भूजल उपचार के लिए वनस्पतियां - बी.एस. मोहन

प्रकृति में भूजल प्रचुरता से नहीं मिलता है और यह पेयजल का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। भूजल से आर्सेनिक संदूषण की समस्या उत्तरी भारत व बांग्लादेश में एक गंभीर समस्या है। पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक संदूषण की समस्या की गंभीरता के आंकलन हेतु उत्तरी चौबीस परगना जिले में सात साल का एक अध्ययन किया गया था। चौबीस परगना पश्चिम बंगाल के 9 आर्सेनिक प्रभावित जिलो में से एक है। उत्तरी चौबीस परगना का क्षेत्रफल 4094 वर्ग मीटर और आबादी 73 लाख है। जिले में पेयजल के लिये उपयोग किये जाने वाले हैंडपंपों के तकरीबन 48 हजार पानी के नमूनों का विश्लेषण करने पर 292 प्रतिशत नलकूपों में आर्सेनिक की मात्रा 50 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गयी। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित अधिकतम सीमा से कहीं ज्यादा है। करीब 53 प्रतिशत कुओं में आर्सेनिक की मात्रा 10 माइकोग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गयी। जो विश्व स्वास्थ्य संगठन की अधिकतम सीमा से अधिक पाया गया है। अब तक 16 प्रखण्डों में लोगों पर आर्सेनिक के असर देखे गए हैं जिनमें चमड़ी पर घाव होना प्रमुख है आंकड़ों से पता चलता है कि करीब 20 लाख लोग 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से अधिक आर्सेनिक संदूषित पानी पी रहे हैं। इस आंकड़े के आधार पर गणना की जाए तो लगता है कि अकेले उत्तरी भारत चौबीस परगना में 1 लाख लोग आर्सेनिक जनित त्वचा रोगों से पीड़ित होगें। यूनिसेफ और जाघवपुर विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि बिहार में 14 जिले उत्तर प्रदेश में 11 जिले आसाम व छत्तीसगढ़ में 2-2 और झारखंड में एक जिला गंभीर आर्सेनिक संदूषण की गिरफ्त में हैं। बांग्लादेश के उत्तरी जिलों में लगभग हर घर में एक बच्चा या व्यस्क इस रहस्यमय बीमारी से पीड़ित है। मौतों की संख्या इतनी अधिक है कि गांव के लोगों ने गिनती करना छोड़ दिया है। अधिकांश मृतक छोटे बच्चे हैं। इस बीमारी के लक्षण भयानक हैं पनीली आंखे, लगातार अपच, जुकाम और पेट में मरोड़। ये लक्षण प्रारंभिक अवस्था के हैं। आगे चलकर हाथ पैरो में सूजन और गंभीर मामलों में गैगरीननुमा घावों में से खून रिसने जैसे लक्षण उभरते हैं इन सब मामलों में आर्सेनिक ही मुजरिम है। जो उत्तरी बांग्लादेश के कई गांवों में पानी में पाया जाता है।
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वनस्पति उपचार यानी विषैले कचरे वाले स्थानों को साफ करने में पेड़-पौधों का उपयोग
एक विकसित होता विज्ञान ही नहीं उद्योग भी है। शोधकर्ताओं ने जिनेटिक फेरबदल द्वारा एरेबिडाप्सिम का एक ऐसा पौधा विकसित किया है जो विषैले आर्सेनिक तत्व को सोख लेता है। ऐसी उम्मीद है कि इसकी मदद से आर्सेनिक संदूषित मिट्टी को विषमुक्त करके पुनः उपयोगी बनाया जा सकेगा। एक बार मिट्टी का आर्सेनिक पेड़ के तने और पत्तियों में इकट्ठा हो जाए तो पेड़ो को आसानी से काटकर सुरक्षित ढंग से जलाया जा सकता है। जरूरत है जिनेटिक रूप से परिवर्तित ऐसे पेड़ों की जिनकी जड़ें गहरी हो ताकि वे गहराई में से आर्सेनिक को सोख सके। अभी तक ऐसा कोई पेड़ तैयार नहीं हुआ है जो गहरे भूजल में से आर्सेनिक को निकाल दें। संदूषित मिट्टी में से पारे को सोखने वाले पेड़ विकसित किए जा चुके हैं जो मिट्टी में से पारा सोखकर उसे सुरक्षित रुप से वाष्पोत्सर्जित कर देते हैं। जिनेटिक रुप से परिवर्तित भारतीय सरसों के पौधे का उपयोग कैलिफोर्निया घाटी में सेलेनियम अवशेष को हटाने के लिये किया जा रहा है। पूरे उत्तर भारत में पेयजल के स्रोत कुदरती कारणों से या काऱखानों के कचरे से प्रदूषित हुए हैं।
दून दर्पण (देहरादून), 26 April 2006

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