जलराशि ने नाम दिए देशों को

हमारे देश भारत के दो और नाम प्रचलित हैं हिन्दुस्तान तथा इंडिया. ये दोनों नाम हमारे देश को सिंधु नदी के कारण मिले हैं. सिंधु नदी को प्राचीन ईरानवासियों ने अपने ढंग से उच्चारण करते हुए हिन्दू कहा. यूरोपवासियों ने उसे इंडस संबोधित किया. इंडस से इंडिया बना है. सिंधु नदी तिब्बत से निकलती है, भारत के लद्दाख क्षेत्र में बहकर बाद में वह पाकिस्तान की मु2य नदी बन गई है. कुल 2880 किलोमीटर की यात्री पूरी करते हुए सिंधु नदी अरब सागर में मिल जाती है. सिंधु नदी के कारण ही सिंध प्रदेश और सिंधी भाषा को नाम मिले हैं. दुनिया में और भी कई देशों को नदियों के नाम दिए हैं. पश्चिमी एशिया में एक देश है जोर्डन. इस देश ने भी अपना नाम जोर्डन नामक नदी के कारण पाया है.
जोर्डन एक छोटी नदीं है जो मृतसागर में समाती है. नदियों के आधार पर अफ्रीका महाद्वीप में कई देशों को नाम मिले हैं. नाइजर एक बड़ी नदी है जिसकी लंबाई 7180 किलोमीटर है. नाइजर एवं नाइजीरिया दोनों देशों ने अपने नाम इसी नदी से ग्रहण किए हैं. अटलांटिक महासागर के तट पर पश्चिमी अफ्रीका में दो छोटे-छोटे देश हैं-सेनेगल और गैमिम्या. दोनों देश अपने नामों के सदृश नदियों के कारण वि2यात हैं. सेनेगल और गै6बिया दोनों साधारण नदियां हैं मझौले आकार की. गैब्बिया महासागर में विलीन होकर अपनी यात्रा समाप्त करती है. इस नदी ने कांगों (किंशासा) और कांगो(ब्राजाविले) नाम के दो देशों को संज्ञा प्रदान की है.
अफ्रीका में एक और बड़ी नदी है जे6बेसी जो 3540 किलोमीटर की लंबाई पार कर दक्षिणी अटलांटिक में समा जाती है. जा6बिया देश में अपनी पहचान इस नदी से प्राप्त की है. यद्यपि मिस्त्र देश को नाम अलग कारण से मिला है, फिर भी उसका जीवन नील नदी पर आश्रित है. इसी कारण मिस्त्र (इजिप्ट) को नील नदी का वरदान कहा जाता है. 6650 किलोमीटर लंबी नदी नील, लंबाई के हिसाब से सबसे बड़ी नदी है. दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में तीन देशों को नदियों के नाम दिए हैं. दक्षिणी अटलांटिक महासागर तट पर ब्राजील के दक्षिण तथा अर्जेंटीना के पूर्वी तट से सटा हुआ देश है-उरुग्वेय उरुग्वे नाम की नदी से दक्षिणी अमेरिका के स्विट्जरलैंड कहे जाने वाले इस देश को नाम दिया है.
उरुग्वे का पड़ोसी देश है पेराग्वे. पेराग्वे का नामकरण पेराग्वे नामक नदी से हुआ है. दक्षिण अमेरका महाद्वीप के मध्य में बहने वाली पेराग्वे एक बड़ी नदी 2494 किलोमीटर लंबी है. यह नदी इतनी चौड़ी है कि मझौले आकार के जहाज इसमें नौवहन कर सकते हैं. यही कारण है कि सागर तट विहीन पेराग्वे देश को समुद्र तट की कमी अनुभव नहीं होती. दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप के उ8ार में एक देश है-सूरीनाम. वहां सूपीनाम नामक नदी है. इसी नदी के किनारे वहां की राजधानी पारामारिबों स्थित है. सूरीनाम कोई 140 वर्ष पहले हजारों भारतवंशी मजदूर ले जाए गए हैं.
सूरीनाम नदी के देश सूरीनाम में लगभग 40 प्रतिशत निवासी भारतीय मूल के हैं. जल हमारे जीवन का मु2य आधार है. सही कहा गया है कि जल से ही जीवन है. यहीं जल जब बहता है तो नदी बन जाता है. बहती हुई नदियों ने कई देशों के नाम दिए हैं. स्थित जलराशि जब विशाल क्षेत्र में होती है तो उसे झील कहते हैं. झीलों ने भी अनेक देशों के नाम दिए हैं. मध्य अफ्रीका में एक बड़ी झील है टांगान्यिका. टांगन्यितका देश (पूर्वी अफ्रीका) और हिन्द महासागर के द्वीप देश जंजीबार का संघीय देश टांजानिया कहलाता है. टांगन्यिका के पड़ोस का देश है मलावी ने भी अपना नाम इसी नाम की झील से पाया है. मध्य अफ्रीका में उ8ार की ओर चाड नामक देश है. चाड नामक झील से पाया है.
श्रीधर बर्वे
साभार-नवभारत भोपाल

राहत के जरिए हो जल संरक्षण

मध्य प्रदेश में नदियों की कमी नहीं है. बड़ी नदियां तो हैं ही, छोटी नदियां तो अत्यधिक हैं. ये छोटी नदियां बारिश के दिनों में बड़ी नदियों को पानी देती हैं. अच्छी बारिश हो तो यह प्राय: बेहतर स्थिति में होती हैं, लेकिन बारिश के बाद इन नदियों के पानी के भंडारण की व्यवस्था प्राय: नहीं है. इस बार बारिश कम होने से स्थिति विषम है. बुंदेलखंड क्षेत्र में तो खेतों में दरारें पड़ी हैं और सिंचाई तो बहुत दूर पीने के पानी के भी लाले पड़े हैं. बड़ी नदियों में से एक काली सिंध में पानी का जल स्तर तेजी से घट रहा है. राजगढ़ जिले के सारंगपुर क्षेत्र के लिए इस नदी को जीवनदायिनी की संज्ञा दी गई है, लेकिन इस बार पानी की कमी के चलते इस क्षेत्र को अभावग्रस्त घोषित कर दिया गया. इसके बावजूद क्षेत्र की नदी व अन्य जलस्रोतों से पानी के खुले आम दोहन के कारण नदी का जलस्तर तेजी से गिर रहा है.
हालांकि जलस्रोतों के दोहन पर रोक लगा दी गई है. लेकिन किसान सिंचाई के लिए निरंतर जलस्रोतों से पानी ले रहे हैं. बारिश नहीं होने से स्थिति भयावह हुई है और इसका असर भूजल स्रोतों पर भी पड़ा है. पानी की कमी वाले क्षेत्रों में समस्या शुरू हो गई है. प्रदेश में ऐसी स्थितियां बनती रहती हैं, मगर इसके स्थायी हल की ओर बढ़ने की ईमानदार कोशिश अब तक नहीं की गई है. जल अभावग्रस्त तथा सूखा प्रभावित क्षेत्रों में बांध बनाने और पानी रोकने का काम शुरू किया जाना आवश्यक समझा जाना चाहिए. छोटी-छोटी नदियों में डैम और बांध बनाने का काम तो शीघ्रता से शुरू करने की जरूरत है.
इन क्षेत्रों की समस्याओं के मद्देनजर राहत कार्य शुरू नहीं किया गया. जबकि बांध बनाने और जल संरचनाएं तैयार करने के काम में अभावग्रस्त लोगों को लगाकर उन्हें राहत दी जा सकती है. नदियों को जलस्रोतों को संरक्षित करने की ठोस योजना बनाने के साथ-साथ यह ध्यान में लाना जरूरी है कि बड़ी नदियों को पानी देने वाले स्रोतों को भी संरक्षित किया जाए. राहत कार्यों को पूरी पारदर्शिता और तत्परता से लागू करने की भी जरूरत है. आने वाले दिनों में पेयजल की कमी को देखते हुए इसकी मुक6मल व्यवस्था की जानी चाहिए. बहरहाल, अब आवश्यकता इस बात की है कि इन समस्याओं का स्थायी हल निकाला जाए ताकि आने वाले दिनों में पीने और सिंचाई के लिए पानी की कमी नहीं हो.

नहरों के भरोसे नदियों को जीवनदान

अंबरीश कुमार
उत्तर प्रदेश में नदियों को बचाने का आजकल एक अनूठा प्रयोग चल रहा है. नदियों को बचाने के लिए नहरों से पानी छोड़ा जा रहा है. सई और रारी नदियों में यह सरकारी प्रयोग हो चुका है.

लखनऊ के बगल में सई नदी सूखी तो उसे बचाने के लिए पानी भरा गया. लेकिन नदियों को बहाने के ऐसे औपचारिक प्रयास रारी नदी पर सफल नहीं हुए. नहर से छोड़ा गया पानी कुछ ही घंटों में सूख गया. सिचाईं विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि नदियों से नहरों को पानी मिलता है लेकिन अब सरकारी आदेश है इसलिए काश्तकारों के हिस्से का पानी नदियों में छोड़ा जा रहा है.

फिर भी नदियों के भरोसे कितनी नदियों को जीवित किया जा सकता है? अयोध्या में सरयू का ज्यादातर हिस्सा रेत के टीले में बदलता जा रहा है. राम के जन्मभूमि में ही यह नदी अब अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है. उत्तर प्रदेश में कोई दर्जनभर नदियां इतिहास बनने के मुहाने पर हैं. कुछ का पानी खत्म हो रहा है तो कुछ में पानी के नाम पर औद्योगिक कचरा बह रहा है. बुंदेलखण्ड में बिषाहिल और बाणगंगा सूख गयी है. बागेन और केन की धार टूट रही है. बेतवा हमीरपुर तक आते-आते लड़खड़ाने लगती है.

चित्रकूट में बाणगंगा के बारे में कहा जाता है कि खुद भगवान श्रीराम ने इसे पाताल से निकाला था. जैसे आज बुंदेलखण्ड पानी के संकट से जूझ रहा है उस समय भी लोगों को पानी का संकट था. लोगों ने रामजी से प्रार्थना की और रामजी ने धरती को बाण से चीरकर जो जलधारा निकाली थी वह बाणगंगा बन गयी.

बड़ी नदियों में गंगा, यमुना और गोमती की भी हालत बुरी है. कानपुर में तो गंगा छूने लायक भी नहीं बचीं. हमीरपुर में यमुना का हाल बेहाल है. राजधानी लखनऊ में गोमती कचरे के ढेर में बदल गयी है. चंद्रावल, धसान, घाघरा, राप्ती नदियों में भी पानी कम होता जा रहा है और प्रदूषण बढ़ता जा रहा है. चंबल की थोड़ी चर्चा एक बार फिर हुई है लेकिन चर्चा का कारण पानी नहीं बल्कि घड़ियालों की मौत है.

गोमती और उसकी सहायक नदियों को बचाने के लिए गोमती अभियान की शुरूआत की गयी है. गोमती नदी गंगा से भी पुरानी मानी जाती है. मान्यता है कि मनु-सतरूपा ने इसी नदी के किनारे यज्ञ किया था और इसी नदी के किनारे नैमिषारण्य में 33 करोड़ देवी-देवताओं ने तपस्या की थी. लेकिन अब गोमती का पानी विषैला बन चुका है. लखनऊ में ही गोमती नदी का पानी काला पड़ चुका है. गोमती की सहायक नदियां दिन-रात इसमें कथिना चीनी मिलों का कचरा लाकर इसमें उड़ेल रही हैं. पीलीभीत के गोमथ तालाब से निकलनेवाली गोमती उत्तर प्रदेश में करीब 900 किलोमीटर की यात्रा करके जौनपुर में गंगा में समाहित हो जाती है.

आईटीआरसी के शोधपत्र के मुताबिक चीनी मिलों और शराब के कारखानों के औद्योगिक कचरे के कारण यह नदी बुरी तरह प्रदूषित हो चुकी है. सहायक नदियों का पानी सूख गया है और गोमती में जो कुछ पहुंचता है वह पानी नहीं बल्कि औद्योगिक कचरा होता है. अकेले लखनऊ शहर से ही इस नदी में 27 नालों से कचरा उड़ेला जाता है. जानकार बताते हैं कि गोमती की इस दुर्दशा के लिए वे मिले ज्यादा जिम्मेदार हैं जो अपना कचरा इस नदीं में उड़ेलती हैं. इन चीनी मिलों में हालांकि शोधन यंत्र लगे हुए हैं लेकिन उन्हें चलाया नहीं जाता और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी ऐसी मिलों के साथ मिलीभगत के चलते कभी कोई कार्रवाई भी नहीं करते.
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पानी के पत्रकार श्रीपद्रे से बातचीत

विकास पाण्डेय
श्रीपद्रे 70 के दशक से पानी की पत्रकारिता कर रहे हैं. 20 साल तक अदिके पत्रिका के मानद संपादक रहे. श्री पानी की रिपोर्टिंग करते हैं और लोग श्री के जरिए पानीदार भारत को समझते हैं.

क्या मुख्यधारा की पत्रकारिता पानी, पर्यावरण और गांव को वह महत्व दे रहा है जो उसकी जिम्मेदारी है?

ये ऐसे विषय हैं जिनकी रिपोर्टिंग करने के लिए आपको जमीनी स्तर पर जमकर काम करना होगा और अपनी समझ साफ रखनी होगी. अगर ऐसा नहीं है तो आप ऐसे विषयों के साथ न्याय नहीं कर सकते. इसे दुर्भाग्य ही कहिए आजकल आरामदायक कुर्सी पर बैठकर खेती-बाड़ी की रिपोर्टिंग की जाती है.

क्या इसके पीछे बाजार के ताकतों का हाथ है?

बहुत बार ऐसा होता है कि जब पत्रकार किसी जनपक्षीय मुद्दे की रिपोर्टिंग करता है तो प्रबंधन बाजार और विज्ञापन के दबाव में इस तरह की रिपोर्टिंग को दबाने की कोशिश करता है. फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तमाम खतरों के बावजूद इस देश में सच्चाई को रिपोर्ट करने की महान परंपरा रही है. लेकिन यह सच है कि वास्तविक मुद्दों से पत्रकारों की दूरी तो बढ़ी है. संभवतः यह बाजार की चमक-दमक का नतीजा है. इससे पार पाना इतना आसान नहीं होगा.

वर्षाजल संरक्षण पर आपका काफी काम हमारे सामने है. इस बात पर इतना जोर क्यों?

आखिरकार यह विज्ञान है. यह विशेष और बहुत व्यवस्थित ज्ञान है. इस विज्ञान को समझने के लिए आपको यह समझना होगा कि वर्षा का पैटर्न क्या है, मिट्टी कैसी है, जमीन के अंदर पानी का रिसाव/भराव कैसे होता है. इसके बाद ही हम किसी निष्कर्ष पह पहुंचते हैं. यह कितना आसान या मुश्किल है यह इस बात से तय होता है कि जमीन कैसी है. वैद्य के पास हजार लोग पेट में तकलीफ की शिकायत लेकर आते हैं तो वह सबको एक ही औषधि तो नहीं बताता. जैसे लक्षण होते हैं वैसा उपचार किया जाता है. इसीलिए मैं वर्षा जल संचय को एक विज्ञान कहता हूं जिसे समझने के लिए समझ और धैर्य दोनों जरूरी है.

क्या आपको लगता है कि पर्यावरण को रिपोर्ट करने में मीडिया हिचकता है?

मुझे ऐसा नहीं लगता. पत्रकारिता की पढ़ाई कहती है कि रिपोर्ट करने से पहले आपको विषय का चुनाव करना होता है. लेकिन जब आप पर्यावरण और गांव की रिपोर्टिंग करने जाते हैं तो यह सिद्धांत लागू नहीं होता. वहां आपको विषय की पहचान करनी होती है. जरूरी नहीं कि आप इंटरनेट पर बैठे-बैठे भारत के गांवों में घटनेवाली घटनाओं और वहां की समस्याओं के बारे में जान ही पायें. उन्हें जानने के लिए उनके बीच जाना होगा. कई बार ऐसा होता है कि आप जो कल्पना भी नहीं कर सकते वह घटना आपके सामने होती है. अब सवाल यह है कि आप उसको रिपोर्ट कैसे करेंगे. मीडिया के अधिकांश लोग यहीं चूक जाते हैं. इसलिए मैं कहता हूं कि गांव और पर्यावरण को रिपोर्ट करना है अपनी तरह से उनके बारे में मत सोचिए, उनकी तरह से उनको देखिए.

वेस्टर्न घाट का क्या मुद्दा है?

वेस्टर्न घाट ही नहीं, पूरा प्रदेश और पूरे देश की कृषि इस समय गंभीर संकट में है. जिस देश में खेती सबसे ज्यादा सुरक्षित जीविका का साधन था वहां अब खेती करना बड़ी चुनौती हो गयी है. लागत में बेतहाशा वृद्धि हुई है. खेती में मजदूरों की दिनों-दिन किल्लत बढ़ती जा रही है.

सरकार की सोच-समझ और योजनाओं पर आप क्या कहते हैं?

इस देश में जो राजनीतिज्ञ और नौकरशाह नीतियां बनाते हैं उनका जमीनी हकीकत से कुछ लेना-देना नहीं होता. नीतियों और वास्तविक जरूरतों में भारी अंतर है. इसके बावजूद हमारे नीतिकार कभी जमीनी हकीकतों को समझने की भी कोशिश नहीं करते. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इतने संकटों के बावजूद दूर-दराज के इलाकों में जो किसान परंपरागतरूप से खेती कर रहे हैं वे खुश हैं. क्यों? क्योंकि उनके ऊपर योजनाओं की मार नहीं पड़ी है. अभी हाल में ही मैं कोलार के एक दूर दराज के गांव में गया था. वहां पहुंचना भी मुश्किल क्योंकि सड़क वगैरह की कोई खास सुविधा नहीं है. इसलिए प्लानिंग कमीशनवाले लोग उन्हें अभी तक शिक्षित करने नहीं पहुंचे हैं. वहां किसी प्रकार का कोई बोरवेल नहीं है फिर भी उनको यथेष्ट पानी मिलता है. पानी की उनकी अपनी व्यवस्था है और उन्हें किसी प्रकार के प्लानिंग की जरूरत नहीं है. वे खेती से खुश हैं.

और सरकार की ऋणनीति के बारे में?

मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि किसानों को मदद करने का यह ठीक रास्ता नहीं है. हमें यह समझना होगा कि किसानों का बड़ा वर्ग जिसे सचमुच मदद की जरूरत है वह बैंकों की पहुंच से दूर है. इसके कई सारे कारण हैं. क्या उन नीतियों का ऐसे किसानों के लिए कोई मतलब रह जाता है जो बैंकों के दायरे में ही नहीं है.

किसानों की बढ़ती आत्महत्या के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं.?

कुछ घटनाओं को छोड़ दें तो सरकार की नीतियां ही किसानों के लिए पैदा हुई इस विपदा की जिम्मेदार हैं. जो सबका पेट भरता है उसके साथ हम दोयम दर्जे के नागरिक का व्यवहार करते हैं. सरकार को भूल जाईये. समाज और पत्रकार भी तो उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक ही मानती है.

तो क्या वैकल्पिक मीडिया ही अब एकमात्र रास्ता होगा?

वैकल्पिक मीडिया वह शून्य नहीं भर सकता जो मुख्यधारा की मीडिया तैयार कर रही है. ब्लाग और कम्प्यूटर कुछ हद तक इस शून्य को भर सकते हैं. मैं यह नहीं मानता कि कम्प्यूटर गरीब के आंसू नहीं पोंछ सकता. मेरा मानना है कि तकनीकि अपनेआप में सुविधा प्रदान करती है अब यह प्रयोग करनेवाले पर निर्भर करता है कि वह उसका कैसा उपयोग करता है.

अदिके पत्रिका की शुरूआत में क्या दिक्कते आयीं. उस दौर में किसानों के लिए पत्रिका निकालना कितना मुश्किल था?

खेती की पत्रकारिता करने के लिए आपकी सबसे बड़ी पूंजी है आपकी विश्वसनीयता. कारण साफ है. आप जो लिखते हैं हजारों किसान उस पर अमल करते हैं. उसे पढ़कर अपने खेतों में प्रयोग करते हैं. और जब परिणाम आता है तो आपके लिखे और परिणाम में अंतर हुआ तो आपकी विश्वनीयता पर संकट खड़ा हो जाता है. इसलिए खेती के पत्रकार को तब तक किसी रिपोर्ट या सूचना को नहीं छापना होता जब तक उस रिपोर्ट की विश्वसनीयता पूरी तरह सिद्ध न हो जाए.

फिर भी मैं मानता हूं कि खेती के रिपोर्टिंग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसान लिखता नहीं और लिखनेवाला किसानी नहीं करता. यह सबसे बड़ी चुनौती है. मेरा दो दशक का अनुभव है कि किसानों से लिखवाना बहुत मुश्किल है, फिर भी असंभव नहीं.

श्रीपद्रे के बारे में
साभार- http://visfot.com

निर्मल हुईं अपावन नदियां

नौ साल पहले एक फैक्ट्री के प्रदूषण के चलते चलियार नदी का पानी जहर हो चुका था. मगर फिर व्यापक जनआंदोलन के बाद 1999 में फैक्ट्री बंद हुई और आज चलियार जहर से आजादी पाकर जीवनदायिनी नदी के रूप में फिर से बहने लगी है. के ए शाजी की रिपोर्ट.
केरल की चौथी सबसे बड़ी नदी चलियार में जिंदगी फिर से बहने लगी है. इसका पुनर्जीवन नदी के किनारे बसे मल्लपुरम और कोजिकोड़ जिले के पांच लाख लोगों के लिए भी बड़ी राहत लेकर आया है. चलियार पिछले कई दशक से प्रदूषण की मार झेल रही थी. वजह थी आदित्य बिरला समूह के कारखाने ग्वालियर रेयॉन्स से नदी में समाती गंदगी. एक रिपोर्ट के मुताबिक एक समय तो हालात यहां तक पहुंच गए थे कि इसके पानी एक वक्त था जब नदी के किनारों पर बसे लोग इसके पानी में घुले जहर के फलस्वरूप कैंसर और दूसरी जानलेवा बीमारियों के शिकार हो रहे थे. अब ये खतरा दूर हो गया है. मछलियों की बढ़ती संख्या बता रही है कि चालीस साल तक नदी के पानी में घुला जहर अब खत्म हो गया है.
और कीचड़ में कोई फर्क ही नहीं रह गया था. लेकिन व्यापक जनविरोध के चलते फैक्ट्री बंद होने के नौ साल बाद मावूर और वझाकड़ इलाकों से होकर गुजरने वाली 169 किलोमीटर लंबी चलियार आज फिर से स्वच्छ पानी की अमृतधारा बन गई है. एक वक्त था जब नदी के किनारों पर बसे लोग इसके पानी में घुले जहर के फलस्वरूप कैंसर और दूसरी जानलेवा बीमारियों के शिकार हो रहे थे. अब ये खतरा दूर हो गया है. मछलियों की बढ़ती संख्या बता रही है कि चालीस साल तक नदी के पानी में घुला जहर अब खत्म हो गया है.

चलियार की विपदा की शुरुआत तब हुई जब 1958 में केरल में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई दुनिया की पहली कम्युनिस्ट सरकार अस्तित्व में आई. मुख्यमंत्री ईएमएस नंबूदरीपाद इस आम धारणा को दूर करने के लिए उत्सुक थे कि कम्युनिस्ट हड़ताल करवाकर कारखाने बंद करवा देते हैं और उद्योगों की तरक्की से उन्हें कोई मतलब नहीं. इसलिए उनकी सरकार ने उस समय के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक के साथ समझौते पर दस्तखत किए और 1963 में मावूर में ग्वालियर रेयॉन्स सिल्क लिमिटेड का कारखाना शुरू हुआ. ये राज्य में सबसे बड़ा निजी उपक्रम था और इसे खुश करने के लिए कई तरह की रियायतें दी गईं.

इसकी पहली मार चलियार पर पड़ी. कंपनी को इस बात की छूट थी कि औद्योगिक इस्तेमाल के लिए वो चलियार से जितना चाहे पानी ले सकती है और कारखाने से निकलने वाला कचरा नदी में डाल सकती है. खतरा सामने आने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. कारखाना शुरू होने के कुछ समय बाद ही चलियार का पानी पीकर पशुओं के मरने की खबरें आने लगीं. 1965 से चलियार बचाओ समिति के गठन के साथ ही कारखाने के विरोध का सिलसिला शुरू हुआ जिसकी परिणति 1999 में इसके बंद होने के रूप में हुई.

हालांकि इससे 2000 लोग बेरोजगार तो हुए मगर आज वो खुश हैं कि नदी में जिंदगी लौट आई है. इसके फायदे भी दिखाई देने लगे हैं. मछली उद्योग अब एक लाभकारी व्यवसाय बन गया है. पशुओं की संख्या बढ़ रही है. स्थानीय लोगों का स्वास्थ्य पर होने वाला खर्चा काफी कम हो गया है और लोग अब आराम से नदी में तैर और नहा सकते हैं.

जैसा कि विरोध की अगवाई करने वालों में से एक बाबू वर्गिस कहते हैं, “न सिर्फ मछलियों की कई प्रजातियां फिर से पाई जाने लगी हैं बल्कि उनका स्वाद भी पहले से बेहतर है.” वर्गिस उन कुछ लोगों में से एक है जिन्होंने कारखाने को बंद करवाने के लिए चलियार बचाओ अभियान शुरू किया था. ये लोग आज इसलिए भी खुश हैं कि तब औद्योगीकरण और रोजगार की दुहाई देकर अभियान से दूरी बनाने वाले लोग भी जहरमुक्त पानी के फायदों को महसूस कर रहे हैं. चलियार को बचाने के लिए लड़ी गई लड़ाई कई मायनों में अनोखी थी. ये आखिरकार एक बड़े औद्योगिक घराने के खिलाफ मिली जीत थी जिसे इंसानों और पर्यावरण की जरा भी चिंता नहीं थी.

कारखाने के खुलने से इलाके की वन संपदा को भी खासा नुकसान हुआ था. 1963 से 1974 के दौरान राज्य सरकार ने कारखाने को बांस और दूसरी जंगली लकड़ियां भारी छूट देकर महज एक रुपये प्रति टन की अवास्तविक कीमत पर उपलब्ध करवाईं. बिजली की कीमत 40 पैसे प्रति यूनिट रखी गई और चलियार से लिए गए पानी पर तो कोई भी शुल्क नहीं वसूला गया. अनुमान लगाया जा रहा है कि अकेले इन छूटों की कीमत ही करीब तीन हजार करोड़ रुपये बैठती है.

जैसा कि अभियान के लिए अपनी नौकरी तक छोड़ने वाले पत्रकार सी सुरेंद्रनाथ कहते हैं, “कारखाने ने सरकार को नाममात्र की कीमत अदा कर वायानाड इलाके की 90 फीसदी बांस के जंगल खत्म कर दिए और यहां के संवेदनशील पारिस्थिकीय तंत्र को काफी नुकसान पहुंचाया. इसके चलते लोगों को सांस, त्वचा संबंधी और कैंसर जैसी कई घातक बीमारियों का भी शिकार होना पड़ा.” मावूर और वाझाकड़ के बीच नाव चलाने वाले अबदुर्रहमान कहते हैं, “सांस लेने के लिए पर्याप्त ताजा हवा नहीं थी. नवजात बच्चों को अंधापन और मंदबुद्धि जैसी कई बीमारियां हो रहीं थीं.” एक स्थानीय डॉक्टर पी के दिनेश कहते हैं, “कारखाना बंद होने के दो साल के भीतर ही बच्चों में होने वाले सांस संबंधी रोगों में गिरावट आ गई.”

चलियार को बचाने के लिए लड़ी गई लड़ाई कई मायनों में अनोखी थी. ये आखिरकार एक बड़े औद्योगिक घराने के खिलाफ मिली जीत थी जिसे इंसानों और पर्यावरण की जरा भी चिंता नहीं थी. “इस लड़ाई ने एक मरती नदी को नई जिंदगी दी”, कहना है पर्यावरणविद सुगथ कुमारी का. विडंबना ये भी है कि सीपीएम, कांग्रेस और बीजेपी जैसी मुख्यधारा की पार्टियों और उनके मजदूर संगठनों ने हमेशा इस आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश की और बिरला के पक्ष में खडीं रहीं.

आंदोलन के केंद्रबिंदु वाझायूर पंचायत के अध्यक्ष के ए रहमान रहे. अभियान में मजबूती से कंधा मिलाने वाले रहमान की जनवरी 1999 में कारखाने के प्रदूषण से हुए कैंसर से मौत हो गई थी. इसके विरोध में एक अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की गई. मई 1999 में कारखाने ने उत्पादन बंद कर दिया और 2001 में इसे बंद करने की औपचारिक घोषणा कर दी गई.

हालांकि अब इलाके की हवा सल्फाइड की तीखी दुर्गंध से रहित है मगर इस हवा ने जिन लोगों को नुकसान पहुंचाया उन पीड़ितों को मुआवजा मिलना अब भी बाकी है. सुरेंद्रनाथ कहते हैं, “फैक्ट्री बंद होने से हर कोई खुश है मगर कोई भी कंपनी से मुआवजा देने के लिए नहीं कह रहा. शायद इसके लिए एक और संघर्ष छेड़ने की दरकार पड़े.”

आभार - http://www.tehelkahindi.com

ताकि वह झिलमिलाती रहे

उत्तराखंड के झिलमिल झील आरक्षित वन क्षेत्र में प्राकृतिक वन संपदा के अन्वेषण के दौरान विभिन्न प्राकृतिक वानस्पतिक प्रजातियां चिह्नित की गई हैं। यह क्षेत्र एक नवसृजित संरक्षित क्षेत्र है और इसके बारे में अभी कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है। रचना तिवारी अपने इस लेख में राज्य के तराई क्षेत्र की जैव-विविधता के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता बता रही हैं
झिलमिल झील कटोरीनुमा दलदली क्षेत्र है जो उत्तराखंड में हरिद्वार वन प्रभाग के चिड़ियापुर क्षेत्र में गंगा नदी के बायें तट पर स्थित है। यह झील लगभग 3783.5 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है। जैव-विविधता से भरपूर इस क्षेत्र में हिरणों की पांच प्रजातियां (चीतल, सांभर, काकड़, बारहसिंघा, पाड़ा) हाथी, नीलगाय, तेंदुआ, व बाघ इत्यादि जानवर बहुलता से पाये जाते हैं। सर्दी के मौसम में यहां प्रवासी पक्षी भी आते हैं। यहां लगभग 160 प्रकार के स्थायी व प्रवासी पक्षी पाये जाते हैं। यह क्षेत्र अपनी उत्पादकता के कारण कृषि के लिए भी उपयोगी है तथा बारहसिंघे की एक प्रजाति के लिए प्रसिध्द है। किंतु वन विभाग द्वारा क्षेत्र में अधिक मात्रा में यूकेलिप्टस वृक्षों के रोपण से बारहसिंघों का यह प्राकृतिक आवास सिकुड़ता जा रहा है। झिलमिल झील इस प्रजाति के लिए अंतिम आश्रय स्थल है। अगस्त 2005 में राज्य सरकार ने पारिस्थितिकी, प्राणि जगत, वनस्पति एवं भू-विविधता के आधार पर इसे संरक्षित क्षेत्र घोषित किया है।
बारहसिंघे पहले गंगा व ब्रह्मपुत्र के तटीय वनों में पाये जाते थे। यह प्रजाति सदाबहार दलदली वनों में रहने की आदी है। बढ़ते मानवीय दखल से सिकुड़ते जा रहे वन क्षेत्र के कारण ये बारहसिंघे भी सिमट गए हैं और लुप्त होने की कगार पर हैं।
बारहसिंघे को आईयूसीएन (इंटरनैशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सेस) द्वारा संकटग्रस्त प्रजाति घोषित किया गया है। पिछली शताब्दी में इनकी संख्या काफी थी किंतु अब शोचनीय दशा तक घट चुकी है। बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप और 'विकास कार्यों' के कारण इनके प्राकृतिक आवास सिमटते जा रहे हैं। झिलमिल झील इस संदर्भ में विशेष संवेदनशील है। यह पर्यावरणविदों के लिए चिंता का बड़ा विषय है।
झिलमिल झील गूजरों व स्थानीय निवासियों की मिलीजुली आबादी वाला क्षेत्र है। ये लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों की पूर्ति के लिये इन्हीं जंगलों पर निर्भर हैं तथा कृषि व पशुपालन के परंपरागत कार्यों के अलावा मत्स्यपालन, केकड़ा व घोंघा पालन, जड़ी-बूटी उत्पादन इत्यादि का कार्य करते हैं। गांव के लोगों ने इस झील के संरक्षण के लिए जिम्मेदार भूमिका निभायी है। संरक्षण जैसे शब्द से परिचित न होने के बावजूद ये लोग मानव व प्रकृति के सहज रिश्तों व प्राकृतिक नियमों से भलीभांति परिचित हैं।
वन्य जंतुआें की समृध्द विविधता के अतिरिक्त यह क्षेत्र वानस्पतिक विविधता से भी परिपूर्ण है। पिछले दो साल में बारहसिंघों के भोजन व रहन-सहन के तरीकों पर शोध के दौरान इस लेखिका ने कई ऐसी पादप प्रजातियों को चिह्नित किया जिनके इस क्षेत्र में होने की विस्तृत व व्यवस्थित जानकारी पहले उपलब्ध नहीं थी। ये प्रजातियां न सिर्फ औषधीय रूप से, बल्कि यहां के जीव जंतुओं के लिए भी उपयोगी हैं। वस्तुत: यहां का जैव व वानस्पतिक वैविध्य प्रकृति-जीव व मानव के सह-अस्तित्व का अनूठा उदाहरण है और इसे हर हाल में संरक्षित व संवर्धित किये जाने की आवश्यकता है। इससे न सिर्फ पर्यावरणीय संतुलन को बनाये रखने, बल्कि इस क्षेत्र के निवासियों के पारम्परिक जीवन व आजीविका के संवर्धन में भी सहायता मिलेगी। यहां के निवासी अपनी विभिन्न आवश्यकताओं जैसे- चारा, रेशा, ईंधन, जड़ी-बूटियां, इमारती लकड़ी इत्यादि के लिए इसी जंगल पर प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से निर्भर हैं।
जैव-विविधता की प्रचुरता व प्राकृतिक सौंदर्य के कारण इस क्षेत्र में इको-टूरिज्म को भी प्रोत्साहित किया जा सकता है। इससे इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए स्थायी रोजगार की संभावनाओं में वृध्दि होगी। साथ ही औषधीय पादपों के उचित संरक्षण व संवर्धन के लाभ भी उन तक पहुंच सकेंगे। यूकेलिप्टस की जगह मिश्रित वृक्षों के रोपण पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि जीव-जंतुओं को सहज प्राकृतिक वातावरण मिल सके। शासन द्वारा इस दिशा में प्रयास जरूर किए जा रहे हैं, पर वे पर्याप्त नहीं हैं। उन्हें व्यवस्थित कर उनमें जनसहभागिता को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये। इसके साथ ही इस क्षेत्र में वन गूजरों के स्थायी पुनर्वास की भी आवश्यकता है, ताकि जंगल को अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप से बचाया जा सके।
हिमालय की तराई में इस तरह के वन न सिर्फ जैव-विविधता की दृष्टि से उपयोगी हैं, बल्कि इस क्षेत्र में आवश्यक नमी बनाये रखने में भी सहायक हैं। इसके फलस्वरूप हिमालयी क्षेत्र में वर्षा के लिए आवश्यक स्थितियां बनी रहती हैं। वस्तुत: ये वन संपूर्ण उत्तर भारत की जलचक्रीय इकाई का अभिन्न अंग है। अत: इनके विकास और संरक्षण की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। जलवायु परिवर्तन व अधांधुध दोहन की प्रवृत्ति इन्हें संकट की ओर धकेल रही है। इसके चलते न सिर्फ वन नष्ट होते जा रहे हैं बल्कि संपूर्ण हिमालय भी गहरे पर्यावरणीय संकट से जूझ रहा है। हिमालय का यह संकट संपूर्ण दक्षिण एशिया की मानव सभ्यता का संकट है। अत: इस क्षेत्र व इसी तरह के अन्य वन क्षेत्रों के उचित संरक्षण व संवर्धन की महती आवश्यकता है।

संदर्भबाबू, सी.आर. (1997). हरबेशियस फ्लोरा ऑफ देहरादून, सीएसआईआर पब्लिकेशन, नई दिल्ली
बाबू, एम.एम. इत्यादि (1999), फ्लोरा ऑफ डबल्यूआईआई कैम्पस, चंद्रबणी
गौड़, आर.डी. (1999). फ्लोरा ऑफ द डिस्ट्रिक्ट गढ़वाल नार्थ वेस्ट हिमालया विद एथनोबॉटनिकल नोट्स, ट्रांसमीडिया, 811 पृष्ठ
मेसन, डी., मारबर्गर, जे.ई., अजीत कुमार, सी.आर. तथा प्रसाद, वी.पी. (1996). इलेस्टे्रटड फ्लोरा ऑफ केवलादेव नैशनल पार्क, भरतपुर, राजस्थान। ऑक्फोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, मुम्बई
नोट: नव चिह्नित पादप प्रजातियों की सूची यहां नहीं दी जा रही है। इसके लिए लेखिका रचना तिवारी से ईमेल पर संपर्क करें:

lucygray@gmail.com

पानी की फिक्र : दस मई से पहले धान की नर्सरी नहीं

जैसे-जैसे औद्योगिक इकाइयों की तादाद, किसानों में नकदी फसल उगाने और शीतल पेय कंपनियों की होड़ बढ़ती गई है, भूजल का दोहन तेज हुआ है। इसके चलते बहुत से इलाके बिल्कुल सूख गए हैं। वहां जमीन से पानी खींचना नामुमकिन हो गया है। अनेक क्षेत्रों में जल्दी ही ऐसी स्थिति पैदा होने की आशंका जताई जाने लगी है। भूजल संरक्षण के लिए कुछ राज्य सरकारें छिटपुट उपाय तो करती नजर आती हैं, मगर संकट के मुकाबले यह बहुत कम है। दिल्ली सरकार ने कुछ साल पहले नए नलकूप लगाने पर प्रतिबंध लगा दिया और पहले से मौजूद नलकूपों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के मकसद से शुल्क की दर बढ़ा दी। अब पंजाब सरकार ने सिंचाई के नलकूपों के मनमाने इस्तेमाल करने पर लगाम लगाने की पहल की है। उसने एक अध्यादेश जारी कर दस मई से पहले धान की नर्सरी लगाने और पंद्रह जून से पहले रोपाई शुरू करने पर रोक लगा दी है। अगर कोई किसान ऐसा करता पाया जाएगा तो उसे दस हजार रुपये तक का जुर्माना देना पड़ सकता है। दरअसल, पंजाब में जल्दी धान उगाने की होड़ के चलते बहुत से किसान समय से पहले नर्सरी लगाना और रोपाई करना शुरू कर देते हैं। इससे गर्मी के मौसम में पानी का दोहन काफी बढ़ जाता है। अगर यही काम मानसून आने पर किया जाए तो भू- जल की खपत काफी कम हो जाती है। भू जल पर मंडराने वाले खतरे को पंजाब विश्वविद्यालय के कृषि विशेषज्ञों ने काफी पहले भांप लिया था। अठारह साल पहले ही उन्होंने राज्य सरकार को सुझाव दिया था कि नलकूपों के अंधाधुंध इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए धान की खेती से संबंधित दिशा- निर्देश जारी किए जाएं। मगर राज्य सरकार को अब आकर इसकी सुध आई है जब पंजाब के एक सौ आठ ब्लॉक शुष्क घोषित किए जा चुके हैं।

पंजाब सरकार के ताजा कदम से राज्य में भूजल के बेहिसाब दोहन पर निश्चय ही कुछ लगाम लगेगी। मगर यह उपाय बिल्कुल नाकाफी है। सिंचाई के अलावा भूजल का सबसे ज्यादा दोहन औद्योगिक इकाइयों के लिए यिका जाता है। शीतल पेय और बोतलबंद पानी के कारोबार और कपड़े की रंगाई- धुलाई वगैरह करने वाले कारखानों में भी बड़े पैमाने पर भूल का इस्तेमाल होता है। कई अध्ययनों से जाहिर हो चुका है कि जिन क्षेत्रों में शीतल पेय बनोन के संयंत्र लगे हैं वहां जमीनी पानी का स्तर काफी नीचे चला गया है। इसे लेकर स्थानीय लोगों के विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। कुछ राज्यों ने औद्योगिक इकाइयों में जलशोधन संयंत्र लगाने की अनिवार्यता जरूर लागू की है, मगर इन कंपनियों के मनमाने भू जल दोहन पर रोक लगाने के मद्देनजर कोई व्यावहारिक और पारदर्शी दिशा- निर्देश अब तक नहीं तैयार किया जा सका है। रोजमर्रा के उपयोग लागय पानी की उपलब्धता लगातार कम होते जाना गंभीर चिंता का विषय है। जिन इलाकों में धरती के नीचे पानी है भी वह खेतों में रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग के चलते तेजी से प्रदूषित हो रहा है। लिहाजा, धान की खेती को नियंत्रित करने जैसे हल्के उपायों से भूजल को बचाने का दावा नहीं किया जा सकता। पारंपरिक जल- स्रोतों के संरक्षण के साथ ही सिंचाई और औद्योगिक इकाइयों के लिए हो रही पानी की खपत को नियंत्रित करना होगा।

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