्लभ की श्रेणी में रखा गया है।

सरोवर में मौजूद पक्षियों की जिंदगी में मानवीय आवागमन से अधिक हस्तक्षेप न हो इसके लिए एक निश्चित मार्ग से इस सरोवर में घूमने की अनुमति है। यही कारण है कि जैसे ही आप नल सरोवर के करीब पहुंचते है एक गहरी निशब्दता का अहसास होता है। नल के इर्द-गिर्द ऐसी गतिविधियों की इजाजत नहीं है जिनसे पक्षियों के विचरण में खलल पहुंचता हो। शोर न हो इसलिए सरोवर में मोटरबोट पूर्णतया प्रतिबंधित है। सरोवर की सैर के लिए यहां पर बांस के चप्पुओं से खेने वाली नावें सबसे उपयुक्त हैं जो हर वक्त उपलब्ध रहती है। ये नावें अलग-अलग क्षमता वाली होती है। जैसे ही आप सरोवर में आगे बढते है दूर-दूर मेहमान पक्षी नजर आने लगते हैं। पानी के अन्दर झांकने पर तलहटी में मौजूद जलीय जीवन भी आप देख सकते हैं। सरोवर में आपको निकटतम टापू तक ले जाया जाता है जिस तक आने जाने में दो से तीन घंटे तक लग जाते हैं। जाते समय पक्षियों की कलरव और नाव के पानी को चीरने की आवाज कानों को एक सकून सा प्रदान करती है।

सरोवर में नौका से भ्रमण से पहले अच्छा हो कि आप अभयारण्य प्रबन्धन द्वारा पार्क में लगे बोर्ड, अन्य डिस्प्ले माध्यमों से आगन्तुक पक्षियों व अभयारण्य के नक्शे आदि के बारे में जानकारी ले लें। अभयारण्य के प्रकाशनों से भी जानकारी ली जा सकती है। फिर भी अच्छा हो यदि नौका भ्रमण के समय एक गाइड भी साथ ले लें ताकि और जानकारी मिल सके। समीपवर्ती गांव के लोग ही यहां पर गाइड का काम करते हैं और एक विशेषज्ञ की तरह ही आपके प्रश्नों का उत्तर देते हैं।

यदि आप फोटोग्राफी के शौकीन हैं और यहां के पक्षियों की हलचल को कैमरे में कैद करना चाहते हैं तो इसके लिए आवश्यक है कि आपके पास टैलीलेंस युक्त कैमरा होना आवश्यक है। पक्षियों को करीब से देखने के लिए दूरबीन हो तो क्या बात है क्योंकि आगन्तुक पक्षी मनुष्य से कुछ दूरी बना कर रखते हैं। पर्यटक सरोवर के किनारे कुछ दूरी तक घुडसवारी का आनंद भी ले सकते है।

अंतरराष्ट्रीय पहचान दूर नहीं

नमक्षेत्र पशु-पक्षियों व वनस्पतियों के संरक्षण स्थल है जिनकी जैवविविधता को बचाने में अपनी अहम भूमिका होती है। वैश्विक जागरूकता के बाद से भारत में अब तक लगभग 600 नम भूमियों का पता लगाया जा चुका है। इनमें से अभी तक 25 नमभूमि क्षेत्रों को अंतरराष्ट्रीय मान्यता है शीघ्र ही इनमें गुजरात के दो नम भूमि क्षेत्र- नल सरोवर पक्षी अभयारण्य और कच्छ का छोटा रन जो भारतीय जंगली गधे का एकमात्र आवास स्थल है, भी सूची में जुडने जा रहे हैं। नल की मान्यता के बाद इसकी व्यवस्था में कुछ और सुधार होने की संभावना है। इसकी सीमा अधिक सुरक्षित हो सकेगी, झील पर आश्रित लोगों के पुनर्वास की दिशा में अधिक प्रगति होगी। झील के आसपास बसे गांवों की निर्भरता कम होने से पक्षियों को बेहतर वातावरण मिल सकेगा। इसके अतिरिक्त अभयारण्य को ग्रीष्मकाल में सूखने से बचाने की योजना भी है जिसके तहत इसमें नहर से सरदार सरोवर योजना से पानी देने की बात है।

ललित मोहन कोठियाल

नल सरोवर: कैसे पहुंचे

नल सरोवर आने के लिए आपको अहमदाबाद आना होता है जो देश के प्रमुख नगरों से अच्छी हवाई व रेल सेवा से जुडा है। वहां से बस या टैक्सी से नल सरोवर पहुंचा जा सकता है। साठ किमी दूरी को तय करने में डेढ घंटे लग ही जाते हैं। अभयारण्य की सीमा में गुजरात पर्यटन विकास निगम का एक गेस्ट हाउस है जो यहां पर एक रेस्तरां भी चलाता है। यहां पर रुक कर नल के शांत वातावरण का और लुत्फ लिया जा सकता है। एक दिन में यदि आप नल सरोवर के अलावा कुछ और देखना चाहते हों तो सरोवर की सैर के बाद 60 किमी दूर लोथल जा सकते है जहां सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष देखे जा सकते हैं और शाम में अहमदाबाद लौट सकते हैं।

अहमदाबाद एक आधुनिक नगर है जहां हर श्रेणी के पर्यटक के लिए हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध है। अहमदाबाद में रहकर कई स्थान देखे जा सकते हैं। गांधी जी के ऐतिहासिक आश्रम साबरमती के अलावा यहां अक्षरधाम मंदिर भी है। भारत की सबसे बडी साइंस सिटी अहमदाबाद में ही है। अहमदाबाद में कई मुगलकालीन दर्शनीय इमारतें भी हैं। यदि गुजरात की मेहमानवाजी, वहां के भोजन व संस्कृति से रूबरू होने का आपके पास कम समय है तो रात्रि में विशाला जा सकते हैं जहां पर आपको एक परिसर में सब कुछ देखने को मिल जाएगा।

नल सरोवर: सैलानी परिंदों की जन्नत

नल सरोवर भारत में ताजे पानी के बाकी नम भूमि क्षेत्रों से कई मायनों में भिन्न है। सरदियों में उपयुक्त मौसम, भोजन की पर्याप्तता और सुरक्षा ही इन सैलानी पक्षियों को यहां आकर्षित करती है। सरदियों में सैकडों प्रकार के लाखों स्वदेशी पक्षियों का जमावडा रहता है। इतनी बडी तादाद में पक्षियों के डेरा जमाने के बाद नल में उनकी चहचाहट से रौनक बढ जाती है।

नल में इन्हीं उडते सैलानियों की जलक्रीडाएं व स्वर लहरियों को देखने-सुनने के लिए बडी संख्या में पर्यटक यहां प्रतिदिन जुटते हैं। पर्यटकों के अतिरिक्त यहां पक्षी विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, शोधार्थी व छात्रों का भी जमावडा लगा रहता है तो कभी-कभार यहां पर लंबे समय से भटकते ऐसे पक्षी प्रेमी भी आते हैं जो किसी खास पक्षी के छायाचित्र भी उतारने की तलाश में रहते हैं।

अनूठा है नल

नम भूमि क्षेत्र नल सरोवर अपने दुर्लभ जीवन चक्र के लिए जाना जाता है जिस कारण यह एक अनूठी जैवविविधता को बचाए हुए है। नल का वातावरण अनेक प्रकार के जीव जन्तुओं के लिए उपयुक्त है और एक भोजन श्रृंखला बनाता है। मूलत: यह वर्षा जल पर आश्रित एक नम क्षेत्र है। गर्मी में जब यह सरोवर सूखने के कगार पर होता है तो मानसूनी वर्षा इस सरोवर को नई जिंदगी देती है। इसके जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा इसे लबालब कर देती है। बरसात की समाप्ति के बाद लगभग मृत प्राय: इस सरोवर में धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर लौटने लगती है। प्रारंभ में पहले इसमें सूक्ष्मजीव पैदा होते हैं उसके बाद छोटे कीट-पतंगे पैदा होते हैं या आस-पास से आकर यहां शरण लेते हैं। वातावरण की अनुकूलता के साथ आस-पास से व जमीन में बचे रह गए अंडों से कई प्रकार का जलीय जीवन तेजी से विकसित होता है। इनमें अनेक प्रकार की मछलियां उत्पन्न होने लगती हैं जिनकी संख्या तेजी से बढने लगती है। मछलियों का लालच पक्षियों को यहां आकर्षित करता है। आरंभ में यहां छोटे पक्षी ही आते हैं किन्तु जब नवंबर में मछलियां बडी हो जाती हैं तो भोजन की प्रचुरता व उचित वातावरण पाकर प्रवासी जल पक्षी भी यहां आने लगते हैं। दिसंबर व जनवरी में इनकी संख्या अधिकतम होती है।

फरवरी के अंत में नल में भोजन व जलस्तर में कमी व गर्मी के बढने के चलते मेहमान पक्षी अपने मूल घरों को लौटने लगते हैं। मार्च में जब क्षेत्र में पारा 40 डिग्री तक पहुंच जाता है तो नल के जल स्तर तेजी से कम होने लगता है। मई का अंत आते सरोवर का क्षेत्रफल पानी के सूखने से काफी कम हो जाता है। इससे उसमें मौजूद जीवन समाप्त प्राय: होने लगता है। गर्मी के बाद प्रकृति बदलती है और एक बार फिर से वही जीवन चक्र शुरू हो जाता है।

नल एक खास प्रकार की जैवविविधता को बचाये है। इस सरोवर में पिछली पक्षी गणनाएं बताती हैं कि नल में पक्षियों की संख्या साल दर साल बढ रही है। वर्ष 2002 में हुई गणना के मुताबिक यह संख्या 1.33 लाख थी। वर्ष 2004 में यह 1.84 लाख रही तो वर्ष 2006 में यह संख्या 2.52 लाख रही। वर्ष 2006 में बत्तख व हंसों की संख्या 1.19 लाख व क्रेक्स, रेहस व कूट की संख्या 82 हजार थी। इस सरोवर में प्रसिद्ध फ्लेमिंगो की संख्या 5820 आंकी गई।

कल का सागर आज का सरोवर

गुजरात के अहमदाबाद व सुंदर नगर जिलों से सटा नल सरोवर अभयारण्य अहमदाबाद से लगभग 65 किमी की दूरी पर है। सरोवर क्षेत्र में छोटे-बडे कुल 300 तक टापू हैं जिनमें से 36 ऐसे बडे टापू है जिनके अपने स्थानीय नाम हैं। नल की संरचना के बारे में भूगर्भवेताओं का मानना है कि जहां पर आज नल सरोवर है वह कभी समुद्र का हिस्सा था जो खंभात की खाडी को कच्छ की खाडी से जोडता था। भूगर्भीय परिवर्तनों से जब समुद्र पीछे चला गया तो यह एक बन्द संरचना में बदल गया। वर्षाकाल में जब यह भर जाता है तो 120 वर्ग किमी क्षेत्रफल की विशाल उथली झील में बदल जाता है। आकार में तब भले ही यह विशाल लगता हो किंतु इस सरोवर की गहराई अपने सर्वाधिक विस्तार के समय भी 2.5 मीटर से अधिक नही होने पाती है। इसका कारण यह है कि इससे अधिक मात्रा में जल इस बेसिन से बाहर बह निकलता है। शीतकाल आते-आते यह स्तर घट कर 1 से 1.5 मीटर तक रह जाता है।

क्या और कैसे देखे

नल सरोवर का परिवेश विशिष्ट प्रकार की वनस्पतियों, जल पक्षियों, मछलियों, कीट पतंगों व जीव-जंतुओं की शरण प्रदान करता है। 1969 में अभयारण्य का दर्जा मिलने के बाद से उठाए गए कदमों से इसमें मेहमान विदेशी व स्वदेशी पक्षियों की संख्या लगातार बढती जा रही है कभी कुछ हजार तक सीमित रहने वाली संख्या आज 2.5 लाख प्रतिवर्ष से ऊपर ही है। सरोवर क्षेत्र में 225 प्रकार के मेहमान पक्षी तक देखे गए हैं जिनमें से सौ प्रकार के प्रवासी जल पक्षी हैं। इसके अतिरिक्त सरोवर क्षेत्र में 19 प्रकार की मछलियां,11 प्रकार के सरीसृप, 13 स्तनपायी जानवर मिलने का पता चला है। इनमें से कुछ को घूमते हुए देखा भी जा सकता है। इन पक्षियों में हंस, सुर्खाब, रंग-बिरंगी बतखें, सारस, स्पूनबिल, राजहंस, किंगफिशर, प्रमुख हैं। इनकी बडी संख्या आपको सरोवर क्षेत्र में विचरित करती मिल जाएगी। कई बार यहां पर ऐसे पक्षी भी देखे गए हैं जिनको दुर्लभ की श्रेणी में रखा गया है।

सरोवर में मौजूद पक्षियों की जिंदगी में मानवीय आवागमन से अधिक हस्तक्षेप न हो इसके लिए एक निश्चित मार्ग से इस सरोवर में घूमने की अनुमति है। यही कारण है कि जैसे ही आप नल सरोवर के करीब पहुंचते है एक गहरी निशब्दता का अहसास होता है। नल के इर्द-गिर्द ऐसी गतिविधियों की इजाजत नहीं है जिनसे पक्षियों के विचरण में खलल पहुंचता हो। शोर न हो इसलिए सरोवर में मोटरबोट पूर्णतया प्रतिबंधित है। सरोवर की सैर के लिए यहां पर बांस के चप्पुओं से खेने वाली नावें सबसे उपयुक्त हैं जो हर वक्त उपलब्ध रहती है। ये नावें अलग-अलग क्षमता वाली होती है। जैसे ही आप सरोवर में आगे बढते है दूर-दूर मेहमान पक्षी नजर आने लगते हैं। पानी के अन्दर झांकने पर तलहटी में मौजूद जलीय जीवन भी आप देख सकते हैं। सरोवर में आपको निकटतम टापू तक ले जाया जाता है जिस तक आने जाने में दो से तीन घंटे तक लग जाते हैं। जाते समय पक्षियों की कलरव और नाव के पानी को चीरने की आवाज कानों को एक सकून सा प्रदान करती है।

सरोवर में नौका से भ्रमण से पहले अच्छा हो कि आप अभयारण्य प्रबन्धन द्वारा पार्क में लगे बोर्ड, अन्य डिस्प्ले माध्यमों से आगन्तुक पक्षियों व अभयारण्य के नक्शे आदि के बारे में जानकारी ले लें। अभयारण्य के प्रकाशनों से भी जानकारी ली जा सकती है। फिर भी अच्छा हो यदि नौका भ्रमण के समय एक गाइड भी साथ ले लें ताकि और जानकारी मिल सके। समीपवर्ती गांव के लोग ही यहां पर गाइड का काम करते हैं और एक विशेषज्ञ की तरह ही आपके प्रश्नों का उत्तर देते हैं।

यदि आप फोटोग्राफी के शौकीन हैं और यहां के पक्षियों की हलचल को कैमरे में कैद करना चाहते हैं तो इसके लिए आवश्यक है कि आपके पास टैलीलेंस युक्त कैमरा होना आवश्यक है। पक्षियों को करीब से देखने के लिए दूरबीन हो तो क्या बात है क्योंकि आगन्तुक पक्षी मनुष्य से कुछ दूरी बना कर रखते हैं। पर्यटक सरोवर के किनारे कुछ दूरी तक घुडसवारी का आनंद भी ले सकते है।

अंतरराष्ट्रीय पहचान दूर नहीं

नमक्षेत्र पशु-पक्षियों व वनस्पतियों के संरक्षण स्थल है जिनकी जैवविविधता को बचाने में अपनी अहम भूमिका होती है। वैश्विक जागरूकता के बाद से भारत में अब तक लगभग 600 नम भूमियों का पता लगाया जा चुका है। इनमें से अभी तक 25 नमभूमि क्षेत्रों को अंतरराष्ट्रीय मान्यता है शीघ्र ही इनमें गुजरात के दो नम भूमि क्षेत्र- नल सरोवर पक्षी अभयारण्य और कच्छ का छोटा रन जो भारतीय जंगली गधे का एकमात्र आवास स्थल है, भी सूची में जुडने जा रहे हैं। नल की मान्यता के बाद इसकी व्यवस्था में कुछ और सुधार होने की संभावना है। इसकी सीमा अधिक सुरक्षित हो सकेगी, झील पर आश्रित लोगों के पुनर्वास की दिशा में अधिक प्रगति होगी। झील के आसपास बसे गांवों की निर्भरता कम होने से पक्षियों को बेहतर वातावरण मिल सकेगा। इसके अतिरिक्त अभयारण्य को ग्रीष्मकाल में सूखने से बचाने की योजना भी है जिसके तहत इसमें नहर से सरदार सरोवर योजना से पानी देने की बात है।

ललित मोहन कोठियाल

नल सरोवर: कैसे पहुंचे

नल सरोवर आने के लिए आपको अहमदाबाद आना होता है जो देश के प्रमुख नगरों से अच्छी हवाई व रेल सेवा से जुडा है। वहां से बस या टैक्सी से नल सरोवर पहुंचा जा सकता है। साठ किमी दूरी को तय करने में डेढ घंटे लग ही जाते हैं। अभयारण्य की सीमा में गुजरात पर्यटन विकास निगम का एक गेस्ट हाउस है जो यहां पर एक रेस्तरां भी चलाता है। यहां पर रुक कर नल के शांत वातावरण का और लुत्फ लिया जा सकता है। एक दिन में यदि आप नल सरोवर के अलावा कुछ और देखना चाहते हों तो सरोवर की सैर के बाद 60 किमी दूर लोथल जा सकते है जहां सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष देखे जा सकते हैं और शाम में अहमदाबाद लौट सकते हैं।

अहमदाबाद एक आधुनिक नगर है जहां हर श्रेणी के पर्यटक के लिए हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध है। अहमदाबाद में रहकर कई स्थान देखे जा सकते हैं। गांधी जी के ऐतिहासिक आश्रम साबरमती के अलावा यहां अक्षरधाम मंदिर भी है। भारत की सबसे बडी साइंस सिटी अहमदाबाद में ही है। अहमदाबाद में कई मुगलकालीन दर्शनीय इमारतें भी हैं। यदि गुजरात की मेहमानवाजी, वहां के भोजन व संस्कृति से रूबरू होने का आपके पास कम समय है तो रात्रि में विशाला जा सकते हैं जहां पर आपको एक परिसर में सब कुछ देखने को मिल जाएगा।

वीराने में वसंत

फरवरी का एक-एक दिन बीतने के साथ बेचैनी बढ़ती जाती थी। बंद कमरे में चुपचाप पढ़ते रहने को दिल नहीं करता था और किसी के घर चले जाना निषिद्ध सा बना हुआ था। कभी हिम्मत करके जाओ तो कहने-सुनने को दोनों तरफ से ही कोई बात नहीं होती थी। चुप्पी की एक चादर बीच में तनी रहती थी। कोई भी बात शुरू करो, पता नहीं कैसे घूम-फिर कर वहीं पहुंच जाती थी जहां कोई भयंकर नस तड़-तड़ तड़क रही होती थी।

एक सुबह तय किया कि आज तो निकल ही जाना है। गणित पढ़ने में वैसे भी कुछ खास झंझट नहीं है। एक पतली किताब में चार-छह सादे पन्ने खोंसो, कलम जेब में डालो और कहीं भी जम जाओ। इतने दिन से शहर के इस इलाके में रह रहा था लेकिन आने-जाने का रास्ता कमोबेश एक ही बना हुआ था। यहां से निकलकर शहर के बीच की दो-चार जगहें, फिर वापस यहीं। सोचा, आज उल्टी तरफ चलते हैं।

थोड़ी दूर चलते ही खेत शुरू हो गए। धूप को अपने रंग में रंगते सरसों के गहबर फूलों और गेहूं की कचर हरियर दुद्धी बालियों से लदे हुए पानी से गदबद खेत। दिल किया, यहीं कहीं रुक जाते हैं। सड़क से किनारे होकर एक ट्यूबवेल की तरफ बढ़ा कि वहां थोड़ी सूखी जमीन मिल जाएगी। कि तभी हल्ला सा मचा और कई लोग छत से कूद-कूद कर बगटुट भागते नजर आए। वहां वे चैन से बैठे जुआ खेल रहे थे और मुझे देखकर डर गए थे। उनके खेल में खलल डालना ठीक नहीं लगा।

वापस सड़क पर आ गया और शहर की उल्टी दिशा में सीधे बढ़ता चला गया। ट्रैफिक नहीं के बराबर था। सड़क अपने आप मुड़ती हुई किधर जा रही है, इसका कोई भान नहीं था। अचानक सामने ढलान दिखी। तीखा मोड़ काटती हुई मंथर बहती नदी आगे राह रोके खड़ी थी।

आजमगढ़ शहर में टौंस नदी ऐसे ही चौंकाती है। सांप जैसी शक्ल में यह शहर को तीन तरफ से घेरे हुए है और इसके हर मोड़ पर कोई न कोई रहस्य छिपा है। यह कोई गहरी नदी नहीं है। फरवरी के महीने में कुछ जगहों से आप इसे बिना अपना अंडरवियर भिगोए पार कर सकते हैं। मुझे लगा कि कोई थ्योरम हल करने की तुलना में यह काम कहीं ज्यादा जरूरी है।

नदी के उस पार बहुत सारे कुत्ते थे- भागादौड़ी का शाश्वत खेल खेलते हुए। उनके पेट भरे हुए थे और अपने बीच दो पैरों से चलने वाला एक जानवर पाकर वे रत्ती भर भी प्रभावित नहीं हुए थे। आसपास राख, हंड़िया और एक-दो चिरे हुए बांस भी दिख रहे थे। शायद इस जगह का इस्तेमाल मुर्दे जलाने में होता हो, जिनके जल चुकने के बाद बची हुई चीजें कुत्तों के काम आती हों।

उधर वाले तट की चढ़ाई कुछ ज्यादा खड़ी थी। ऊबड़-खाबड़ बलुअर जमीन खेती के लिए मुफीद नहीं थी, शायद इसीलिए लालच की चोट भी उसपर कम पड़ी थी। खेत थे, लेकिन दूर-दूर थे। पेड़ और झाड़ियों ने तब तक उनसे हार नहीं मानी थी। चारो तरफ वीरानी थी। लेकिन 'वीरानी सी वीरानी' यह नहीं थी। जिंदगी यहां अलग ही लय में भरपूर धड़क रही थी। यहां के पेड़ों में लंबी पीली दुम वाले तोतों के घर थे। नीले-सफेद फूलों भरी जंगली झाड़ियों में टिड्डे फुदक रहे थे। झींगुरों की झूं-झूं और दूर शहर की घूं-घूं को रगेदती कठफोड़वे की ठक-ठक ही यहां की सबसे ऊंची आवाज थी।

कुछ ऊंचाइयां और ढलानें और पार करके यहां मैंने हठयोगियों, नाथपंथियों या शायद बौद्धों के काम आने वाली छोटी-छोटी गिरी-पड़ी कोठरियों से भरी, लाहौरी ईंटों से बनी एक बहुत पुरानी इमारत खोज निकाली। एक संदेहास्पद बाबा ने कुछ गोल पत्थर गाड़कर इसे शिवमंदिर बना डाला था। उस साल की शिवरात्रि पर बाबा के ठंढई प्रसाद के असर में की गई गणित की 'मौलिक खोजें' तो नशा उतरते ही साफ हो गईं लेकिन जगह का खुमार जेहन पर आज भी तारी है।

साभार - पहलू
http://pahalu.blogspot.com/2008/02/blog-post_26.html

बाढ़ प्रबंधन का नायाब सूत्र दिया दसवीं के छात्र ने

जहानाबाद/मखदुमपुर । एक तरफ नदियों को जोड़कर कुशल जल प्रबंधन के लिए तमाम सरकारें मगजमारी कर रही है वहीं दूसरी ओर दसवीं कक्षा के छात्र ने अपने बूते एक ऐसा प्रोजेक्ट तैयार किया है अगर उसे अमल में लाया गया तो निश्चित तौर पर एक नयी क्रांति का सूत्रपात हो सकता है। मखदुमपुर प्रखंड अंतर्गत खलकोचक गांव निवासी नंदकिशोर प्रसाद शर्मा का पुत्र वेद निधि ने 'गागर में सागर' की कहावत को चरितार्थ करते हुए छोटी सी उम्र में ही नदियों को जोड़ने का कंसेप्ट दिया है। उससे बाढ़ और सुखाड़ की समस्या का समाधान तो होगा ही उससे छोटे स्तर पर जल विद्युत संयंत्र लगाकर बिजली उत्पादन करने, बड़े बांधों से होने वाले नुकसान से बचाव तथा नदी के पानी को लेकर राज्यों के बीच होने वाले विवाद से भी बचा जा सकेगा। उग्रवादी घटनाओं से त्रस्त मगध की धरती पर फसलें लहलहायेंगी और किसानों की अर्थ व्यवस्था सुदृढ़ होगी। वेद निधि के इस प्रोजेक्ट को सिंचाई विभाग के कार्यपालक अभियंता रामतवकल सिंह ने भी सराहते हुए उसके सकारात्मक सोंच की तारिफ की और कहा कि सरकार भी नदियों को जोड़ कर सिंचाई के साधन को दुरुस्त करने पर विचार कर रही है। कड़ी मेहनत और लगन के पश्चात तैयार की गयी इस प्रोजेक्ट के लिए वेद निधि को 35वीं राज्य स्तरीय जवाहर लाल नेहरु बाल विकास प्रदर्शनी 2007-08 में द्वितीय पुरस्कार मिला। इसके उपरांत 15 से 19 जनवरी तक कलकत्ता में आयोजित पूर्वी भारत विज्ञान मेला 2008 में भी वह भाग लिया। जहां उसके प्रोजेक्ट की सराहना की गयी। काको प्रखंड के बढ़ौना गांव स्थित मामा ब्रजेश कुमार के घर रहकर वहीं उच्च विद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे वेद निधि ने प्रयोग के तौर पर सर्वप्रथम सोन और फल्गु नदी को जोड़ने के लिए प्रदर्श तैयार किया। उसकी सोंच है कि सोन नदी का अनावश्यक पानी गंगा नदी में जाकर उतर बिहार में बाढ़ का संकट लाती है जिसपर सरकार को प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये खर्च करनी पड़ती है। अगर सोन के पानी को कैनाल के माध्यम से फल्गु नदी में गिराया जाता है तो इससे बाढ़ की विभिषिका से तो बचा ही जा सकेगा साथ ही मगध की भूमि को सिंचाई के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी भी मिल सकेगा। उससे बिजली का भी उत्पादन हो सकेगा और भूमिगत जल के अत्याधिक क्षय को रोका जा सकेगा। इसके तहत सोन नदी के बिहार में प्रवेश करते ही सासाराम के आसपास से बोध गया के पास फल्गु नदी को कैनाल के माध्यम से जोड़ा जाए। कैनाल के उद्गम स्थल पर सोन नदी में चेक डैम और वाटर इलेक्ट्रीक प्लांट लगाकर जहां एक ओर बिजली उत्पादन की जा सकेगी वहीं पानी के धार को कैनाल की ओर मोड़ा भी जा सकेगा साथ ही सोन में छोटे-छोटे अवरोध खड़े किये जाएं ताकि अत्याधिक जल की अवस्था में सोन के जल को फल्गु की ओर मोड़ा जा सके। इसके बाद नहर एवं जल निकासी के अन्य रास्तों में भी गहरे कुएं बनाये जायें जिसे ताकि अतिरिक्त जल को भूमि के अंदर भेजा जा सके। फल्गु नदी में एक छोटा सा बांध बनाकर उसके जल को मुहाने नदी की ओर मोड़ दिया जाए। सोन में भी पानी की अधिकता को रोकने के लिए जल ग्रहण क्षेत्रों में भूमिगत जल को पुर्नसंधारण के लिए कुंए के निर्माण का कंसेप्ट दिया है।

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