राजस्थान की प्रमुख झीलें
राहुल तनेगारिया
राजस्थान में मीठे पानी और खारे पानी की दो प्रकार की झीलें हैं। खारे पानी की झीलों से नमक तैयार किया जाता है। मीठे पानी की झीलों का पानी पीने एंव सिंचाई के काम में आता है।
मीठे पानी की झीले -राजस्थान में मीठे पानी की झीलों में जयसमन्द, राजसमन्द, पिछोला, आनासागर, फाईसागर, पुष्कर, सिलसेढ, नक्की, बालसमन्द, कोलायत, फतहसागर व उदयसागर आदि प्रमुख है।
१) जयसमन्द - यह मीठे पानी की सबसे बड़ी झील है। यह उदयपुर जिले में स्थित है तथा इसका निर्माण राजा जयसिंह ने १६८५-१६९१ ई० में गोमती नदी पर बाँध बनाकर करवाया था। यह बाँध ३७५ मीटर लंबा और ३५ मीटर ऊँचा है। यह झील लगभग १५ किलोमीटर लंबी और ८ किलोमीटर चौड़ी है। यह उदयपुर से ५१ किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। इसमें करीब ८ टापू हैं जिसमें भील एंव मीणा जाति के लोग रहते हैं।
इस झील से श्यामपुर तथा भाट नहरे बनाई गई हैं। इन नहरों की लंबाई क्रमश: ३२४ किलोमीटर और १२५ किलोमीटर है।
इस झील में स्थित बड़े टापू का नाम 'बाबा का भागड़ा' और छोटे टापू का नाम 'प्यारी' है। इस झील में ६ कलात्मक छतरियाँ एंव प्रसाद बने हुए हैं जो बहुत ही सुन्दर हैं। झील पहाड़ियों से घिरी है। शांत एंव मनोरम वातावरण में इस झील का प्राकृतिक सौंदर्य मनोहरी है जो पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केन्द्र है।
२) राजसमन्द - यह उदयपुर से ६४ किलोमीटर दूर कांकरौली स्टेशन के पास स्थित है। यह ६.५ किलोमीटर लंबी और ३ किलोमीटर चौड़ी है। इस झील का निर्माण १६६२ ई० में उदयपुर के महाराणा राजसिंह के द्वारा कराया गया। इसका पानी पीने एंव सिचाई के काम आता है। इस झील का उत्तरी भाग नौ चौकी के नाम से विख्यात है जहां संगमरमर की २५ शिला लेखों पर मेंवाड़ का इतिहास संस्कृत भाषा में अंकित है।
३) पिछोला झील - यह उदयपुर की सबसे प्रसिद्ध और सुन्दरतम् झील है। इसके बीच में स्थित दो टापूओं पर जगमंदिर और जगनिवास दो सुन्दर महल बने हैं। इन महलों का प्रतिबिंब झील में पड़ता है। इस झील का निर्माण राणा लाखा के शासन काल में एक बंजारे ने १४वीं शताब्दी के अंत में करवाया था। बाद में
इसे उदय सिंह ने इसे ठीक करवाया। यह झील लगभग ७ किलोमीटर चौड़ी है।
४) आनासागर झील - ११३७ ई० में इस झील का निर्माण अजमेर के जमींदार आना जी के द्वारा कराया गया। यह अजमेर में स्थित है। यह दो पहाड़ियों के बीच में बनाई गई है तथा इसकी परिधि १२ किलोमीटर है। जहाँगीर ने यहाँ एक दौलत बाग बनवाया तथा शाहजहाँ के शासन काल में यहां एक बारादरी का निर्माण हुआ। पूर्णमासी की रात को चांदनी में यह झील एक सुंदर दृश्य उपस्थित करती है।
५) नक्की झील - यह एक प्राकृतिक झील है तथा यह माउंट आबू में स्थित है। यह झील लगभग ३५ मीटर गहरी है। यह झील का कुल क्षेत्रफल ९ वर्ग किलोमीटर है। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण पर्यटकों का मुख्य केन्द्र है।
६) फाई सागर - यह भी एक प्राकृतिक झील है और अजमेर में स्थित है। इसका पानी आना सागर में भेज दिया जाता है क्योंकि इसमें वर्ष भर पानी रहता है।
७) पुष्कर झील - यह अजमेर से ११ किलोमीटर दूर पुष्कर में स्थित हैं। इस झील के तीनों ओर पहाड़ियाँ है तथा इसमें सालों भर पानी भरा रहता है। वर्षा ॠतु में यहां का प्राकृतिक सौंदर्य अत्यंत मनोहारी एंव आकर्षक लगता है। झील के चारों ओर स्नान घाट बने है। यहां ब्रह्माजी का मंदिर है। यह हिन्दुओं का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। यहां हर साल मेला लगता है।
८) सिलीसेढ़ झील - यह एक प्राकृतिक झील है तथा यह झील दिल्ली-जयपुर मार्ग पर अलवर से १२ किलोमीटर दूर पश्चिम में स्थित है। यह झील सुंदर है तथा पर्यटन का मुख्य स्थल है।
९) बालसमन्द झील - यह झील जोधपुर के उत्तर में स्थित है तथा इसका पानी पीने के काम में आता है।
१०) कोलायत झील - यह झील कोलायत में स्थित है जो बीकानेर से ४८ किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। यहां कपिल मुनि का आश्रम है तथा हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के दिन मेला लगता है।
११) फतह सागर - यह पिछोला झील से १.५ किलोमीटर दूर है। इसका निर्माण राणा फतह सिंह ने कराया था। यह पिछोला झील से निकली हुई एक नहर द्वारा मिली है।
१२) उदय सागर - यह उदयपुर से १३ किलोमीटर दूर स्थित है। इस झील का निर्माण उदयसिंह ने कराया था।
खारे पानी की झील
१) साँभर झील - यह राजस्थान की सबसे बड़ी झील है। इसका अपवाह क्षेत्र ५०० वर्ग किलोमीटर में फैला है। यह झील दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम की ओर लगभग ३२ किलोमीटर लंबी तथा ३ से १२ किलोमीटर तक चौड़ी है। ग्रीष्मकाल में वाष्पीकरण की तीव्र दर से होने के कारण इसका आकार बहुत कम रह जाता है। इस झील में प्रतिवर्ग किलोमीटर ६०,००० टन नमक होने का अनुमान है। इसका क्षेत्रफल १४५ वर्ग किलोमीटर है। इसके पानी से नमक बनाया जाता है। यहां सोड़ियम सल्फेट संयंत्र स्थापित किया गया है जिससे ५० टन सोड़ियम सल्फेट प्रतिदिन बनाया जाता है। यह झील जयपुर और नागौर जिले की सीमा पर स्थित है तथा यह जयपुर की फुलेरा तहसील में पड़ता है।
२) डीड़वाना झील - यह खारी झील नागौर जिले के डीड़वाना नगर के समीप स्थित है। यह ४ किलोमीटर लंबी है तथा इससे भी नमक तैयार किया जाता है। डीड़वाना नगर से ८ किलोमीटर दूर पर सोड़ियम सल्फेट का यंत्र लगाया गया है। इस झील में उत्पादित नमक का प्रयोग बीकानेर तथा जोधपुर जिलों में किया जाता है।
३) पंचभद्रा झील - बाड़मेर जिले में पंचभद्रा नगर के निकट यह झील स्थित है। यह लगभग २५ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर स्थित है। यह झील वर्षा के जलपर निर्भर नही है बल्कि नियतवाही जल श्रोतों से इसे पर्याप्त खारा जल मिलता रहता है। इसी जल से नमक तैयार किया जाता है जिसमें ९८ प्रतिशत तक सोड़ियम क्लोराइड़ की मात्रा है।
४) लूणकरण सागर - यह बीकानेर जिले के उत्तर-पूर्व में लगभग ८० किलोमीटर दूर स्थित है। इसके पानी में लवणीयता की कमी है अत: बहुत थोड़ी मात्रा में नमक बनाया जाता है। यह झील ६ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली है।
जिलानुसार राजस्थान की झीलें
जिला झीलें/बांध
अजमेर - आना सागर, फाई सागर, पुष्कर, नारायण सागर बांध
अलवर - राजसमन्द, सिलीसेढ़
बाँसवाड़ा - बजाज सागर बांध, कहाणा बांध
भरतपुर - शाही बांध, बारेण बांध, बन्ध बरेठा बांध
भीलबाड़ा - सरेपी बांध, उन्मेद सागर, मांड़लीस, बखड़ बांध, खाड़ी बांध, जैतपुर बांध
बीकानेर - गजनेर, अनुप सागर, सूर सागर, कोलायतजी
बूंदी - नवलखाँ झील
चित्तौड़गढ़ - भूपाल सागर, राणा प्रताप सागर
चुरु - छापरताल
धौलपुर - तालाबशाही
डूंगरपुर - गौरव सागर
जयपुर - गलता, रामगढ़ बांध, छापरवाड़ा
जैसलमेर - धारसी सागर, गढ़ीसर, अमर सागर, बुझ झील
जोधपुर - बीसलपुर बांध, बालसमन्द, प्रताप सागर, उम्मेद सागर, कायलाना, तख्त सागर, पिचियाक बांध
कोटा - जवाहर सागर बांध, कोटा बांध
पाली - हेमा बास बांध, जवाई बांध, बांकली, सरदार समन्द
सिरोही - नक्की झील (आबू पर्वत)
उदयपुर - जयसमन्द, राजसमन्द, उदयसागर, फतेह सागर, स्वरुप सागर और पिछोला।
कुमाऊँ मंडल में नैनीताल के अलावा अन्य ताल
भीमताल
भीमताल (१,३७१ मीटर) इस अंचल का बड़ा ताल है। इसकी लम्बाई ४४८ मीटर, चौड़ाई १७५ मीटर गहराई १५ से ५० मीटर तक है। नैनीताल से भी यह बड़ा ताल है। नैनीताल की तरह इसके भी दो कोने हैं जिन्हें तल्ली ताल और मल्ली ताल कहते हैं। यह भी दोनों कोनों सड़कों से जुड़ा हुआ है। नैनीताल से भीमताल की दूरी २२.५ कि. मी. है।
भीमताल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सुन्दर घाटी में ओर खिले हुए अंचल में स्थित है। इस ताल के बीच में एक टापू है, नावों से टापू में पहुँचने का प्रबन्ध है। यह टापू पिकनिक स्थल के रुप में प्रयुक्त होता है। अधिकाँश सैलानी नैनीताल से प्रातछ भीमताल चले जाते हैं। टापू में पहुँचकर मनपसन्द क भोजन करते हैं और खुले ताल में बोटिंग करते हैं। इस टापू में अच्छे स्तर के रेस्तरां हैं। उत्तर प्रदेश के मत्सय विभाग की ओर से मछली के शिकार की भी यहाँ अच्छी सुविधा है।
नैनीताल की खोज होने से पहले भीमताल को ही लोग महत्व देते थे। 'भीमकार' होने के कारण शायद इस ताल को भीमताल कहते हैं। परन्तु कुछ विद्वान इस ताल का सम्बन्ध पाण्डु - पुत्र भीम से जोड़ते हैं। कहते हैं कि पाण्डु - पुत्र भीम ने भूमि को खोदकर यहाँ पर विशाल ताल की उत्पति की थी। वैसे यहाँ पर भीमेशवर महादेव का मन्दिर है। यह प्राचीन मन्दिर है - शायद भीम का ही स्थान हो या भीम की स्मृति में बनाया गया हो। परन्तु आज भी यह मन्दिर भीमेशेवर महादेव के मन्दिर के रुप में जाना और पूजा जाता है।
भीमताल उपयोगी झील भी है। इसके कोनों से दो-तीन छोटी - छोटी नहरें निकाली गयीं हैं, जिनसे खेतों में सिंचाई होती है। एक जलधारा निरन्तर बहकर 'गौला' नदी के जल को शक्ति देती है। कुमाऊँ विकास निगम की ओर से यहाँ पर एक टेलिवीजन का कारखाना खोला गया है। फेसिट एशिया के तरफ से भी टाइपराइटर के निर्माण की एक युनिट खोली गयी है। यहाँ पर पर्यटन विभाग की ओर से ३४ शैैयाओं वाला आवास - गृह बनाया गया है। इसके अलावा भी यहाँ पर रहने - खाने की समुचित व्यवस्था है। खुले आसमान और विस्तृत धरती का सही आनन्द लेने वाले पर्यटक अधिकतर भीमताल में ही रहना पसन्द करते हैं।
नौकुचियाताल
भीमताल से ३ कि.मी. की दूरी पर उत्तर-पूर्व की और नौ कोने वाला 'नौकुचियाताल' समुद्र की सतह से १३१९ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। नैनीताल से इस ताल की दूरी २६.२ कि.मी. है।
इस नौ कोने वाले ताल की अपनी विशिष्ट महत्ता है। इसके टेढ़े-मेढ़े नौ कोने हैं। इस अंचल के लोगों का विश्वास है कि यदि कोई व्यक्ति एक ही दृष्टि से इस ताल के नौ कोनों को देख ले तो उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है। परन्तु वास्तविकता यह है कि सात से अधिक कोने एक बार में नहीं देखे जा सकते।
इस ताल की एक और विशेषता यह है कि इसमें विदेशों से आये हुए नाना प्रकार के पक्षी रहते हैं। ताल में कमल के फूल खिले रहते हैं। इस ताल में मछलियों का शिकार बड़े अच्छे ढ़ंग से होता है। २०-२५ पौण्ड तक गी मछलियाँ इस ताल में आसानी से मिल जाती है। मछली के शिकार करने वाले और नौका विहार शौकिनों की यहाँ भीड़ लगी रहती है। इस ताल के पानी का रंग गहरा नीला है। यह भी आकर्षण का एक मुख्य कारण है। पर्यटकों के लिए यहाँ पर खाने और रहने की सुविधा है। धूप और वर्षा से बचने के लिए भी पर्याप्त व्यवस्ता की गयी है।
सात ताल
'कुमाऊँ' अंचल के सभी तालों में 'सातताल' का जो अनोखा और नैसर्गिक सौन्दर्य है, वह किसी दूसरे ताल का नहीं है। इस ताल तक पहुँचने के लिए भीमताल से ही मुख्य मार्ग है। भीमताल से 'सातताल' की दूरी केवल ४ कि.मी. है। नैनीताल से सातताल २१ कि.मी. की दूरी पर स्थित है। आजकल यहां के लिए एक दूसरा मार्ग माहरा गाँव से भी जाने लगा है। माहरा गाँव से सातताल केवल ७ कि.मी. दूर है।
सातताल घने वाँस वृक्षों की सघन छाया में समुद्रतल से १३७१ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इसमें तीन ताल राम, सीता और लक्ष्मण ताल कहे जाते हैं। इसकी लम्बाई १९ मीटर, चौड़ाई ३१५ मीटर और गहराई १५० मीटप तक आंकी गयी है।
इस ताल की विशेषता यह है कि लगातार सात तालों का सिलसिला इससे जुड़ा हुआ है। इसीलिए इसे 'सातताल' कहते है। नैसर्गिक सुन्दरता के लिए यह ताल जहाँ प्रसिद्ध है वहाँ मानव की कला के लिए भी विख्यात है। यही कारण है कि कुमाऊँ क्षेत्र के सभी तालों में यह ताल सर्वोत्तम है।
इस ताल में नौका-विहार करनेवालों को विशेष सुविधायें प्रदान की गयी है। यह ताल पर्यटन विभाग की ओर से प्रमुख सैलानी क्षेत्र घोषित किया गया है। यहाँ १० शैय्याओं वाला एक आवास गृह बनाया गया है। ताल के प्रत्येक कोने पर बैठने के लिए सुन्दर व्यवस्था कर दी गयी है। सारे ताल के आस-पास नाना प्रकार के पूल, लतायें लगायी गयी हैं। बैठने के अलावा सीढियों और सिन्दर - सुन्दर पुलों का निर्माण कर 'सातताल' को स्वर्ग जैसा ताल बनाया गया है। सचमुच यह ताल सौन्दर्य की दृष्टि से सर्वोपरि है। यहाँ पर नौकुचिया देवी का मन्दिर है। अमेरिका के डा. स्टेनले को भी यह स्थान बहुत प्रिय लगा। वे यहाँ पर अपनी ओर से एक 'वन विहार'का संचालन कर वन के पशि पक्षियों का संरक्षम करते हैं। उनका यहाँ एक आश्रम है, जहाँ बैठकर वे प्रकृति के विभिन्न अंगों का निरीक्षण, परीक्षण और संरक्षण करते हैं।
नल -दमयन्ति ताल की सैर
सात तालों की गिनती में 'नल दमयन्ति' ताल भी आ जाता है। माहरा गाँव से सात ताल जाने वाले मोटर-मार्ग पर यह ताल स्थित है। जहाँ से महरागाँव - सातताल मोटर - मार्ग शुरु होता है, वहाँ से तीन किलोमीटर बायीं तरफ यह ताल है। इस तीन किलोमीटर बायीं तरफ यह ताल है। इस ताल का आकार पंचकोणी है। इसमें कभी-कभी कटी हुई मछलियों के अंग दिखाई देते हैं। ऐसा कहा जाता है कि अपने जीवन के कठोरतम दिनों में नल दमयन्ती इस ताल के समीप निवास करते थे। जिन मछलियों को उन्होंने काटकर कढ़ाई में डाला था, वे भी उड़ गयी थीं। कहते हैं, उस ताल में वही कटी हुई मछलियाँ दिखाई देती हैं। इस ताल में मछलियों का शिकार करना मना है।
रामगढ़
भुवाली से भीमताल की ओर कुछ दूर चलने पर बायीं तरफ का रास्ता रामगढ़ की ओर मुड़ जाता है। यह मार्ग सुन्दर है। इस भुवाली - मुक्तेश्वर मोटर-मार्ग कहते हैं। कुछ ही देर में २३०० मीटर की ऊँचाई वाले 'गागर' नामक स्थान पर जब यात्रीगण पहुँचते हैं तो उन्हें हिमालय के दिव्य दर्शन होते हैं। 'गागर' नामक पर्वत क्षेत्र में 'गर्गाचार्य' ने तपस्या की थी, इसीलिए इस स्थान का नाम 'गर्गाचार्य' से अपभ्रंश होकर 'गागर' हो गया। 'गागर' की इस चोटी पर गर्गेश्वर महादेव का एक पुराना मन्दिर है। 'शिवरात्रि' के दिन यहाँ पर शिवभक्तों का एक विशाल मेला लगता है।
'गागर' से मल्ला रामगढ़ केवल ३ कि.मी. की दूरी पर समुद्रतल से १७८९ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। नैनीताल से केवल २५ कि.मी. की दूरी पर रामगढ़ के फलों का यह अनोखा क्षेत्र बसा हुआ है। कुमाऊँ क्षेत्र में सबसे अधिक फलों का उत्पादन भुवाली - रामगढ़ के आसपास के क्षेत्रों में होता है। इस क्षेत्र में अनेक प्रकार के फल पाये जाते हैं। बर्फ पड़ने के बाद सबसे पहले ग्रीन स्वीट सेब और सबसे बाद में पकने वाला हरा पिछौला सेब होता है। इसके अलावा इस क्षेत्र में डिलिशियस, गोल्डन किंग, फैनी और जोनाथन जाति के श्रेष्ठ वर्ग के सेब भी होते हैं। आडू यहाँ का सर्वोत्तम फल है। तोतापरी, हिल्सअर्ली और गौला कि का आडू यहाँ बहुत पैदा किया जाता है। इसी तरह खुमानियों की भी मोकपार्क व गौला कि बेहतर ढ़ंग से पैदा की जाती है। पुलम तो यहाँ का विशेष फल हो गया है। ग्रीन गोज जाति के पुलम यहाँ बहुत पैदा किया जाते हैं।
रामगढ़, जहाँ अपने फलों के लिए विख्यात है, वहाँ यह अपने नैसर्गिक सौन्दर्य के लिए भी प्रसिद्ध है। हिमालय का विराट सौन्दर्य यहां से साफ-साफ दिखाई देता है। रामगढ़ की पर्वत चोटी पर जो बंगला है, उसी में एक बार विश्वकवि रवीन्द्र नाथ टैगोर आकर ठहरे थे। उन्होंने यहाँ से जो हिमालय का दृश्य देका तो मुग्ध हो गए और कई दिनों तक हिमालय के दर्शन इृसी स्थान पर बैठकर करते रहे। उनकी याद में बंगला आज भी 'टैगोर टॉप' के नाम से जाना जाता है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु को भी रामगढ़ बहुत पसन्द था। कहते हैं आचार्य नरेन्द्रदेव ने बी अपने 'बौद्ध दर्शन' नामक विख्यात ग्रन्थ को अन्तिम रुप यहीं आकर दिया था। साहित्यकारों को यह स्थान सदैव अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। स्व. महादेवी वर्मा, जो आधुनिक हिन्दी साहित्य की मीरा कहलाती हैं, को तो रामगढ़ भाया कि वे सदैव ग्रीष्म ॠतु में यहीं आकर रहती थीं। उन्होंने अपना एक छोटा सा मकान भी यहाँ बनवा लिया था। आज भी यह भवन रामगढ़-मुक्तेश्वर मोटर मार्ग के बायीं ओर बस स्टेशन के पीछे वाली पहाड़ी पर वृक्षों के बीच देखा जा सकता है। जीवन के अन्तिम दिनों में वे पहाड़ पर नहीं आ सकती थीं। अत: उन्होंने मृत्यु से कुछ पहले इस मकान को बेचा था। परन्तु उनकी आत्मा सदैव इस अंचल में आने के लिए सदैव तत्पर रहती थी। ऐसे ही अनेक ज्ञात और अज्ञात साहित्य - प्रेमी हैं, जिन्हें रामगढ़ प्यारा लगा था और बहुत से ऐसे प्रकृति - प्रेमी हैं जो बिना नाम बताए और बिना अपना परिचय दिए भी इन पहाड़ियों में विचरम करते रहते हैं।
मुक्तेश्वर
रामगढ़ मल्ला से रामगढ़ तल्ला लगभग १० कि.मी. है। रामगढ़ मल्ला से ही मुक्तेश्वर जाने वाली सड़क नीचे घाटी में दिखाई देती है। यह घाटी भी सुन्दर है। नैनीताल से मुक्तेश्वर ५१.५ कि.मी. है।
मुक्तेश्वर कुमाऊँ का बहुत पुराना नगर है। सन् १९०१ ई. में यहाँ पशु-चिकित्सा का एक संस्थान खुला था। यह संस्थान अब काफी बढ़ गया है। कुमाऊँ अंचल में मुक्तेश्वर की घाटी अपने सौन्दर्य के लिए विख्यात है। देश-विदेश के पर्यटक यहाँ गर्मियों में अधिक संख्या में आते हैं। ठण्ड के मौसम में यहाँ बर्फीली हवाएँ चलती हैं। पर्यटकों के लिए यहाँ पर पर्याप्त सुविधा है। देशी-विदेशी पर्यटक भीमताल, नोकुचियाताल, सातताल, रामगढ़ आदि स्थानों को देखने के साथ-साथ मुक्तेश्वर (२२८६ मीटर) के रमणीय अंचल को देखना नहीं भूलते।
नैनीताल से तराइ -भाबर : खुर्पाताल
तराई-भाबर की ओर जैसे ही हम चलते हैं तो हमें कालढूँगी मार्ग पर नैनीताल से ६ कि.मी. की दूरी पर समुद्र की सतह से १६३५ मीटर की ऊँचाई पर खुपंताल मिलता है। इस ताल के तीनों ओर पहाड़ियाँ हैं, इसकी सुन्दरता इसके गहरे रंग के पानी के कारण और भी बढ़ जाती है। इसमें छोटी-छोटी मछलियाँ प्रचुर मात्रा में मिलती है। यदि कोई शौकीन इन मछलियों को पकड़ना चाहे तो अपने रुमाल की मदद से भी पकड़ सकता है।
इस ताल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पर्वतों के दृश्य बहुत सुन्दर लगते हैं। यहाँ की प्राकृतिक छटा और सीढ़ीनुमा खेतों का सौन्दर्य सैलानियों के मन को बरबस अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।
काशीपुर
खुर्पीताल से कालढूँगी मार्ग होते हुए काशीपुर को एक सीधा मार्ग चला जाता है। काशीपुर नैनीताल जिले का एक प्रसिद्ध नगर है, और मुरादाबाद व लालकुआँ से रेल द्वारा जुड़ा है। नैनीताल से यहाँ निरन्तर बसें आती रहती हैं। कुमाऊँ के राजाओं का यह एक मुख्य केन्द्र था। तराई - भाबर में जो भी वसूली होती थी उसका सूबेदार काशीपुर में ही रहता था।
चीनी यात्री हृवेनसांग ने भी इस स्थान का वर्णन किया था। उन्होंने इस स्थान का उल्लेख 'गोविशाण' नाम से किया था प्राचीन समय से ही काशीपुर का अपना भौगोलिक, सांस्कृतिक व धार्मिक महत्व रहा है।
कालाढूँगी/हल्द्वानी से काशीपुर मोटर-मार्ग में काशीपुर शहर से लगभग ६ कि.मी. पहले देवी का एक काफी पुराना मन्दिर है यहाँ पर चैत्र मास में चैती मेला विशेष रुप से लगता है, जिसमें दूर-दूर से लोग आते हैं तथा अपनी मनौतियाँ मनाते और माँगते हैं। देवी के दर्शन करने के लिए यहाँ काफी भीड़ उमड़ पड़ती है।
द्रोणा सागर :
चैती मेला स्थल से काशीपुर की ओर २ किलोमीटर आगे नगर से लगभग जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण ताल द्रोण सागर है। पांडवों से इस ताल का सम्बन्ध बताया जाता है कि गुरु द्रोण ने यहीं रहकर अपने शिष्यों को धनुर्विद्या की शिक्षा दी थी। ताल के किनारे एक पक्के टीले पर गुरु द्रोण की एक प्रतिमा है, ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टिकोण से यह विशिष्ट पर्यटन स्थल है।
गिरीताल
काशीपुर शहर से रामनगर की ओर तीन किलोमीटर चलने के बाद दाहिनी ओर एक ताल है, जिसके निकट चामुण्डा का भव्य मन्दिर है। इस ताल को गिरिताल के नाम से जाना जाता है। धार्मिक दृष्टि से इस ताल की विशेष महत्ता है, प्रत्येक पर्व पर यहाँ दूर-दूर से यात्री आते हैं। इस ताल से लगा हुआ शिव मन्दिर तथा संतोषी माता का मन्दिर है जिसकी बहुत मान्यता है। काशीपुर में नागनाथ मन्दिर, मनसा देवी का मन्दिर भी धार्मिक दृष्टि से आए हुए यात्री का दिल मोह लेते हैं।
काशीपुर नगर अब औद्योगिक नगर हो गया है, यहाँ सैकड़ों छोटे-बड़े उद्योग लगे हैं जिससे सारा इलाका समृद्धशाली हो गया है। काशीपुर के इलाके में बड़े-बड़े किसान, जिनके आधुनिक कृषि संयंत्रों से सुसज्जित बड़े-बड़े कृषि फार्म है, खेती की दृष्टि से यह इलाका काफी उपजाऊ है।
पर्यटन की दृष्टि से भी काशीपुर का काफी महत्व है। यहाँ के गिरिताल नामक ताल के किनारे पर्यटन आवास--गृह का निर्माण किया गया है। यहाँ दूर-दूर से देशी-विदेशी पर्यटक आकर रुकते हैं।
नैनीताल : एक परिचय
यहाँपर 'नैनीताल' जो नैनीताल जिले के अन्दर आता है। यहाँ का यह मुख्य आकर्षण केन्द्र है। तीनों ओर से घने-घने वृक्षों की छाया में ऊँचे - ऊँचे पहाड़ों की तलहटी में नैनीताल समुद्रतल से १९३८ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इस ताल की लम्बाई १,३५८ मीटर, चौड़ाई ४५८ मीटर और गाहराई १५ से १५६ मीटर तक आंकी गयी है। नैनीताल के जल की विशेषता यह है कि इस ताल में सम्पूर्ण पर्वतमाला और वृक्षों की छाया स्पष्ट दिखाई देती है। आकाश मण्डल पर छाये हुए बादलों का प्रतिविम्भ इस तालाब में इतना सुन्दर दिखाई देता है कि इस प्रकार के प्रतिबिम्ब को देखने के लिए सैकड़ो किलोमीटर दूर से प्रकृति प्रेमी नैनीताल आते - जाते हैं। जल में विहार करते हुए बत्तखों का झुण्ड, थिरकती हुई तालों पर इठलाती हुई नौकाओं तथा रंगीन बोटों का दृश्य और चाँद - तारों से भरी रात का सौन्दर्य नैनीताल के#े ताल की शोभा बढ़ाने में चार - चाँद लगा देता है। इस ताल के पानी की भी अपनी विसेषता है। गर्मियों में इसका पानी हरा, बरसात में मटमैला और सर्दियों में हल्का नीला हो जाता है।
नैनीताल के ताल के दोनों ओर सड़के हैं। ताल का मल्ला भाग मल्लीताल और नीचला भाग तल्लीताल कहलाता है। मल्लीताल में फ्लैट का खुला मैदान है। मल्लीताल के फ्लैट पर शाम होते ही मैदानी क्षेत्रों से आए हुए सैलानी एकत्र हो जाते हैं। यहाँ नित नये खेल - तमाशे होते रहते हैं। संध्या के समय जब सारी नैनीताल नगरी बिजली के प्रकाश में जगमगाने लगती है तो नैनीताल के ताल के देखने में ऐसा लगता है कि मानो सारी नगरी इसी ताल में डूब सी गयी है। संध्या समय तल्लीताल से मल्लीताल को आने वाले सैलानियों का तांता सा लग जाता है। इसी तरह मल्लीताल से तल्लीताल (माल रोड) जाने वाले प्रकृतिप्रेमियों का काफिला देखने योग्य होता है।
नैनीताल, पर्यटकों, सैलानियों पदारोहियों और पर्वतारोहियों का चहेता नगर है जिसे देखने प्रतिवर्ष हजारों लोग यहाँ आते हैं। कुछ ऐसे भी यात्री होते हैं जो केवल नैनीताल का "नैनी देवी" के दर्शन करने और उस देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने की अभिलाषा से आते हैं। यह देवी कोई और न होकर स्वयं 'शिव पत्नी' नंदा (पार्वती) हैं। यह तालाब उन्हीं की स्मृति का द्योतक है। इस सम्बन्ध में पौराणिक कथा कही जाती है।
नैनीदेवी का नैनीताल : पौराणिक कथा के अनिसार दक्ष प्रजापति की पुत्री उमा का विवाह शिव से हुआ था। शिव को दक्ष प्रजापति पसन्द नहीं करते थे, परन्तु यह देवताओं के आग्रह को टाल नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह न चाहते हुए भी शिव के साथ कर दिया था। एक बार दक्ष प्रजापति ने सभी देवताओं को अपने यहाँ यज्ञ में बुलाया, परन्तु अपने दामाद शिव और बेटी उमा को निमान्त्रण तक नहीं दिय। उमा हठ कर इस यज्ञ में पहुँची। जब उसने हरिद्वार स्थित कनरवन में अपने पिता के यज्ञ में सभी देवताओं का सम्मान और अपने पति और अपनी निरादर होते हुए देखा तो वह अत्यन्त दु:खी हो गयी। यज्ञ के हवनकुण्ड में यह कहते हुए कूद पड़ी कि 'मैं अगले जन्म में भी शिव को ही अपना पति बनाऊँगी। अपने मेरा और मेरे पति का जो निरादर किया इसके प्रतिफल - स्वरुप यज्ञ के हवन - कुण्ड में स्यवं जलकर आपके यज्ञ को असफल करती हूँ।' जब शिव को यह ज्ञात हुआ कि उमा सति हो गयी, तो उनके क्रोध का पारावार न रहा। उन्होंने अपने गणों के द्वारा दक्ष प्रजापति के यज्ञ को नष्ट - भ्रष्ट कर डाला। सभी देवी - देवता शिव के इस रौद्र - रुप को देखकर सोच में पड़ गए कि शिव प्रलय न कर ड़ालें। इसलिए देवी - देवताओं ने महादेव शिव से प्रार्थना की और उनके क्रोध के शान्त किया। दक्ष प्रजापति ने भी क्षमा माँगी। शिव ने उनको भी आशीर्वाद दिया। परन्तु, सति के जले हुए शरीर को देखकर उनका वैराग्य उमड़ पड़ा। उन्होंने सति के जले हुए शरीर को कन्धे पर डालकर आकाश - भ्रमण करना शुरु कर दिया। ऐसी स्थिति में जहाँ - जहाँ पर शरीर के अंग किरे, वहाँ - वहाँ पर शक्ति पीठ हो गए। जहाँ पर सती के नयन गिरे थे ; वहीं पर नैनादेवी के रुप में उमा अर्थात् नन्दा देवी का भव्य स्थान हो गया। आज का नैनीताल वही स्थान है, जहाँ पर उस देवी के नैन गिरे थे। नयनों की अप्पुधार ने यहाँ पर ताल का रुप ले लिया। तबसे निरन्तर यहाँ पर शिवपत्नी नन्दा (पार्वती) की पूजा नैनादेवी के रुप में होती है।
यह भी एक विशिष्ट उदाहरण है कि समस्त गढ़वाल - कुमाऊँ की एकमात्र इष्ट देवी 'नन्दा' ही है। इस पर्वतीय अंचल में नन्दा की पूजा और अर्चना जिस ढ़ंग से की जाती है -- वह अन्यत्र देखने में नहीं आती।
नैनीताल ते ताल की बनावट भी देखें तो वह आँख की आकृति का 'ताल' है। इसके पौराणिक महत्व के कारण ही इस ताल की श्रेष्ठता बहुत आँकी जाती है। नैनी (नंदा) देवी की पूजा यहाँ पर पुराण युग से होती रही है।
कुमाऊँ के चन्द राजाओं की इष्ट देवी भी नन्दा ही थी, जिकी वे निरन्तर यहाँ आकर पूजा करते रहते थे। एक जनश्रुति ऐसी भी कही जाती है कि चंदवंशीय राजकुमारी ननद नन्दा थी जिसको एक देवी के रुप में पूजी जाने लगी। परन्तु इस कथा में कोई दम नहीं है, क्योंकी समस्त पर्वतीय अंचल में नन्दा को ही इष्ट देवी के रुप में स्वीकारा गया है।
गढ़वाल और कुमाऊँ के राजाओं की भी नन्दा देवी इष्ट रही है। गढ़वाल और कुमाऊँ की जनता के द्वारा प्रतिवर्ष नन्दा अष्टमी के दिन नंदापार्वती की विसेष पूजा होती है। नन्दा के मायके से ससुराल भेजने के लिए भी 'नन्दा जात' का आयोजन गढ़वाल - कुमाऊँ की जनता निरन्तर करती रही है। अतः नन्दापार्वती की पूजा - अर्चना के रुप में इस स्थान का महत्व युग - युगों से आंका गया है। यहाँ के लोग इसी रुप में नन्दा के 'नैनीताल' की परिक्रमा करते आ रहे हैं।
त्रिॠषि सरोवर :
'नैनीताल' के सम्बन्ध में एक और पौराणिक कथा प्रचलित है। 'स्कन्द पुराण' के मानस खण्ड में एक समय अत्रि, पुस्त्य और पुलह नाम के ॠषि गर्गाचल की ओर जा रहे थे। मार्ग में उन्हे#े#ं यह स्थान मिला। इस स्थान की रमणीयता मे वे मुग्ध हो गये परन्तु पानी के अभाव से उनका वहाँ टिकना (रुकना) और करना कठीन हो गया। परन्तु तीनों ॠथियों ने अपने - अपने त्रिशुलों से मानसरोवर का स्मरण कर धरती को खोदा। उनके इस प्रयास से तीन स्थानों पर जल धरती से फूट पड़ और यहाँ पर 'ताल' का निर्माण हो गया। इसिलिए कुछ विद्वान इस ताल को 'त्रिॠषि सरोवर' के नाम से पुकारा जाना श्रेयस्कर समझते हैं।
कुछ लोगों का मानना हे कि इन तीन ॠषियों ने तीन स्थानों पर अलग - अलग तोलों का निर्माण किया था। नैनीताल, खुरपाताल और चाफी का मालवा ताल ही वे तीन ताल थे जिन्हे 'त्रिॠषि सरोवर' होने का गौरव प्राप्त है।
नैनीताल के ताल की कहानी चाहे जो भी हो, इस अंचल के लोग सदैव यहाँ नैना (नन्दा) देवी की पूजा - अर्चना के लिए आते रहते थे। कुमाऊँ की ऐतिहासिक घटनाएँ ऐसा रुप लेती रहीं कि सैकड़ों क्या हजारों वर्षों तक इस ताल की जानकारी बाहर के लोगों को न हो सकी। इसी बीच यह क्षेत्र घने जंगल के रुप में बढ़ता रहा। किसी का भी ध्यान ताल की सुन्दरता पर न जाकर राजनीतिक गतिविधियों से उलढा रहा। यह अंचल छोटे छोटे थोकदारों के अधीन होता रहा। नैनीताल के इस इलाके में भी थोकदार थे, जिनकी इस इलाके में काफी जमीनें और गाँव थे।
सन् १७९० से १८१५ तक का समय गढ़वाल और कुमाऊँ के लिए अत्यन्त कष्टकारी रहा है। इस समय इस अंचल में गोरखाओं का शासन था। गोरखों ने गढ़वाली तथा कुमाऊँनी लोगों पर काफी अत्याचार किए। उसी समय ब्रिटिश साम्राज्य निरन्तर बढ़ रहा था। सन् १८१५ में ब्रिटिश सेना ने बरेली और पीलीभीत की ओर से गोरखा सेना पर आक्रमण किया। गोरखा सेना पराजित हुई। ब्रिटिश शासन सन् १८१५ ई. के बाद इस अंचल में स्थापित हो गया। २७ अप्रैल, १८१५ के अल्मोड़ा (लालमण्डी किले) पर ब्रिटिश झण्डा फहराया गया। अंग्रेज पर्वत - प्रेमी थे। पहाड़ों की ठण्डी जलवायु उनके लिए स्वास्थयवर्धक थी। इसलिए उन्होंने गढ़वाल - कुमाऊँ पर्वतीय अँचलों में सुन्दर - सुन्दर नगर बसाने शुरु किये। अल्मोड़ा, रानीखेत, मसूरी और लैन्सडाउन आदि नगर अंग्रेजों की ही इच्छा पर बनाए हुए नगर हैं।
सन् १८१५ ई. के बाद अंग्रेजों ने पहाड़ों पर अपना कब्जा करना शुरु कर दिया था। थोकदारों की सहायता से ही वे अपना साम्राज्य पहाड़ों पर सुदृढ़ कर रहे थे। नैनीताल इलाके के थोकदार सन् १८३९ ई. में ठाकुर नूरसिंह (नरसिंह) थे। इनकी जमींदारी इस सारे इलाके में फैली हुई थी। अल्मोड़ा उस समय अंग्रेजों की प्रिय सैरगाह थी। फिर भी अंग्रेज नये - नये स्थानों की खोज में इधर - उधर घूम रहे थे।
नए नैनीताल की खोज :
सन् १८३९ ई. में एक अंग्रेज व्यापारी पी. बैरन था। वह रोजा, जिला शाहजहाँपुर में चीनी का व्यापार करता था। इसी पी. बैरन नाम के अंग्रेज को पर्वतीय अंचल में घूमने का अत्यन्त शौक था। केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा करने के बाद यह उत्साही युवक अंग्रेज कुमाऊँ की मखमली धरती की ओर बढ़ता चला गया। एक बार खैरना नाम के स्थान पर यह अंग्रेज युवक अपने मित्र कैप्टन ठेलर के साथ ठहरा हुआ था। प्राकृतिक दृश्यों को देखने का इन्हें बहुत शौक था। उन्होंने एक स्थानीय व्यक्ति से जब 'शेर का डाण्डा' इलाके की जानकारी प्राप्त की तो उन्हें बताया गया कि सामने जो पर्वत हे, उसको ही 'शेर का डाण्डा' कहते हैं और वहीं पर्वत के पीछे एक सुन्दर ताल भी है। बैरन ने उस व्यक्ति से ताल तक पहुँचने का रास्ता पूछा, परन्तु घनघोर जंगल होने के कारण और जंगली पशुओं के डर से वह व्यक्ति तैयार न हुआ। परन्तु, विकट पर्वतारोही बैरन पीछे हटने वाले व्यक्ति नहीं थे। गाँव के कुछ लोगों की सहायता से पी. बैरन ने 'शेर का डाण्डा' (२३६० मी.) को पार कर नैनीताल की झील तक पहुँचने का सफल प्रयास किया। इस क्षेत्र में पहुँचकर और यहाँ की सुन्दरता देखकर पी. बैरन मन्त्रुमुग्ध हो गये। उन्होंने उसी दिन तय कर ड़ाला कि वे अब रोजा, शाहजहाँपुर की गर्मी को छोड़कर नैनीताल की इन आबादियों को ही आबाद करेंगे।
पी. बैरन 'पिलग्रिम' के नाम से अपने यात्रा - विवरण अनेक अखबारों को भेजते रहते थे। बद्रीनाथ, केदारनाथ की यात्रा का वर्णन भी उन्होंने बहुत सुन्दर शब्दों में लिखा था। सन् १८४१ की २४ नवम्बर को, कलकत्ता के 'इंगलिश मैन' नामक अखबार में पहले - पहले नैनीताल के ताल की खोज खबर छपी थी। बाद में आगरा अखबार में भी इस बारे में पूरी जानकारी दी गयी थी। सन् १८४४ में किताब के रुप में इस स्थान का विवरण पहली बार प्रकाश में आया था। बैरन साहब नैनीताल के इस अंचल के सौन्दर्य से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने सारे इलाके को खरीदन का निश्चय कर लिया। पी बैरन ने उस लाके के थोकदार से स्वयं बातचीत की कि वे इस सारे इलाके को उन्हें बेच दें।
पहले तो थोकदार नूर सिंह तैयार हो गये थे, परन्तु बाद में उन्होंने इस क्षेत्र को बेचने से मना कर दिया। बैरन इस अंचल से इतने प्रभावित थे कि वह हर कीमत पर नैनीताल के इस सारे इलाके को अपने कब्ज में कर, एक सुन्दर नगर बसाने की योजना बना चुके थे। जब थोकदार नूरसिंह इस इलाके को बेचने से मना करने लगे तो एक दिन बैरन साहब अपनी किश्ती में बिठाकर नूरसिंह को नैनीताल के ताल में घुमाने के लिए ले गये। और बीच ताल में ले जाकर उन्होंने नूरसिंह से कहा कि तुम इस सारे क्षेत्र को बेचने के लिए जितना रू़पया चाहो, ले लो, परन्तु यदि तुमने इस क्षेत्र को बेचने से मना कर दिया तो मैं तुमको इसी ताल में डूबो दूँगा। बैरन साहब खुद अपने विवरण में लिखते हैं कि डूबने के भय से नूरसींह ने स्टाम्प पेपर पर दस्तखत कर दिये और बाद में बैरन की कल्पना का नगर नैनीताल बस गया। सन् १८४२ ई. में सबसे पहले मजिस्ट्रेट बेटल से बैरन ने आग्रह किया था कि उन्हें किसी ठेकेदार से परिचय करा दें ताकि वे इसी वर्ष १२ बंगले नैनीताल में#ं बनवा सकें। सन् १८४२ में बैरन ने सबसे पहले पिरग्रिम नाम के कॉटेज को बनवाया था। बाद में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इस सारे क्षेत्र को अपने अधिकार में ले लिया। सन् १८४२ ई. के बाद से ही नैनीताल एक ऐसा नगर बना कि सम्पूर्ण देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी इसकी सुन्दरता की धाक जम गयी। उत्तर प्रदेश के गवर्नर का ग्रीष्मकालीन निवास नैनीताल मेंं ही हुआ करता था। छः मास के लिए उत्तर प्रदेश के सभी सचिवालय नैनीताल जाते थे।
नैनीताल में अनेक ऐसे स्थान हैं जहाँ जाकर सैलानी अपने - आपको भूल जाते हैं। यहाँ अब लोग ग्रीष्म काल में नहीं आते, बल्कि वर्ष भर आते रहते हैं। सर्दियों में बर्फ के गिरने के दृश्य को देखने हजारों पर्यटक यहाँ पहुँचते रहते हैं। रहने के लिए नैनीताल में किसी भी प्रकार की कमी नहीं है, एक से बढ़कर एक होटल हैं। आधुनिक सुविधाओं की नैनीताल में आज कोई कमी नहीं है। इसलिए सैलानी और पर्यटक यहाँ आना अधिक उपयुक्त समझते हैं।
नैनीताल में अप्रैल से जून और सितम्बर से दिसम्बर तक दो सीजन होते हैं। सम्पूर्ण देश के पूँजीपति, व्यापारी, उद्योगपति, राजा-महाराजा और सैलानी यहाँ आते हैं। इस मौसम में टेनिस, पोलो, हॉकी, फुटबाल, गॉल्फ, मछली मारने और नौका दौड़ाने के खेलों की प्रतियोगिता होती है। इन खेलों के शौकीन देश के विभिन्न नगरों से यहाँ आते हैं। पिकनिक के लिए भी लोगों का ताँता नगा रहता है। इसी मौसम में नाना प्राकर के सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं। सितम्बर से दिसम्बर का मौसम भी बहुत सुन्दर रहता है। ऐसे समय में आकाश साफ रहता है। प्रायः इस मोसम में होटलों का किराया भी कम हो जाता है। बहुत से प्रकृति प्रेमी इसी मौसम में नैनीताल आते हैं। जनवरी और फरवरी के दो ऐसे महीने होते हैं जब नैनीताल में बर्फ गिरती है। बहुत से नवविवाहित दम्पतियाँ अपनी 'मधु यामिनी' हेतु नैनीताल आते हैं। तात्पर्य यह है कि यह सुखद और शान्ति का जीवन बिताने का मौसम है।
नैनीताल में घूमने के बाद सैलानी पीक देखना भी नहीं भूलते। आजकल नैनीताल के आकर्षण में रज्जुमार्ग (रोपवे) की सवारी भी विशेष आकर्षण का केन्द्र बन गयी है। सुबह, शाम और दिन में सैलानी नैनीताल के ताल में जहां बोट की सवारी करते हैं, वहाँ घोड़ों पर चढ़कर घुड़सवारी का भी आनन्द लेते हैं। शरद्काल में और ग्रीष्मकाल में यहाँ बड़ी रौनक रहती है। शरदोत्सव के समय पर नौकाचालन, तैराकी, घोड़ो का सवारी और पर्वतारोहम जैसे मनोरंजन और चुनौती भरे सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं।
नैनीताल में बहुत, अच्छे स्कूल भी हैं। योरोपियन मिशनरियों के यहाँ कई स्कूल खुले हैं जिनमें से सेंट जोसेफ कॉलेज, शेरउड कॉलेज, सेन्टमेरी कॉन्वेंट स्कूल और आल सेन्ट स्कूल प्रसिद्ध है। बिरला का बालिका विद्यलय और बिरला पब्लिक स्कूल भी प्रसीद्ध है। नैनीताल में पॉलिटेकनिक है। नैनीताल में कुमाऊँ विश्वविद्यालय भी स्थापित है, जहाँपर हर प्रकार की शिक्षा दी जाती है। कुमाऊँ विश्वविद्यालय में नये - नये विष्य पढ़ाये जाते हैं। जिन्हें पढ़ाने के लिए देख के कोने - कोने से विद्यार्थी यहाँ आते हैं।
यहाँ की सात चोटियों नैनीताल की शोभा बढ़ाने में विशेष, महत्व रखती हैं :
१.) चीनीपीक (नैनापीक)
सात चोटियों में चीनीपीक (नैनापीक) २,६०० मीटर की ऊँचाई वाली पर्वत चोटी है। नैनीताल से लगभग साढ़े पाँच किलोमीटर पर यह चोटी पड़ती है। इस चोटी से ह्मालय की ऊँची -ऊँची चोटियों के दर्शन होते हैं। यहाँ से नैनीताल के दृश्य भी बड़े भव्य दिखाई देते हैं। इस चोटी पर चार कमरे का लकड़ी का एक केबिन है जिसमें एक रेस्तरा भी है।
२.) किलवरी
२५२८ मीटर की ऊँचाई पर दूसरी पर्वत - चोटी है जिसे किलवरी कहते हैं। यह पिकनिक मनाने का सुन्दर स्थान है। यहाँ पर वन विभाग का एक विश्रामगृह भी है। जिसमें पहुत से प्रकृति प्रेमी रात्रि - निवास करते हैं। इसका आरक्षण डी. एफ. ओ. नैनीताल के द्वारा होता है।
३.) लड़ियाकाँटा
२४८१ मीटर की ऊँचाई पर यह पर्वत श्रेणी है जो नैनीताल से लगभग साढ़े पाँच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ से नैनीताल के ताल की झाँकी अत्यन्त सुन्दर दिखाई देती है।
४ - ५.) देवपाटा और केमल्सबौग
यह दोनों चोटियाँ साथ - साथ हैं। जिनकी ऊँचाई क्रमशः २४३५ मीटर और २३३३ मीटर है। इस चोटी से भी नैनीताल और उसके समीप वाले इलाके के दृश्य अत्यन्त सुन्दर लगते हैं।
६. डेरोथीसीट
वास्तव में यह अयाँरपाटा पहाड़ी है परन्तु एक अंग्रेज केलेट ने अपनी पत्नी डेरोथी, जो हवाई जहाज की यात्रा करती हुई मर गई थी। की याद में इस चोटी पर #ेक कब्र बनाई, उसकी कब्र - 'डारोथीसीट' के नाम - पर इस पर्वत चोटी का नाम पड़ गया। नैनीताल से चार किलोमीटर की दुरी पर २२९० मीटर की ऊँचाई पर यह चोटी है।
७. स्नोव्यू और हनी - बनी
नैनीताल से केवन ढ़ाई किलोमीटर और २२७० मीटर की ऊँचाई पर हवाई पर्वत - चोटी है। 'शेर का डाण्डा' पहाड़ पर यह चोटी स्थित है, जहाँ से हिमालय का भव्य दृश्य साफ - साफ दिखाई देता है। इसी तरह स्नोव्यू से लगी हुई दूसरी चोटी हनी - बनी है, जिसकी ऊँचाई २१७९ मीटर है, यहाँ से भी हिमालय के सुन्दर दृश्य दिखाई देते हैं।
हनुमानगढ़ी :
नैनीताल में हनुमानगढ़ी सैलानी, पर्यटकों और धार्मिक यात्रियों के लिए विशेष, आकर्षण का केन्द्र हैै। यहाँ से पहाड़ की कई चोटियों के और मैदानी क्षेत्रों के सुन्हर दृश्य दिखाई देते हैं। हनुमानगढ़ी के पास ही एक बड़ी वेद्यशाला है। इस वेद्यशाला में नक्षरों का अध्ययन कियी जाता है। राष्ट्र की यह अत्यन्त उपयोगी संस्था है।
नैनीताल की सौन्दर्य - सुषमा अद्वितीय है। नैनीताल नगर भारत के प्रमुख नगरों से जुड़ा हुआ है। उत्तर - पूर्व रेलवे स्टेसन काठगौदाम से नैनीताल ३५ कि. मी. की दूरी पर स्थित है। आगरा, लखनऊ और बरेली को काठगोदाम से सीधे रेल जाती है।
हवाई - जहाज का केन्द्र पन्त नगर है। नैनीताल से पन्त नगर की दूरी ६० कि. मीटर है। दिल्ली से यहाँ के लिए हवाई यात्रा होती रहती है।
नैनीताल जिले में कई स्थान ऐसै हैं, जहाँ बसों द्वारा आना - जाना रहता है। हल्द्वानी, काशीपुर, रुद्रपुर, रामनगर, किच्छा और पन्त नगर आदि नैनीताल में ऐसै उभरते हुए नगर हैं, जिनमें बसों के माध्यम से प्रतिदन सम्पर्क बना रहता है।
नैनीताल नगर निरन्तर फैलता ही जा रहा है। आज यह नगर ११ - ७३ वर्ग किलोमीटर में फैला हूआ है। पर्वतारोहण, पदारोहण जैसे आधुनिक आकर्षणों के कारण, यहाँ का फैलाव नित नये ढ़ंग से हो रहा है। 'कुमाऊँ' विश्वविद्यालय के मुख्यालय होने के कारण भी यहाँ नित नयी चहल - पहल होती है। नैनीतान में कई संस्थान हैं। पर्ववतारोहण की संस्था भी यहाँ की एक शान है।
नैनीताल नगर सुन्दर है। परन्तु नैनीताल जिले के अन्तर्गत ही कुछ ऐसे नगर और स्थल हैं जिनकी विशिष्टता नैनीताल से किसी भी प्रकार से कम नहीं है।
क्या – क्या उठापटक होगी नदियों के जोड़ने में
हिमालय नदी विकास
हिमालय नदी विकास में भारत, नेपाल तथा भूटान में गंगा एवं ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियों पर भण्डारण जलाशयों का निर्माण करने तथा गंगा की पूर्वी सहायक नदियों के अतिरिक्त प्रवाह को पश्चिम में पथांतरण करने के उद्देश्य से नदियों के अन्तर्योजी तंत्र निर्माण और ब्रह्मपुत्र एवं उसकी सहायक नदियों को गंगा से तथा गंगा को महानदी से जोड़ ने पर जोर दिया गया है ।
प्रायद्वीपीय नदी विकास
प्रायद्वीपीय नदी विकास घटक को चार प्रमुख भागों में बांटा गया हैः
• महानदी-गोदावरी-कृष्णा-कावेरी नदियों को आपस में जोड़ना तथा इन बेसिनों में संभावित स्थानों पर जलाशयों का निर्माण: यह नदी तंत्रों को आपस में जोड़ ने की सबसे बड़ी योजना है जिसमें महानदी तथा गोदावरी के अतिरिक्त जल को कृष्णा तथा कावेरी नदियों के द्वारा दक्षिण में जल आवश्यकता वाले क्षेत्रों को अन्तरित करने का विचार है।
• मुंबई के उत्तर में तथा तापी के दक्षिण में पश्चिमोवर्ती प्रवाही नदियों को आपस में जोड़ना: इस योजना में इन धाराओं पर यथा संभावित संख्या में ईष्टतम जलाशयों के निर्माण तथा उन्हें आपस में जोड़ कर पर्याप्त प्रमात्रा में जल उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है जिससे कि उन क्षेत्रों में जल अन्तरित किया जा सके जहां अतिरिक्त जल की आवश्यकता है। इस योजना में जल आपूर्ति नहर को मुंबई महा नगरीय क्षेत्रों में ले जाने तथा महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों को सिंचाई उपलब्ध करवाने का भी प्रबंध है।
• केन-चंबल नदियों को आपस में जोड़ना: इस योजना में मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश के लिए एक जल-ग्रिड तथा अन्तः संयोजी नहर जिसमें यथा संभव संख्या में जलाशय हों, का प्रावधान है।
• अन्य पश्चिमोवर्ती प्रवाही नदियों का पथांतरण: ''पश्चिमी घाटों'' के पश्चिमी ओर भारी मात्रा में वर्षा से असंख्य धाराएं आती हैं जो अरब सागर में गिरती हैं। केरल की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तथा कुछ जल पूर्व में स्थित सूखा-प्रभावित क्षेत्रों को अंतरण करने हेतु एक अन्तः संयोजी नहर तंत्र के निर्माण की योजना बनाई जा सकती है जिसमें पर्याप्त मात्रा में भण्डारण जलाशय भी हों।
जी हाँ, विदेशी
आज खुश होना चाहिए। अब भारतीय अदालतों में विदेशी वकील पैरवी कर सकेंगे-लंदन के, वाशिंगटन के, बर्लिन के, जगह-जगह के। हमें उत्सव मनाना चाहिए। अब यूरोप और अमेरिका में चार्टर्ड एकाउंटेंट अपनी ओर हमारी कंपनियों का लेखा परीक्षण करेंगे, हमारा स्टैंडर्ड सुधरेगा। लेकिन हमारी स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी क्या जब विदेशी बीमा कंपनियाँ हमारी बीमा व्यवस्था सँभालेंगी ? कौन किसकी देखभाल करता है आज के जमाने में। मेरा खयाल है, देश की अपनी बीमा कंपनियाँ पापड़ बेलने का काम करेंगी, यही फायदे का काम होगा।
गौरव की एक बात और है, विदेशी बैंक दनादन अपना जाल फैला रहे हैं। ये तो शेयर घोटाले में भी सबसे बड़े अपराधी पाए गए। उन्हीं के खातो से धन बाहर जाकर, आसनी से लापता होता रहा। इन्हें थोड़ा सा अर्थदंड भुगतना पड़ा। इससे कोई बात नहीं, ये दिल दनदनाने लगे हैं। क्रेडिड कार्ड की असल होड़ विदेशी बैकों में ही है। अब हम आजादी से अगले दो साल की कमाई इस साल ही खर्च कर सकेंगे। इस तरह लाखों मालदार लोगों और बड़ी-बड़ी तनखावालों के पैसे सँभालने की तमीज देशी बैंकों में कहाँ। सो, सौभाग्य से इनका आगमन हुआ है।
हम अपने लिए अच्छी खबर नहीं बना सकते थे। उसका कितना बुरा असर देश पर पड़ रहा था, इसकी आप कल्पना नहीं कर सकते थे। पैसा हो और अच्छी शराब न मिले, नकली स्कॉच हजार-बारह सौ में मिले। देश का पैसा मिट्टी में मिल रहा था। अब हम भारत निर्मित स्कॉच पी सकेंगे। सिर्फ उसका कंसंट्रेट और पानी विदेश से आएगा। हमारी गायों-भैसों को अच्छा गोबर देने की तमीज नहीं। सो गोबर भी विदेश से आएगा। हवाई जहाज और होटल की बुकिंग अब कोई बीस सेकेंड में विदेशी कंपनियाँ कर देंगी। हमारे छोटे-मोटे ट्रेवल एजेंट इतने निकम्मे हैं कि कई बार बुकिंग में आधा घंटा या एक घंटा लगा देते हैं। देर करते हैं तो भुगतें। अब इन निकम्मों का धंधा चौपट हो जाएगा। विदेशी कारों की भरमार है। फिसड्डी फिएट और अंबेसडर अब बाजार में लोकप्रिय नहीं है। यही होना चाहिए। खास बात यह है कि सबकुछ होगा, मगर हमारी स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी।
खाने-पीने की पचासों चीजें बाजार में अवतरित हो ही गई हैं। अब हमारे बच्चों का स्तर विश्व के दूसरे देशों के मुकाबले का हो गया है। उनके जूते एक-से-एक विदेशी नस्ल के हैं। जींस और अमेरिकी झंडेवाले छापे का शर्ट भी है। जो बच्चे नहीं खरीद सकते वे कम-से-कम दूसरों की देख तो सकते हैं। पहले तो हम देखने को भी तसरते थे। क्या यह आनंद का विषय नहीं है कि अचानक हमारे टेलीविजन में विश्व भर के कार्यक्रम आने लगे हैं। अब मार-धाड़, नितंबांदोलन देखने के लिए तरसता नहीं। जो कुछ है, खुल्लम-खुल्ला है।
दवा-दारू के मामलों में भी यही है। तीन-चौथाई दवाइयाँ विदेशी कंपनियों की है। सो हमारा स्वास्थ्य भी उनके हवाले है-मिलावट के डर से बिलकुल मुक्त, शानदार पैकिंग में। ऐसी पैकिंग के बिना बीमार हुए इन दवाइयों को खाने का जी करने लगे। अब खेती में भी क्रांति होगी। लेकिन कोई यह नहीं कह सकता कि इससे हमारी स्वतंत्रता पर आँच आएगी। बल्कि वह ज्यादा सुरक्षित रहेगी, क्योंकि वह उनके ही हवाले रहेगी, ताकि हम अपनी स्वतंत्रता से खिलवाड़ करके उसे बरबाद न कर दें।
‘कोका जैसे तीन दर्जन साम्राज्यों का नाम ही अमेरिकी साम्राज्य है
जब-जब स्वदेशी अस्मिता के विरुद्ध निर्णय हुए, दीनानाथ जी का बहुचर्चित व्यंग्य स्तंभ-‘आरपार’ जमकर लोहा लेता रहा। इसके अनेक उदाहरण मुझे विगत एक दशक के इन व्यंग्य लेखों में देखने को मिले। उन्हीं का संग्रह ‘घर की मुरगी...’ के नाम से आप पाठकों के सामने प्रस्तुत हुआ है। ये व्यंग्य जनजीवन के सभी पक्षों की रक्षा के लिए विदेशी अर्थतंत्र के जहरीले साँपों पर करारी चोट करते हैं। मेरी दृष्टि में ये स्वदेशी व्यंग्य है। इनकी भूमिका वर्तमान परिस्थितियों में बड़े महत्व की है।
विदेशी कंपनियाँ अपने उत्पादों को बेचने के लिए किस्म-किस्म के तरीके उपयोग करती हैं, जिनसे बेखबर लोग उनके उपभोक्ता बनते जाते हैं। कैसे-कैसे होते हैं ये तरीके ? कैसे इनके आघातों से बदल जाता है जनमानस ? पत्रकारिता की पैनी नजर इसे आसानी से पकड़ लेती है। साहित्य के नए व्यंग्य विषयों का परिचय इन व्यंग्यों से अवश्य मिल सकता है। इनकी बानगी देखिए ‘किसी दिन किसी मेडिकल शोध के जरिए यह साबित किया जाएगा कि जलजीरा पीने से एक्जीमा होता है। लस्सी पीनेवालों को कैंसर होने का खतरा ज्यादा रहता है।..ऐसे दो सौ शोधों से यही पूरी तरह सिद्ध हो जाएगा कि कोका को छोड़कर कोई भी पेय सुरक्षित नहीं है (एकमेव कोला)।’
यूरोप के पारंपरिक त्योहारों में पेप्सी के प्रवेश का उदाहरण देते हुए व्यंग्यकार ने भारतीय जनमानस को जागरूक करने के लिए लिखा है-‘यह भी हो सकता है कि पंडित शादी कराने के बाद वरमाला के नेग पूरे कर नव विवाहित जोडे़ को पेप्सी की बोतलें आदान-प्रदान करने का कोई नया मंत्र पढ़े...या फिर गर्भाधान संस्कार और दाह संस्कार के बीच चौदह अन्य संस्कारों में किसी तरह कोका कोला संस्कार जुड़ जाए (कोका संस्कार)।’ व्यंग्यकार की चिंता है कि हमारी स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी क्या, जब विदेशी कंपनियाँ हमारी बीमा व्यवस्था सँभालेगी ?...विदेशी बैंक दनादन अपना जाल फैला रहे हैं। ये तो शेयर घोटाले में भी सबसे बड़े अपराधी पाए गए। इन्हीं के खातों से धन बाहर जाकर आसानी से लापता होता रहा।...मेरा ख्याल है, देश की अपनी बीमा कंपनियाँ पापड़ बेलने का काम करेंगी। यही फायदे का काम बचा रहेगा।’
‘कोका जैसे तीन दर्जन साम्राज्यों का नाम ही अमेरिकी साम्राज्य है। भारत में भी कोला युद्ध आरंभ हो गया।’
लोक-रुचि और सांस्कृतिक पक्षों पर विदेशी कंपनियों के हमले से उत्पन्न दुष्परिणामों को व्यंग्यकार ने इन स्वदेशी व्यंग्य में आड़े हाथों लिया है-‘मनमोहन सिंह की नीतियों का जैक्सन-लाभ और मैडोना-लाभ तो है ही, अब हॉलीवुड की मारधाड़ और हिंसाचार-यौनाचार से भरी फिल्में हिंदी में डब करके दिखाई जाएँगी। अनुबंध हो गया है। सचमुच सारे देश को इस दौर का स्वागत करना चाहिए।’ (आदाब जैक्सन-सलाम मैडोना)। सोए हुए जनमानस और दिग्भ्रिमित सरकारी नीति से घायल हुई स्वदेशी अस्मिता को देख मर्माहत व्यंग्यकार कथ्य उलटकर कहता है-‘इतना तो हम जानते ही हैं कि देशी देशी होती है-वह घटिया होती है, विदेशी की बात और है। कुछ लोग कहते हैं कि यह महज इन कंपनियों की लूट का जरिया होगा। सो, ये कंपनियाँ पानी पर उतर आई हैं। मगर हमारा पानी पहले ही भर चुका है (पानी का आयात)।’
हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान को कुचलती फोटो पत्रकारिता के एक हमले को व्यंग्यकार ने अपने व्यंग्य का विषय बनाया है। उसका शीर्षक है ‘मेजर का जूता।’ मैं इसे पढ़कर उस फोटो की याद में लौट गया था। मुझे याद आया-जॉन मेजर के जूते को खोलते या पहनाते उक्त कर्मचारी के सिर पर गांधी टोपी थी। यह व्यंग्य विषय की मजबूती और नए पन के कारण मुझे रोमांचित कर गया था। पता नहीं, इस विषय पर कितनी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। पाठक इस व्यंग्य से लेखकीय दायित्व का अनुभव करेंगे और उस चोट का भी, जिसे भारतीय मन को झकझोरने के लिए लिखा गया। इस प्रकार अनेक लेख इस संग्रह में है, जो स्वदेशी मन पर हुए हमलों को निरस्त करते हैं।
इन व्यंग्य लेखों का संचयन इस आत्मविश्वास से किया गया है कि ये स्वदेशी आंदोलन के लिए निश्चय ही घृत-समिधा सिद्ध होंगे।
-प्रमोद कुमार दुबे
एकमेव कोला
अगस्त 1945 में कम्युनिस्ट नेता हो-ची मिन्ह ने जिस बालकनी से अक्तूबर क्रांति की घोषणा की थी, उसके ठीक सामने आज तीस-तीस फीट ऊँची, लाल लेबलवाली कोका कोला की कद्दावर बोतलें लगी हुई हैं। वियतनाम बीस साल तक अमेरिकी फौजों से लड़ता रहा। 1975 में यह लड़ाई खत्म हुई और अब अमेरिकी उपभोक्तावाद का सबसे प्रबल प्रतीक कोका कोला वहाँ उछल-कूद कर रहा है। एक अमेरिकी कार्टूनिस्ट ने टिप्पणी करते हुए एक वियतनामी के मुँह में शब्द डाले हैं कि ‘वह अमेरिकी को तब ज्यादा पसंद करता था जब वह उनका दुश्मन था।’
वियतनाम की प्रति व्यक्ति औसत आय भारत से भी कम है। फिर भी अमेरिकी रक्तपायी उसके शिकार में लगे हुए हैं। कोला एक तरह के अमेरिकी जादू-टोने का नाम है, जिससे ये क्लोरीनयुक्त रंगीन पानी से पीढ़ी-की-पीढ़ी में एक चस्का पैदा कर देते हैं; और धीरे-धीरे उपभोक्ता वर्ग पानी पीना भूल जाता है, पानी के बदले कोला पीता है और समझता है कि वह अमेरिकी शान-ओ-शौकत की जिंदगी जी रहा है। यह चस्का संसार के बेहतरीन विज्ञापन जाल में फँसते जाने से लगता है।
कोला जैसे तीन दर्जन साम्राज्यों का नाम ही अमेरिकी साम्राज्य है। भारत में भी कोला युद्ध प्रारंभ हो गया। प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव, कैबिनेट सचिव जैसे आधे दर्जन चोटी के महत्वपूर्ण अफसरों की बैठक में कोला युद्ध के बारे में एक फैसला लिया गया। भारत सरकार कश्मीर और पूर्वोत्तर के विद्रोह के संबंध में भले ही सुस्ती दिखाती रही, मगर कोला युद्ध में जरूर चुस्ती दिखाई। अब तय कर दिया गया है कि महाकोलाओं को ‘आकार’ की छूट है।
इन कोलाओं को पीने के कई लाभ हैं। कोला पर आज तक यह आरोप नहीं लगा कि उसमें शरीर के लिए कोई भी गुणकारी तत्त्व है। लस्सी, छाछ, फलों के रस से देश का पैसा अमेरिका में जमा कराने का फायदा भी नहीं मिलता। कुल जमा पंद्रह-बीस पैसे का क्लोरीनेटेड पानी जब चार-पाँच रुपए तक में बिकता है तब करोड़ों बोतलों का अरबों रुपए का फायदा कहाँ-कहाँ, किस-किसको जाता है और क्या-क्या करता है, यह रोमांचक रहस्य भी देश के लिए एक फायदेमंद तत्त्व हैं।
जिस तरह विश्व भर में कोला साम्राज्य, कोका संस्कृति और कोला दर्शन फैल रहा है, उससे तो यही लगता है कि सर्वेगुणा कोलामाश्रयंते। कोई सोच सकता है कि लस्सी, दूध, छाछ, रस, नारियल पानी अंत में विजयी होंगे। वह कोला से अर्जित राशि का उपयोग करके इन पेयों की बुरी लत को छुड़वा सकते हैं। किसी दिन किसी मेडिकल शोध के जरिए यह साबित किया जा सकेगा कि जलजीरा पीने से एक्जीमा होता है, लस्सी पीनेवालों को कैंसर होने का खतरा ज्यादा रहता है, फलों के रस से मस्तिष्क की कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त होती हैं। ऐसे दो सौ शोधों से यह पूरी तरह साबित हो जाएगा कि कोका को छोड़कर कोई भी पेय सुरक्षित नहीं है।