सुरंगों का गुरुकुल : श्री पद्रे


अनुवाद - मीनाक्षी अरोरा
कर्नाटक के दक्षिण कन्न जिले का मनिला गांव और केरल का कासरगोड जिला आजकल सुरंगों के गुरुकुल बन रहे हैं। मनिला में अच्युथ भट पानी की गुफाएं तैयार कर रहे हैं। हालांकि उनकी उम्र 79 साल हो गई है लेकिन पानी की गुफाए बनाने के लिए उनके जोश ने उन्हें आज भी युवाओं से ज्यादा जवान बना रखा है। उनकी पानी की सुरंगे पानी की आपूर्ति करती हैं। अच्युथ भट में सिर्फ सुरंगे बनाने का ही जोश नहीं है बल्कि वे स्थानीय किसानों और युवकों को सुरंग खोने का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। इस किसान परिवार ने एक बार फिर से जमीन से पानी निकालने के परम्परागत तरीकों को पुनर्जीवित किया है। दक्षिण कन्नड जिले के आस-पास रहने वाले किसानों को अब पानी की कोई कमी नहीं है।
अच्युथ भट के परिवार ने अपनी जमीन में ही 20 सुरंगे बना रखी हैं, जिनमें से 14 सुरंगें उनकी जरूरत को पूरा कर रही हैं। इनसे उन्हें केवल सिंचाई के लिए ही नहीं बल्कि पीने और रोजमर्रा के घरेलू कामों के लिए भी पर्याप्त मात्रा में पानी मिल जाता है। इतना ही नहीं उन्हें पानी लेने के लिए कोई बिजली या एक पैसा तक खर्च नहीं करना पड़ता क्योंकि वहां पानी को बहने के लिए बिजली-पानी नहीं गुरुत्वाकर्षण चाहिए। है न आश्चर्यजनक! कि पानी अपने आप गुरुत्वाकर्षण से बहता है।
कई साल पहले इस परिवार को 15 एकड़ का बंजर पहाड़ी ढाल मिला जहां आप भी 5 एकड़ पर नारियल और .... के पेड़ लहलहा रहे हैं, यही बंजर पहाड़ी ढाल आज सुरंगों से भरा है। दरअसल यहां की मिट्टी और ढाल की वजह से कुंए जैसी कोई भी व्यवस्था पानी के लिए नहीं बनाई जा सकती। अच्युथ भट के बेटे काविन्दा भट ने बड़े ही उत्साह से कहा कि अगर कभी पानी की कमी महसूस होगी तो हम और एक नई सुरंग बना लेंगे।
अच्युथ भट के परिवार की लगन और साहस को देखते हुए गांव वाले भी यह कहते नहीं थकते कि वे तो हर साल एक नई सुरंग बना लेते हैं। दूसरी ओर अच्युथ भट भी गांव वालों को सम्मान देते हुए कहते हैं कि यह तो उनका बड़प्पन है। असल में तो हम हर चौथे साल एक सुरंग बना लेते हैं।
मनिला गांव के मनिमूले नाम के इस क्षेत्र में किसानों और खेतिहर मजदूरों के करीब 20 परिवार रहते हैं और सभी के पास सुरंग हैं जो पर्याप्त मात्रा में पानी देती हैं।
वहां की जमीन ढालू होने की वजह से खेती के लिए अलग-अलग ऊंचाई पर लेवल बनाने पड़ते हैं। ऐसे में अच्युथ भट ने सिंचाई का जो तरीका खोजा है वह वाकई सुनियोजित और विकेंद्रीकृत तकनीक है। जमीन का लेवल करने से पहले वे एक सुरंग खोदते हैं जो प्लॉट से करीब 25 फुट ऊपर होती है जब उसमें पानी आने लगता है तब लेवलिंग शुरू कर दी जाती है। सुरंग से बाहर पानी आते ही उसे मिट्टी के टैंक में इकट्ठा कर लिया जाता है और फिर उपेज रमजे से सिंचाई की जाती है। फिलहाल उनके पास पानी के 6 टैंक हैं, जिनमे ंसे कुछ तो आपस में जुड़े हुए हैं।
पहले अच्युथ भट का घर निचाई पर था, जहां सुरंग से बड़ी आसानी से पानी मिल जाता था लेकिन नया घर बनते ही सुरंग से पानी का दबाव कम हो गया तो उन्होंने ऊंचाई पर एक सुरंग बनाई जिससे उनके पूरे घर के नलों में बड़ी आसानी से हमेशा ताजा पानी आता रहता है। तभी वह गर्व से कहते हैं- हमें 50 कोल, (2.5 फुट त्रएक कोलु) पर ही पानी मिल जाता है वो भी किफायती खर्चों में। क्योंकि एक 50 कोलु सुरंग के लिए वर्तमान मजदूरी दर को देखते हुए सिर्फ 15,000 रुपये की लागत लगती है इसके बाद कोई खर्चा नहीं करना पड़ता न डीजल लाना पड़ता है और न ही बिजली जाने की कोई चिंता करनी पड़ती है। एक बार थोड़ा सा खर्चा फिर 'नो टेंशन'ं।
अच्युथ भट ने कभी बचपन में केरल के मलयाली मोपलाओं को पहली बार सुरंग खोदते देखा था। अच्युथ भट और उसे पिता इससे प्रभावित हुए, इस तरह भट परिवार ने सुरंग खोदने की तकनीक सीखी और फिर सबको सिखाते चले गए, आज तक उनके कदम इस राह पर नहीं थमे। उन्होंने एक-एक करके तकनीक से हट पहलू पर महारथ हासिल की यहां तक कि खतरा जानकर सुरंगों की दिशा मोड़ देने की कला भी उन्होंने हासिल कर ली है।
आज मनिला गांव में 300 से भी ज्यादा सुरंगे हैं। यहां केवल 480 घर हैं और आधे घरों के पीने के पानी के लिए कम से कम एक सुरंग तो है ही। अच्युथ भट का मानना है कि सुरंग खोदना कोई ऐसी कला नहीं है जिसे हर कोई सीख सके। बल्कि इसके लिए कड़ी मेहनत और जरूरी ज्ञान की जरूरत है। सबसे मजे की बात तो यह है कि उसने इस काम के लिए कभी भी व्यवसायियों से बात नहीं की बल्कि सामान्य कामगारों को ही मजदूरी पर इस काम के लिए लगाया, इससे फायदा यह हुआ कि अब तक तकरीबन 24 खेतिहर मजदू इस कला को सीख गए हैं। जिन लोगों ने यहां सुरंग खोदना सीखा है वे और ज्यादा सुरंगे बनाएंगे। सचमुच मनिला गांव आज 'सुरंगों का गुरुकुल' बन गया है।
पानी कहा है और सुरंग कहां खोदनी है, इसका पता पेड़ों और दीमक की बांबी को देखकर लगाते हैं। इतनी उम्र में भी उनमें इतना जोश है कि जब मजदूर सुरंग का काम खत्म करके बाहर निकलते हैं तो अच्युथ भट उनके बाद सुरंग में जाकर करीब आधा घंटा खुदाई करते हैं। उनका यह जोश और लगन गांव में कभी पानी की कमी नहीं होने देगा।
लेकिन अफसोस! सुरंग खोदने की यह पुरानी कला आज कई गांवों में मौत के कगार पर खड़ी है। विज्ञान और तकनीकी के इस युग में बड़ी-बड़ी बोरिंग मशीनें आ गई हैं जो केवल एक दिन में ही कुंआ खोद देती हैं। सुरंग खोदने की कला जानने वाले कामगारों की तादाद घटती जा रही है, क्योंकि उन्हें 'रबड़ वृक्षारोपण' जैसे कामों में अच्छा पैसा मिल रहा है। सुरंग खोदने में खतरे भी हैं, पहले भी सुरंगों के ढहने से कई मौतें हो चुकी हैं। फिर भी केरल के मनिला और बायरू गांव में यह कला नया जीवन पा रही है। गोविन्द भट को भी यकीन है कि यह कला कभी नहीं मर सकती और सुरंग खोदने वालों की कमी की वजह से तो कभी मर ही नहीं सकती। इन गांवों की खास बात यह है कि यहां आधे से ज्यादा घरों के या तो पीछे या आगे पहाड़ियां हैं जो सुरंग खोदने के लिए बहुत अच्छी स्थिति है और भी सुरंगे खोदी जा सकती हैं।
अच्युथ भट इस बात पर हैरान हैं कि बैंक इस काम के लिए कर्ज क्यों नहीं देते। अगर बैंक पैसा देना शुरू कर दें तो और ज्यादा लोग इस पुरानी परम्परा को जीवित करने में जुट जाएंगे। बैंक को बोरिंग मशीनों से कुंए बनाने के बाजय इस टिकाऊ और किफायती तकनीक पर पैसा लगाना चाहिए। मनिला का उदाहरण देते हुए गोविंद भट ने बताया कि यहां तकरीबन 200 बोरिंग हैं, लेकिन उनमें से केवल करीब 12 से ही पानी मिल पाता है।
सचमुच विज्ञान और तकनीकी के इस युग में पुरानी परम्परा को जीवित करके अच्युथ भट ने आने वाली कई पीढ़ियों का वरदान दिया है। एक ऐसी तकनीक जहां न बिजली का खर्चा है ना डीजल का, सिर्फ गुरुत्व काम करता है- कई लोगों को सुरंग खोदना सिखाकर भट परिवार ने यह साबित कर दिया कि उनका गांव 'सुरंगों का गुरुकुल' है। हालांकि इस कला को जीवित रखने के वैज्ञनिक तौर पर अध्ययन- अध्यापन किया जाना चाहिए। ताकि भारत एक किफायती तकनीक को जीवित रखने के साथ-साथ बिजली, पानी के खर्चे से भी बचा सके। सुरंगों की कला को सीखने और जीवित रखने के लिए जरूरत है- मनिला, पाहे और कासरगोड के 'सुरंगों के गुरुकुल' में।
हालांकि पश्चिमी घाटों पर वर्षा की कोई कमी नहीं है फिर भी कई इलाकों में आज भी पानी की कमी है। इस समस्या का समाधान करने में एक ओर जहां मनिला के लोग जुटे हैं, वहीं केरल के कासरगोड जिले में भी पानी के लिए जद्दोजहद चल रही है। कासरगोड में साल भर में 3500 मिमी वर्षा होती है यानी प्रति एकड़ 14 मिलियन लीटर। इतनी बारिश के बावजूद भी यहां एक ऐसा इलाका भी है जिसे 'ब्लैक जोन' कहा जाता है। यहां भी पानी के लिए सुरंग बनाने की मुहिम जारी है।
जमीनी पानी को एक जगह रोककर सुरंग के जरिए निकाला जाता है। इसके बाद गुफा की सतह पर बने ढाल के द्वारा आगे ले जाया जाता है। यह ढाल सुरंग के मुंह की तरफ होता है। इससे फायदा यह है कि पानी बिना किसी पम्प की सहायता से बाहर आ जाता है। किसी भी तरह की अनहोनी से बचने के लिए कभी-कभी पाइपों को सुरंगों के सामने वाले हिस्से से लगा दिया जाता है। इन सुरंगों से इस क्षेत्र में बिल्कुल साफ पानी आता है। इसे सिंचाई के साथ-साथ पीने में भी इस्तेमाल किया जाता है।
वर्षा ऋतु में जब पानी का बहाव तेज और ऊंचाई पर होता है तब जहां सुरंगों से सीधे पानी लिया जाता है, वहां पानी को मिट्टी के एक टैंक में इकट्ठा कर लिया जाता है। इन टैंकों में खेतों की सिंचाई के लिए नालियां बना दी जाती हैं या फिर स्प्रिंकलर जेट का इस्तेमाल किया जाता है।
अब सवाल यह उठता है कि कुंए और सुरंग दोनों से ही जमीनी पानी को निकाला जा सकता है तो फिर लोग सुरंगों को ही क्यों प्राथमिकता दे रहे हैं? दरअसल! यह सब जमीन पर निर्भर करता है। पहाड़ी और ढालू क्षेत्रों में सुरंगे बनाना ही प्राकृतिक रूप से उचित है। तलहटी में रहने वाले लोग सुरंग बनाकर पानी ले सकते हैं, लेकिन चोटी पर रहने वाले लोग सुरंग नहीं बना सकते, क्योंकि उनके लिए ऊपर कोई ढाल नहीं है। जहां से पानी नीचे आ सके।
कुंए और सुरंगों के बीच पैसा भी एक बड़ा कारण है। कुंआ खोदने में मजदूरों की जरूरत होगी, जिसके लिए बहुत सारा धन खर्च करना पड़ता है लेकिन सुरंग को तो बाप-बेटा या दो भाई भी मिलकर बना सकते हैं वे इस काम को अपने फालतू वक्त या रात में भी कर सकते हैं। अगर गरीब किसान या खेतिहर अपने घर के लेवल से ऊपर पहाड़ी पर सुरंग नहीं खोद सकता तो वो नीचे लेवल से ऊपर पहाड़ी पर सुरंग खोदकर पानी को ऊपर ला सकता है।
सुरंगों की दीवारों पर लैटराइट मिट्टी की वजह से सुंदर ढंग दिखाई देते हैं उस पर सजावट नहीं की जाती है, लेकिन कुल्हाड़ी और चोट से उन पर खुद ब खुद सुन्दर डिजाइन उभरने लगता है। सुरंगों की लंबाई को कोलु में मापा जाता है। यहां एक सुरंग 150 कोलु (375 फुट) की है।
सुरंगों के लिए लैटराइट मिट्टी का होना जरूरी है। इस पर ताममान का असर नहीं होता। कड़ी गर्मी में भी यह सुरंग के अंदर वातानुकूलन बनाए रखती है। इससे सुरंग में गर्मी में भी ठंडक देती है। पानी भी ठंडा रहता है लेकिन सुरंगों में गर्मी में पानी का स्रोत या तो सूख जाता है या कम हो जाता है।
कासरगोड जिले में पाहे गांव में लगभग 100 घर हैं और 2000 से भी ज्यादा सुरंगों का इस्तेमाल किया जा रहा है यानी औसतन एक घर 2 सुरंगों का इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि यह संख्या अलग-अलग है। करीब 200 परिवारों के पास 4 से 6 सुरंगें हैं और कुछ परिवार ऐसे भी हैं जिनके पास एक भी नहीं है।
कासरगोड जिला मुख्यालय से 40 किमी दूर बायारू गांव में तो और भी ज्यादा सुरंगे हैं। गांव की 40 फीसदी सिंचाई सुरंगों से होती है। पूरे तौर पर देखें तो जिले में 6000- 7000 सुरंगें हैं।

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