पानी रे पानी... - - नुपूर दीक्षित

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गर्मियों के दिनों में हालात इतने बिगड़ जाते हैं कि पीने का पानी भी कई-कई दिनों बाद लोगों को नसीब होता। जब पीने के पानी के लिए इतना हाहाकार मचा हो, तो इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि अन्य उपयोगों के लिए पानी कितना मिल पाता होगा?अगर देखा जाए तो भारत में मुख्य नदियों में 12 ही ऐसी हैं, जिनमें सालों भर पानी रहता है। गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा, नर्मदा, ब्रह्मपुत्र आदि नदियों का पानी पीने के साथ-साथ अन्य उपयोगों में भी लाया जाता है, लेकिन हर साल इन नदियों में बाढ़ आती है और लोगों के इस स्त्रोत को भी छीन ले जाती है। गंगा नदी में हर साल आने वाली बाढ़ से न केवल हजारों लोग बेघर हो जाते हैं, बल्कि उन्हें पीने का पानी तक नसीब नहीं होता, जिसका परिणाम कई महामारियों के रूप में हमारे सामने आता है और सैकड़ों लोग मौत की कगार पर पहुँच जाते हैं। देश में कुछ संगठन इस दिशा में काम भी कर रहे हैं, लेकिन वे ऊँट के मुँह में जीरे के जैसा है, क्योंकि इतने बड़े स्तर पर लोगों की प्यास बुझा पाना संभव नहीं हो पा रहा। ऐसा नहीं है कि ये स्थिति पृथ्वी के निर्माण के साथ ही पैदा हो गई थी, बल्कि इन परिस्थतियों के लिए मनुष्य को ही दोषी माना जाएगा। बिना किसी योजना और विकल्प के वे प्रकृति के मुख्य संसाधान यानी जल का दोहन कर रहे हैं।
साभार- वेब दुनिया